Srishti Khanda Extracted Page 592
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-592
Sanskrit Original
महादेवोचल: स्थाणुऽर्न जातो जनकोजरः । भविष्यति पतिः सोस्या जगन्नाथो निरामयः ॥१७८॥ यदुक्तं च मया देवी लक्षणैर्वर्जिता तव । शृणु तस्यापि वाक्यस्य सम्यक्तेन विचारणम् ॥१७९॥ लक्षणं दैविको ह्यंकः शरीरावयवाश्रयः। स चायुर्धनसौभाग्यपरिणामप्रकाशकः ॥१८०॥ अनंतस्याप्रमेयस्य सौभाग्यस्य तु भूधर । नैवांको लक्षणाकारः शरीरे संविद्यीयते ॥१८१॥ अतोस्या लक्षणं गात्रे शैल नास्ति महामते । यच्चाहमुक्तवानस्या उत्तानकरता सदा ॥१८२॥ उत्तानो वरदः पाणिरेषदेव्याः सदैव तु । सुरासुरमुनिव्रातवरदात्री भविष्यति ॥१८३॥ यच्च प्रोक्तं मया पादौ सुच्छायौ व्यभिचारिणौ । मत्तः शृणु त्वमस्यापि व्याख्योक्तिं शैलसत्तम ॥१८४॥ चरणौ पद्मसंकाशौ स्वच्छावस्या नखोज्वलौ । सुरासुराणां नमतां किरीटमणिकांतिभिः ॥१८ ५॥ विचित्रवर्णैः पश्यद्भिः सुच्छायौ प्रतिबिबितौ । एषा भार्या जगद्धतर्वृषांकस्य महीधर ॥१८६॥ जननी सर्वलोकस्य संभूता भूतभाविनी । शिवेयं पावनायैव त्वत् क्षेत्रे पावनद्युतिः ॥९८७॥ तद्यथाशीघ्रमेवैषा योगं यायात्पिनाकिनः । तथाविधेयं विधिवत्त्वया शैलेंद्रसत्तम ॥१८८॥ अस्त्यत्र हि महत्कार्य देवानां हिमभूधर। एवं श्रुत्वा तु शैलेंद्रो नारदात्सर्वमेव हि ॥१८९॥ स्वमात्मानं पुनर्जातं मेने मेनापतिस्तदा। उवाच चापि संहृष्टो नारदं तु हिमाचलः ॥१९०॥ दुस्तरात्नरकाद्धोरादुद्धतोस्मि त्वया विभो । पातालादहमुद्धृत्य सप्तलोकाधिपः कृतः ॥१९१॥ हिमाचलोस्मि विख्यातस्त्वया मुनिवराधुना । हिमाचलाच्छतगुणां प्रापितोस्मि समुन्नतिम् ॥१९२॥ जनक तथा जरा से रहित हैं । वे जगन्नाथ और निर्दोष हैं । वे ही इसके पति होंगे ॥१७८॥ मैंने यह जो कहा है कि आपकी पुत्री यह जो देवी है, वह लक्षणों से रहित है, उस वाक्य का भी विचार आप अच्छी तरह से सुनें ॥१७९॥ लक्षण दैविक अङ्ग है । वह शरीर में रहता है । वह आयु, धन, सौभाग्य तथा परिणाम का प्रकाशक नहीं है॥१८०॥ हे भूधर ! अनन्त (निःसीम) अप्रमेय (जिसको मापा नही जा सके) सौभाग्य को प्रकाशित करने वाले आकार का लक्षण शरीर में नहीं किया जाता है ॥१८१॥ अतएव हे महामते शैल !इसके शरीर में कोई लक्षण नहीं है । मैंने इसकी जो उत्तानकरता (ऊपर की ओर हाथ उठाये रखना) वतलायी है ॥१८२॥ उसका अभिप्राय है कि इस देवी का हाथ वरदान देने के लिए सदा ऊपर की ओर उठा रहेगा । यह देवताओं तथा असुरों को वरदान देने वाली होगी॥ १८ ३॥ मैंने यह जो कहा है कि इसके पैर सुन्दर छाया वाले तथा व्यभिचारी हैं; हे शैलराज ! मेरी उस वाणी की व्याख्या आप सुनें ॥१८४॥ कमल के समान इसके स्वच्छ तथा नखों से प्रकाशित दोनों पैरों के नख देवताओं तथा असुरों के मुकुटों के मणियों के अनेक प्रकार की कान्तियों से प्रकाशित तथा देखने वालों की सुन्दर छाया को प्रतिविम्बित करने वालें होंगे । हे महीधर ! यह जगत् स्वामी भगवान् शङ्कर की पत्नी होगी ॥१८५-१८६॥ यह भूत तथा भविष्यत् कालिक सम्पूर्ण लोकों की माता होगी । तुम को पवित्र करने के लिए शिवा तुम्हारी पत्नी के गर्भ से उत्पन्न हुयी हैं ॥१८७॥ हे शैलेन्द्रश्रेष्ठ ! आपको ऐसा प्रयास करना चाहिए कि यह शीप्रातिशीप्र भगवान् शिव की पत्नी बन जाय ॥१८८॥ हे हिममूधर ! इसके द्वारा देवताओं का बहुत बड़ा कार्य होने वाला है । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- नारदजी की इन सारी बातों को सुनकर हिमालय ॥१८९॥ को लगा कि जैसे उनका पुनर्जन्म हुआ है । वे अत्यन्त प्रसन्नता पूर्वक नारदजी से कहे हिमाचल ने कहा-- भगवन् ! आपने मेरा दुस्तर घोर नरक से उद्धार किया है । आपने मुझे पाताल से निकाल कर सातों लोकों का स्वामी बना दिया है ॥१९०-१९१॥ हे मुनिवर! आपने तो मुझे इस समय में विख्यात हिमाचल बना दिया है । में हिमाचल से भी सौ गुना उन्नत वन गया
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know