Srishti Khanda Extracted Page 591

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-591

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

श्रीपद्यमहापुराण स न जात इति श्रुत्वा ममेदं व्याकुलं मनः । मनुष्यदेवजातीनां शुभाशुभनिवेदकम् ॥१६५॥ लक्षणं हस्तपादाभ्यां लक्षणं विहितं किल । सेयमुत्तानहस्तेति त्वयोक्ता मुनिपुंगव॥१६६॥ उत्तानहस्तता प्रोक्ता या च तामेव नित्यका । शुभोदयानां धन्यानां न कदाचित्प्रयच्छताम् ॥१६७॥ सुच्छाययास्याश्चरणौ त्वयोक्तौ व्यभिचारिणौ । तत्रापि श्रेयसी ह्याशा मुने न प्रतिभाति नः ॥१६८॥ शरीरलक्षणाश्चान्ये पृथक्फलनिवेदिनः । इत्युक्त्वा विरते शैले महादुःख विचारिणि ॥१६९॥ स्मितपूर्वमुवाचेदं नारदो देवपूजितः । नारद उवाच हर्षस्थाने च महति त्वया दुःखं निरुच्यते ॥१७०॥ अपरिच्छिन्नवाक्यार्थो मोहं यासि महागिरे । इमां शृणु गिरं मत्तोरहस्यपरिनिष्ठिताम्॥९७१॥ समाहितो महाशैल मपयोक्तस्य विचारणाम् । न जातोस्याः पतिर्देव्या यन्मयोक्तं हिमाचल ॥१७२॥ स न जातो महादेवो भूतभव्यभवोद्भवः । शरण्यः शाश्वतः शास्ता शङ्करः परमेश्वरः ॥१७३॥ ब्रह्मरुद्रेन्द्रमुनयो गर्भजन्मजरार्दिताः । तस्य ते परमेशस्य सर्वे क्रीडनका गिरे ॥१७४॥ ब्रह्मांडतस्तदिच्छातः संभूतो भुवनप्रभुः । आत्मनो न विनाशोस्ति स्थावरांतेपि भूधर ॥१७५॥ संसारे जायमानस्य म्रियमाणस्य देहिनः । नश्यते देह एटवात्रनात्मनो नाश उच्यते ॥१७६॥ ब्रह्मादिस्थावरांतोऽयं संसारो यः प्रकीर्तितः । स॒ जन्ममृत्युदुःखार्तो ह्यनिशं परिवर्तते ॥१७७॥ अतुलनीय और असंख्य दुर्भाग्य है । इसको बर्दास्त करना असंभव है । हे मुने ! सम्पूर्ण चराचर में इसका पति उत्पन्न ही नहीं हुआ यह सुनकर मेरा मन व्याकुल हो गया है । मनुष्य तथा देव जाति में होने वाले शुभ तथा अशुभ को बतलाने वाला ॥१६४-१६५॥ लक्षण हाथ तथा पैर से बतलाया जाता है । हे मुनिश्रेष्ठ ! आपने वतलाया है कि यह ऊपर की ओर ही हाथ किए रहेगी ॥१६६॥ यह बतलाया गया है कि ऊपर की आरे उठे हुए हाथ वाले को हमेशा माँगते रहना होता है । कल्याण प्राप्त धन्य तथा दान करने वालों का हाथ उत्तान हस्त नहीं होता है ॥१६७॥ आपने यह बतलाया है कि सुन्दर छाया से युक्त दोनों पैर व्यभिचारी हैं । हे मुने ! उससे भी मुझे कोई आशा नहीं प्रतीत होती है ॥१६८॥ शरीर के दूसरे लक्षण तो अलग-अलग फलों को अभिव्यक्त करते हैं यह कहकर जव अत्यन्त दुःखी हिमालय चुप हो गये तो ॥१६९॥ देवताओं से पूजित नारद-मुनि ने मुस्कुराते हुए कहा नारदजी ने कहा-- प्रसत्र होने के बदले आपने महान दुःख निवेदित किया है ॥१७१॥ वाक्यों के अर्थ के स्पष्ट नहीं होने के कारण आप मोहित हो रहे हैं मेरी रहस्य भरी बातों को आप सुनें ॥१७१॥ हे महाशैल ! मेरी बातों के विचारों को आप सावधानी पूर्वक सुनें । हे हिमाचल ! मैंने, यह जो कहा है कि इसका पति उत्पन्न नहीं हुआ ॥१७२॥ महादेव इस संसार में कभी भी उत्पन्न नहीं हुए । वे सबों के रक्षक, शाश्वत (नित्य) सबों के प्रशासक तथा परमेश्वर एवं कल्याणकारी हैं ॥१७३॥ ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, मुनिगण ये सवके सब गर्भ जन्य तथा जरा जन्य दुःख से दुःखी होते हैं । हे पर्वतराज ! ये उन परमेश्वर भगवान् शङ्कर के लिए क्रीडा के साधन रूप हैं ॥१७४॥ उनकी इच्छा से ही ब्रह्माण्ड उद्भूत होते हैं हे पर्वत ! स्थावर पर्यन्त भी वस्तुओं की आत्माओं का कभी विनाश नहीं होता है॥१७५॥ संसार में उत्पन्न होने वाले और मरने वाले जीवों के इस संसार में ही देह का नाश हो जाता है, आत्मा का नाश नहीं होता है ॥१७६॥ ब्रह्मा से लेकर स्थावर पर्यन्त जो यह संसार है वह निरन्तर जन्म तथा मृत्यु जन्य दुःख से दुःखी होता रहता है ॥१७७॥ महादेव अचल एवं स्थाणु (कूटस्थ) हैं, वे कभी उत्पन्न नहीं हुए । वे सम्पूर्ण जगत् के

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know