Srishti Khanda Extracted Page 590
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-590
Sanskrit Original
प्राणिनां मोहनार्थाय नरकत्राणकारणात् । स्त्रिया विरहिता सृष्टिजतूनां नोपपद्यते॥१५१॥ ख्रीजातिस्तु प्रकृत्यैव कृपणा दैन्यभागिनी । शास्त्रलोचनसामर्थ्याद्षितं तासु कर्तृणा ॥१५२॥ तस्यां नोपरिभावज्ञा भवेदिति च वेधसा । शास्रेषुक्तमसंदिग्धं बहुवारं महाफलम् ॥१५३॥ दशपुत्रसमा कन्या यापि स्याच्छीलवर्जिता । वाक्यमेतत्फलभ्रष्टं पुंसां ग्लनिकरं फलम् ॥९५४॥ कन्या हि कृपणा शोच्या पितुर्दु:खविवर्द्धिनी । यापि स्यात्पूर्णसर्वार्था पतिपुत्रसमन्विता ॥१५५॥ किं पुनर्दुर्भर्गा हीना पतिपुत्रधनादिभिः। त्वं चोक्तवान्सुताया मे शरीरे दोष संग्रहम्॥९५६॥ अहो मुह्यामि शुष्यामि ग्लामि सीदामि नारद। अयुक्तमपि वक्तव्यमप्राप्यमपि सांप्रतम् ॥१५७॥ अनुग्रहाय मे छिन्धि दुःखं कन्याश्रयं मुने । परिच्छिन्नेपप्यसंदिग्धे मनः परिभवाश्रयात् ॥९५८॥ तृष्णा मुष्णाति निष्णातं फललोभाश्रयात्पुनः । सत्रीणां हि परमं जन्म कुलानामुभयात्मनाम् ॥१५९॥ इहामुत्रसुखायोक्तं सत्पतिप्राप्तिसंज्ञितम् । दुर्लभत्वात्सतः स्रीणां विगुणोपि पतिः किल॥१६०॥ न प्राप्यते विना पुण्यैः पतिर्नार्याः कदाचन। यतोनिस्साधनो धर्मः परिणामोत्थिता रतिः ॥१६९॥ धनं जीवितपर्यंतं पत्यौ नार्याःप्रतिष्ठितम्। निर्धनो दुर्मुखो मूर्खः सर्वलक्षणवर्जितः ॥१६२॥ दैवतं परमं नार्याः पतिरुक्तः सदैव हि। त्वया देवर्षिणा प्रोक्तं न जातोस्याः पतिः किल॥१६३॥ एतद्दौर्भाग्यमतुलमसंख्यं च दुरुद्ृहम्। चराचरे भूतसर्गे चिंता सा व्यापिनी मुने ॥१६४॥ परित्याग कर दें तो फिर संसार की उत्पत्ति ही नहीं होगी, इसीलिए जगत् के कर्त्ता ने पुत्र की प्राप्ति की प्रशंसा किया है ॥१४९-१५०॥ प्राणियों को मोहित करने के लिए नरक से रक्षा को कारण बतलाकर, पुत्र प्राप्ति की प्रशंसा की गयी है । स्त्रियों के बिना जगत् की सृष्टि संभव नहीं है ॥१५१॥ खी जाति तो स्वभाव से ही कृपण तथा दीन होती है । शास्त्र का विचार करने के सामर्थ्य के कारण कर्त्ता ब्रह्मा ने उन सबों में दोष बतलाया है ॥१५२॥ स्री जाति में शास्त्रों के अभिप्राय को जानने वाली कोई नहीं हो सकती है । इस बात को शास्रों में बार-बार कहा गया है कि शील गुण रहित कन्या दश पुत्रों के समान होती है । यह वाकय निष्फल तथा पुरुषों को हतोत्साहित करने वाला है ॥१५३-१५४॥ कन्या कृपण होती है, शोचनीय होती है तथा पिता के दुःख को बढाने वाली होती है । भले ही उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हों तथा वह पति एवं पुत्र से सम्पन्न हो ॥१५५॥ यदि वह दुर्भाग्य वाली तथा पति, पुत्र तथा धन आदि से रहित है सो फिर उसके विषय में क्या कहना है ? आपने मेरी पुत्री के शरीर में अनेक दोषों को बतलाया है ॥१५६॥ हे नारद जी ! मुझे तो चक्कर आ रहा है, मेरा मुख सुखा जा रहा हे, मैं हतोत्साहित हो रहा हूँ तथा दुःखी हो रहा हूँ । मेरी पुत्री पर कृपा करने के लिए आप यदि अनुचित तथा अप्राप्य भी उपाय हो तो उसे बतलायें ॥१५७॥ हे मुने ! आप मेरी कन्या के दुःख का निवारण कीजिये । सीमित तथा सन्देह रहित विषय में मन परिमव का अनुभव करने लगता है ॥१५८॥ फल की प्राप्ति लोभ के होने पर तृष्णा, निष्णात (निपुण) व्यक्ति को भी ठग लेने का काम करती है । (पिता और पति) दोनों के वंश सम्बन्ध रखने के कारण स्त्रियों का जन्म श्रेष्ठ माना गया है ॥१५९॥ खियों के लिए लोक तथा परलोक दोनों में सुख की प्राप्ति का साधन अच्छे पति की प्राप्ति को बतलाया गया है । स्त्रियों के लिए सत्पति की प्राप्ति के दुर्लभ होने के कारण स्त्रियों को गुण हीन भी पति की प्राप्ति के बिना पुण्य की प्राप्ति नहीं होती है । क्योंकि धर्म साधन रहित धर्म के परिणाम जन्य प्रेम तथा जीवन पर्यन्त रहने वाला धर्म पति ही कहा गया है । निर्धन, कुरूप, मूर्ख तथा सद्गुण विहीन भी पति नारी के लिए सदा सर्वश्रेष्ठ देवता होता है । आप देवर्षि हैं । आपने कहा कि इसका कोई पति ही नहीं है ॥१६०-१६३। यह इसका
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