Srishti Khanda Extracted Page 588

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-588

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Sanskrit Original

प्रसन्नता च तोयस्य मुनिभ्यश्चाधिका तव । न लक्षयामः शैलेंद्र कुत्राविनयिता स्थिता ॥१२२॥ नानातपोभि मुनिभिर्ज्चलनार्कसमप्रभैः। पावनैः पावितो नित्यं त्वं कंदरसमाश्रयै: ॥१२३॥ अवमत्य विमानानि स्वर्गवासविरगिणः। पितुर्गृह इवासीना देवगंधर्वकिन्नराः ॥१२४॥ अहो धन्योसि शैलेंद्र यस्य ते कंदरं हरः । अध्यास्ते लोकनाथो हि रामध्यानपरायणः ॥१२५॥ इत्युक्तवति देवर्षौ नारदे सादरं गिरा। हिमशैलस्य महिषी मेनामुनिदिदृक्षया ॥१२६॥ अनुयाता दुहित्रा तु स्वल्पालिपरिचारिका । लज्जाप्रणयनम्राङ्गी प्रविवेशनिकेतनम् ॥९२७॥ यत्र स्थितो मुनिवरः शैलेन सहितो वशी । तं दृष्ट्वा तेजसो राशिं मुनिं शैलप्रिया तदा॥१२८॥ ववंदे गूढवदना पाणिपदकृताञ्जलिः । तां विलोक्य महाभागां देवर्षिरमितद्युतिः ॥१२९॥ आशीर्भिरमृतोद्नाररूपाभिस्तं व्यवर्द्वयत् । ततो विस्मितचित्ता तु हिमवदिगरिपुत्रिका ॥१३०॥ ऐक्षिष्ट नारदं देवी मुनिमद्धुतरूपिणम्। एहि वत्सेति साप्युक्ता ऋषिणा स्निग्धया गिरा॥१३२॥ कंठे गृहीत्वा पितरमङ्के सा तु समाविशत् । उवाच माता तां देवीमभिवंदय पुत्रिके ॥१३२॥ भगवंतं तपोधन्यं पतिमाप्स्यसि संमतम् । इत्युक्त्वा तु ततो मात्रा वस्रेण पिहितानना ॥१३३॥ किचित्कपितमूर्द्धा तु वाक्यं नोवाच किंचन । ततः पुनरुवाचेदं वाक्यं माता सुतां तदा ॥१३४॥ वत्से बंदय देवर्षि ततो दास्यामि ते शुभम्। रत्मक्रीडनकं रम्यं स्थापितं यच्चिरं मया ॥१३५॥ इत्युक्ता सा ततो वेगादुद्रत्य चरणौ तदा। ववंदे मूर्ध्नि संधाय पाणिपङ्कजकुड्मलम् ॥१३६॥ अधिक है ॥१२१॥ आपके जलों की स्वच्छता मुनियों के कारण और अधिक है । हे शैलेन्द्र ! आप में कहीं भी अविनीतता दिखायी नहीं पड़ती है ॥१२२॥ तुम्हारी कन्दराओं में रहकर तपस्या करने वाले अग्नि तथा सूर्य के समान कान्ति सम्पन्न मुनियों तथा उनकी तपस्याओं से आप सदा पवित्र रहते हैं ॥१२३॥ देवता, गन्धर्व तथा किन्नर स्वर्ग निवास से उदासीन होकर तथा अपने विमानों को छोड़कर अपने पिता के घर के समान ही तुम पर निवास करते हैं ।॥१२४॥ हे शैलेन्द्र ! आप धन्य हैं कि आपकी कन्दरा में निरन्तर भगवान राम का ध्यान करने वाले लोकों के स्वामी भगवान् शिव निवास करते हैं ॥१२५॥ देवर्षि नारद के इसतरह से आदर पूर्वक कहने पर हिमवान् की पत्नी मेना मुनि का दर्शन करने की इच्छा से ॥१२६॥ अपनी थोड़ी सी सखियों तथा परिचारिकाओं के साथ अपनी पुत्री के साथ आयीं । उस समय लज्जा और स्नेह के कारण उसके अङ्ग झुके हुए थे ॥१२७॥ वहाँ पर पर्वतराज के साथ मुनि विद्यमान थे तेज के समूह स्वरूप उन मुनि को देखकर पर्वतराज की पत्नी ने अपने मुख को छिपाये हुए तथा हस्तकमलों को जोड़कर वंदना की । महाभागा मेना को देखकर अपार कान्ति सम्पन्न देवर्षि, अमृत की धारा के समान अपने आशीर्वचनों से उसे सम्पन्न किया । उसके बाद आश्चर्यित अन्तःकरण वाली हिमवान् की पुत्री ॥१२८-१३०॥ देवी पार्वती ने अद्भुत रूप वाले नारद मुनि को देखा । ऋषि ने भी प्रेम भरी वाणी से कहा वत्से ! आओ ॥१३१॥ उस समय वह बालिका अपने पिता के कण्ठ को पकड़कर उनकी गोद में बैठ गयी । माता ने उस देवी से कहा पुत्रि ! तपोधन ऐश्वर्य सम्पन्न महर्षि की वन्दना करो, उसके फलस्वरूप तुम्हें अनुकूल पति की प्राप्ति होगी । माता के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर अपने मुख को वस्त्र से ढँककर पार्वती ने अपना थोड़ा सा शिर हिलाया; किन्तु कुछ बोली नहीं । उसके बाद माता ने अपनी पुत्री से फिर कहा ॥१३२-१३४॥ पुत्रि देवर्षि की तुम वन्दना कर लो तो तुमको जिसे मैंने बहुत दिनों से रखा है उस रत्न निर्मित खिलौने को दूँगी ॥१३५॥ माता के द्वारा इस तरह कहे जाने पर शीघ्र ही उठकर देवर्षि के चरणों पर अपने हस्तकमल को रखकर पार्वती ने उनकी

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