Srishti Khanda Extracted Page 587

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-587

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Sanskrit Original

स तु शक्रस्य विज्ञाय कांक्षितं भगवांस्तदा। आजगाम मुदा युक्तो महेद्रस्य निवेशनम्॥१०८॥ तं तु दृष्ट्वा सहस्त्राक्षः समुत्थाय महासनात् । यथाहेण तु पाद्येन पूजयामास वासवः ॥१०९॥ शक्रप्रणिहितां पूजां प्रतिगृह्ण यथाविधि । नारदः कुशलं देवमपृच्छत्पाकशासनम् ॥११०॥ पृष्टे च कुशले शक्रः प्रोवाच वचनं प्रभुः । इंद्र उवाच कुशलस्यांकुरस्तावत्संवृत्तो भुवनत्रये ॥१११॥ तत्फलोद्धवसंपत्तौ त्वं मया विदितो मुने । वेत्स्येव तत्समस्तं त्वं तथापि परिचोदितः ॥९९२॥ निर्वृतिं परमां याति निवेद्यार्थं सुहुज्जने। तद्यथा शैलजा देवी योगं यायात्पिनाकिना ॥९९३॥ शीघ्रं तथोद्यमः सर्वैरस्मत्पक्षैर्विधीयताम् । अवगम्यार्थमखिलं तत आमंत्र्य नारदः ॥११४॥ शीघ्रं जगाम भगवान् हिमशैलनिकेतनम्। तत्र द्वारे सविप्रेंद्रश्चित्रवेत्रलताकुले॥९ १५॥ बंदितो हिमशैलेन निर्गतेन पुरो मुनिः। सह प्रविश्य भवनं भुवो भूषणतां गतम् ॥९१६॥ निवेदिते स्वयं हैमे हिमशैलेन विस्तृते । महासने मुनिवरो निषसादातुलद्युतिः ॥९९७॥ यथार्हमर्ध्यपाद्यं च शैलस्तस्मै न्यवेदयेत् । मुनिः स प्रति जग्राह तमर्घ्य विधिवत्तदा ॥९१९८॥ गृहीतार्घम्मुनिश्रेष्ठमपृच्छत् शलक्ष्णया गिरा । कुशलं तपसः शैलः शनैः फुल्लाननांबुजः ॥११९॥ मुनिरप्यद्रिराजानमपृच्छत्कुशलं तदा। नारद उवाच अहो धर्मो्रितस्तेऽस्ति संनिवेशो महागिरे ॥१२०॥ पुथुत्वं मनसा तुल्यं कंदराणां तवानघ । गुरुत्वं ते गुणौघानां स्थावरादतिरिच्यते॥९२९॥ सावधान इन्द्र ने इसी बीच देवताओं के अभिमत देवर्षि नारद का स्मरण किया ॥१०७॥ भगवान् नारद भी इन्द्र के अभिप्रेत कार्य को जानकर प्रसन्नता पूर्वक इन्द्र के घर आये ॥१०८॥ उनको आये हुए देखकर इन्द्र ने अपने सिंहासन से खड़ा होकर उनकी पाद्य इत्यादि उपचारों से पूजा की ॥१०९॥ इन्द्र के द्वारा की गयी सविधि पूजा को स्वीकार करके नारदजी ने देवताओं का कुशल पूछा ॥११०॥ कुशल पूछने पर इन्द्र ने कहना प्रारम्भ किया । इन्द्र ने कहा-- इस समय त्रैलोक्य में कुशल का अङ्कुर उत्पन्न हो गया है ॥१११॥ में समझता हूँ कि उसमें फल आपके द्वारा ही लगेगा । यद्यपि आप इन सारी बातों को जानते हैं, फिर भी आपने पूछा है तो मैं कहता हूँ ॥११२॥। अपने सुहृदों को अपना अभिलषित अर्थ बतलाने में बहुत अधिक सुख मिलता है । अतएव देवी पार्वती का जिस प्रकार से भगवान् शिव से सम्बन्ध हो सके ॥११३॥ इस प्रकार का प्रयास देव पक्षीयों को शीघ्रातिशीघ्र करना चाहिए । सारी बातों को जानकर नारदजी इन्द्र से विदा लेकर ॥११४॥ शीघ्र ही हिमालय के घर गये ।वहाँ प्रतिहारीगण से परिपूर्ण द्वार पर हिमवान ने घर से निकलकर देवर्षि नारद की बन्दना की उनके साथ पृथिवी के अलङ्कारभूत भवन में प्रवेश करके ॥११५-११६॥ स्वयं हिमवान के द्वारा विस्तृत सुवर्णमय आसन पर महान् कान्ति सम्पन्न नारद मुनि बैठे॥ ११७॥ हिमवान् ने उनको उचित अर्ध्य को प्रदान किया ॥११८॥ नारदमुनि के अर्घ्य स्वीकार कर लेने पर पर्वतणज हिमालय ने मधुर वाणी में प्रसन्न मुख से कुशल प्रश्न किया ॥११९॥ मुनि नारद ने भी पर्वतराज से कुशल पूछा । नारदजी ने कहा-- हे महापर्वत आपके धर्म का सन्निवेश उचित और प्रशंसनीय है ॥१२०॥ जिसतरह से आपका मन उदार है उसी तरह से आपकी कन्दराएँ विस्तृत हैं । आपके गुण समूह की गुरुता समस्त स्थावरों से `;

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