Srishti Khanda Extracted Page 586
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-586
Sanskrit Original
अरंजयद्गृहं देव्या गुहारण्ये विभावरी । ततो जगत्या निर्वाणहेतुर्हिमगिरिप्रिया ॥९१॥ ब्राह्मो मुहूर्ते सुभगे प्रासूयत गुहारणिम्। तस्यां तु जायमानायां जंतवः स्थाणुजंगमाः ॥९ २॥ अभवन्सुखिनः सर्वे सर्वलोकनिवासिनः । नारकाणामपि तदा सुखं स्वर्गसमं महत् ॥९३॥ अभवत्क्रूरसत्वानां चेतः शांतं च देहिनाम् । ज्योतिषामपि तेजस्तु सुतरां चाभवत्तदा ॥९४॥ वनाश्रिताश्चोषधयः स्वादवंति फलानि च । गंधवंति च माल्यानि विमलं च नभोऽ भवत् ॥९५॥ मारुतश्च सुखस्पर्शो दिशश्च सुमनोहराः। ऋतूद्धतफलायोगपरिपाकगुणोज्ज्वला ॥९६॥ अभवत्पृथिवीदेवी शालिमालाकुलापि च। तपांसि दीर्घचीर्णानि मुनीनां भावितात्मनाम्॥९।७॥ तस्मिन् गतानि साफल्य काले निर्मलचेतसाम्। विस्मृतानि च शास्त्राणि प्रादुर्भावं प्रपेदिरे॥९८॥ प्रभावस्तीर्थमुख्यानां तदा पुण्यतमस्त्वभूत् `। अंतरिक्षेमराश्चासन्विमानेषु सहस्रशः ॥९९॥ समहेद्रजलाधीशवायुवह्निपुरोगमाः । पुष्पवृष्टिं प्रमुमुचुस्तस्मिंस्तुहिनभूधरे ॥१००॥ जगुर्गधर्वमुख्याश्च नजृतुश्चाप्सरोगणाः । मेरुप्रभृतयश्चापि मूर्तिमतो महाचलाः ॥१० १॥ तस्मिन्महोत्सवे प्राप्ते दिव्याः प्रसृतपाणयः । सागरास्सरितश्चैव समाजग्मुश्च सर्वशः ॥९०२॥ हिमशैलोऽ भवल्लोके तदासर्वैश्रराचरैः । संसेव्यश्चाधिगम्यश्च साश्रयश्चाचलोत्तमः॥१०३॥ | अनुभूयोत्सवं देवा जग्मुः स्वान्निलयास्तदा। देवनागेंद्रगंधर्वशैललीलावतीगणैः ॥१०४॥ हिमशैलसुता देवी त्वहं पूर्विकया ततः । क्रमेण बुद्धिमानीता विद्याञ्चानलसैर्बुधैः ॥१०५॥ क्रमेण रूपसौ भाग्यप्रबो धैर्भुवनत्रये । संपूर्णलक्षणा जाता हिमालयसुता तथा ॥१०६॥ एतस्मिन्नंतरे शक्रो नारदं देवसंमतम्। देवर्षिमथ सस्मार कार्यसाधनतत्परः ॥१०७॥ करने के लिए हिमवान की पत्नी मेना देवी ने ॥९१॥ सुन्दर ब्राह्म मुहूर्त में पार्वती देवी को जन्म दिया । पार्वती के जन्म के समय सभी लोकों में रहने वाले स्थावर एवं जङ्गम जीव ॥९२॥ सुखी हो गये । नरकों में रहने वाले भी जीवों को स्वर्ग के समान सुख प्राप्त हुआ ॥९३॥ क्रूर योनि के भी शरीर धारियों का अन्तःकरण शान्त हो गये । उस समय सभी नक्षत्रों में भी चमक पैदा हो गयी ॥९४॥ वन में रहने वाली ओषधियाँ तथा फल स्वादिष्ट हो गयी। मालाएँ सुगन्धि से भर गयीं तथा आकाश स्वच्छ हो गया ॥९५॥ सुख प्रदान करने वाली हवा बहने लगी, दिशाएँ. मनोहर हो गयीं । उस ऋतु में उत्पन्न होने वाले फल पककर चमकने लगे ॥९६॥ उस समय पृथिवी देवी अनेक प्रकार के अन्नों से परिपूर्ण हो गयीं । स्वच्छ अन्तःकरण वाले तपस्वी मुनियों द्वारा दीर्घकाल से की गयी तपस्याओं की उसी समय पूर्ति हो गयी । उसी समय विस्मृत हुए शास्त्र याद हो गये ॥९७-९८॥ बड़े-बड़े तीर्थो का प्रभाव अत्यन्त पुण्यमय हो गया । आकाश में हजारों देवता अपने-अपने विमानों में एकत्रित हो गये ॥९९॥ इन्द्र के साथ वरुण तथा वायु आदि देवताओं ने उस हिमालय पर्वत पर फूलों की वृष्टि की ॥१००॥ बड़े-बड़े गन्धर्वो ने गीत गाया और अप्सराओं ने नृत्य किया । सुमेरु आदि महापर्वत शरीर धारण करके उस महोत्सव के समय देवी को प्रणाम किए । सभी समुद्र और नदियाँ भी उस समय वहाँ आयीं ॥१०१-१०२॥ उस समय पर्वत्तोत्तम हिमालय पर्वत सबों के लिए सेवनीय और प्राप्य बन गया । सभी देवता उस महोत्सव का आनन्दानुभव करके देवता, पर्वत, गन्धर्व तथा पर्वतों पर क्रीडा करने वाली अप्सराओं के साथ अपने-अपने घर आये ॥१०३-१०४॥ हिमवान् पुत्री देवी अतिशीघ्र ही बुद्धिमती हो गयी, और आलस्य रहित विद्वानों ने उन्हें विद्या प्रदान किया ॥१०५॥ क्रमश: वह रूप सौभाग्य तथा ज्ञान के द्वारा त्रैलोक्य में सम्पूर्ण सद्रुणों से सम्पन्न हो गयी ॥१०६॥ अपने कार्य की सिद्धि में सदा
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