Srishti Khanda Extracted Page 585
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-585
Sanskrit Original
त्वंकीर्तिः सत्यभूतानां त्वं शांतिर्दृष्टकर्मणाम् । त्वं भ्रांतिः सर्वभूतानां त्वं गतिः क्रतुयाजिनाम्।।७७॥ जलधीनां महावेला त्वं च लीलाविलासिनी। प्रियकंठग्रहानंददायिनी त्वं विभावरी ॥७८॥ इत्यनेकविधै देंवी रूपैलोके त्वमर्चिता । ये त्वां स्तोष्यंति वरदे पूजयिष्यंति चापि ये ॥७९॥ ते सर्वकामानाप्स्यंति नियता नात्र संशयः । इत्युक्ता तु निशा देवी तथेत्युक्त्वा कृताञ्जलिः॥८ ०॥ जगाम त्वरिता तूर्ण गृहं हिमगिरेर्महत्। तत्रासीनां महाहम्ये रत्नभित्तिसमाश्रयाम्।८ १॥ ददर्श मेनामापाण्डुच्छशिवक्त्रसरोरुहाम्। किंचितक्षामां मुखोदग्रस्तनभारावनामिताम् ॥८ २॥ महौषधिगणाबद्धमंत्रराजनिषेविताम् । उदूढकनकोन्नद्धजीवरक्षामनोरमाम् ॥८३॥ मणिदीपगणज्योति र्महालोकप्रकाशिते । प्रकीर्णबहुसिद्धार्थमनोज्ञपरिचारके ॥८ ४॥ शुद्धचीनांशुकच्छत्र भूशय्यास्तरणोज्ज्वले । धूपामोदमनोरम्ये सज्जसर्वोपयोगिके ॥८ ५॥ ततःक्रमेण दिवसे गते दूरं विभावरी । विजृंभितसुखोदके ततो मेनामहागृहे ॥८६॥ प्रसुप्तप्रायपुरुषे निद्राभूतोपचारके । स्फुटालोके शशभृति श्रान्तरात्रिविहंगमे॥८ ७॥ रजनीचरसंचारभूतैरावृतचत्वरे । गाढकंठग्रहालग्ने शुभगोष्ठजने ततः ॥८८॥ किंचिदाकुलतां प्राप्ते मेनानेत्रांबुजद्दये । आविवेशमुखे रात्रिः सुखमद्धतसंगमा ॥८ ९॥ उन्मादाय जगन्मातुः क्रमेण जटठरांतरे । आविवेशातुलं जन्म मन्यमाना कदा तु वै ॥९०॥ रति (स्नेह) हो, शरीरधारियों के हृदय में रहने वाली तुम प्रीतिं हो ॥७६॥ सत्यवादी जीवों की तुम कीर्ति हो तथा दुष्टकर्म करने वालों की तुम शान्ति हो । तुम सभी भूतों की आन्ति स्वरूपिणी हो, और यज्ञ करने वालां की तुम कीर्ति हो ॥७७॥ हे लीलापूर्वक विलास करने वाली रात्रि ! तुम समुद्र तट स्वरूपिणी हो । तुम प्रियतम को कण्ठालिङ्गन जन्य आनन्द प्रदान करने वाली विभावरी (रात्रि) हो ॥७ ८॥ हे देवि ! तुम लोक में इस तरह अनेक रूपों में पूजित हो । हे वरदान देने वाली रात्रि ! जो लोग तुम्हारी स्तुति तथा पूजा करेंगे ॥७९॥ निश्चित रूप से उनकी सारी कामनाएंँ पूर्ण होंगी, इसमें किसी भी प्राकार का सन्देह नहीं है । ब्रह्माजी के इस तरह कहने पर रात्रि देवी ने हाथ जोड़कर आपकी आज्ञा शिरोधार्य है ॥८०। यह कहकर वह शीघ्र ही हिमाचल के विशाल गृह में चली गयी । वहाँ उसने रत्त्रनिर्मित दिवार का सहारा लेकर जिनका मुख कमल कुछ पीले वर्ण का हो गया था उन मेना देवी को बैठे हुए देखा । उनका शरीर कुछ कमजोर हो गया था और वे उन्नत स्तनों के भार से कुछ झुक सी गयी थीं ॥८१-८२॥ उनके शरीर में अनेक महौषधियाँ बँधी थीं और वे मन्त्रराज से सुसेवित थीं । उत्कृष्ट उढकन से संबद्ध तथा जीवों की रक्षा करने के कारण मनोहर ॥८३॥ मणि समूह रूपी दीपक के प्रकाश से प्रकाशित जिसमें बहुत अधिक पीली सरसो विखरी हुयी थी तथा मनोहर परिचारक से युक्त ॥८४॥ चीन देश में निर्मित शुद्ध वस्र के छत्र जन्य शय्या तथा आस्तरण से सुशोभित धूप की सुगन्धि से मनोरम तथा जिसमें उपयोगी सारी वस्तुएँ सजा दी गयी थी मेना देवी के उस गृह को रात्रि ने देखा ॥८५॥ उसके बाद क्रमश: दिन बीत गया जिसके कारण सुख की प्रतीति हो रही थी तथा निद्रा के उपचार के कारण सबलोग सो गये थे, चन्द्रमा की चाँदनी का प्रकाश फैल गया था, रात्रि के पक्षी निद्रित से हो गये थे । चौराहों पर दैत्य गण चल फिर रहे थे । प्रियतम अपनी प्रियतमाओं के गले में हाथ डाले हुए थे ॥८६-८८॥ उसी समय अद्भुत .सङ्गम वाली रात्रि देवी ने मेना देवी के मुख में प्रवेश किया॥८९॥जिससे कि जगन्माता के उदर में क्रमश: उन्माद हो । स्वर्गलोक पर्यन्त अतुलनीय जन्म प्रदान करने के लिए रात्रि देवी ने प्रवेश किया ॥९०॥ रात्री ने गुफा रूपी आरण्य में देवी के गृह को सजा दिया । उसके बाद जगत् का कल्याण
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