Srishti Khanda Extracted Page 584

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-584

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Sanskrit Original

विरहोत्कंठिता गाढं हरसंगमलालसा । तयोः सुतप्ततपसोः संयोगः स्याच्छुभावह: ॥६ २॥ ततस्ताभ्यां तु जनितः स्वल्पो वाक्कलहो भवेत् । ततस्तु संशयो भूयस्तारकस्य च दृश्यते ॥६३॥ तयोः संयुक्तयोस्तस्मात्सुरतासक्तिकारणे । विध्नं त्वया विधातव्यं यथा ताभ्यां तथा श्ृणु॥६४॥ गर्भस्थमेव तन्मातुः स्वेनरूपेण संज्ञया । ततो विहस्य शर्वस्तां विषण्णो नर्मपूर्वकम् ॥६५॥ भर्त्सयिष्यति तां देवीं ततः सा कुपिता सती। प्रयास्यति तपश्चर्तु ततः सा तपसा युता॥६६॥ जनयिष्यति तं शर्वादमितद्युतिमंडलम् । संभविष्यति हंताऽसौ सुरारीणामसंशयम् ॥६७॥ त्वयापि दानवा देवि हंतव्या लोकदुर्जयाः । यावत्सुरेश्वरीदेहसंक्रांतगुणसंचया ॥६८॥ तत्संगमेन तावत्त्वं दैत्यान्हंतु न शक्यसे । एवं कृते तपस्तप्त्वा त्वया सर्वकरिष्यति ॥६९॥ समाप्तनियमा देवि यदा चोमा भविष्यति । तदा स्वमेव सारूपं शैलजा प्रतिपत्स्यते ॥७०॥ तदा त्वयापि सहिता भवानी सा भविष्यति। रूपांशेन तु संयुक्ता उमायास्त्वं भविष्यसि ॥७१॥ एकाऽनंशेति लोकस्त्वां वरदे पूजयिष्यति। भेदै बहुविधाकारैः सर्वगां कामसाधिनीम् ॥७२॥ ओंकारवक्त्र गायत्री त्वमिति ब्रह्मवादिभिः । आक्रान्तैरुर्जिताकारा राजभिश्च महाभुजैः ॥७३॥ त्वं भूरिति विशां माता शूद्रैश्शैवेति पूजिता । क्षांतिर्मुनीनामक्षोभ्या दया नियमिनामपि ॥७४॥ त्वं महोपायसंदेहो नीतिर्नयविसर्पिणाम्। परिचितिस्त्वमर्थानां त्वमीहा प्राणिहच्छया ॥७ ५॥ त्वं मुक्तिस्सर्वभूतानां त्वं गतिःसर्वदेहिनाम्। रतिस्त्वं रतचित्तानां प्रीतिस्त्वं हृदि देहिनाम् ॥७६॥ संयोग लोक कल्याणकारी होगा ॥६२॥ उसके बाद उन दोनों में थोड़ा सा विवाद उत्पन्न होगा उसके कारण तारकासुर को संशय होगा ॥६३॥ उसके बाद उन दोनों के सुरत क्रीडा करने में प्रवृत्त होने पर तुम्हें थोड़ा विघ्न उत्पन्न करना होगा । उसको मैं बतलाता हुँ सुनो ॥६४।। उसके गर्भस्थ होने पर ही उसकी माता को अपने रूप से तथा संज्ञा द्वारा हंसकर भगवान् शिव उदास होकर कामना पूर्वक उस देवी की भर्त्सना (उपहास) करेंगे । उसके बाद कुपित होकर वह देवी तपस्या करने के लिए चली जायेंगी । उसके बाद तपस्या सम्पन्न वह देवी शङ्करजी के सम्बन्ध से निस्सीम प्रकाशमण्डल को उत्पन्न करेगी । उससे उत्पन्न होने वाला बालक तारकासुर का बध करने वाला होगा इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है ॥६५-६६॥ हे देवि ! तुमको भी लोकदुर्जय दानवों का वध करना चाहिए, क्योंकि उतने दिन का सुरेश्वरी के शरीर का संयोग होने से तुममें भी गुणों का समूह भर जायेगा ।।६८।। जब तक शिव पार्वती का सङ्गम नहीं होगा तब तक तुम भी दैत्यों को नहीं मार सकती हो । ऐसा करने से तपस्या करके तुम्हारे द्वारा वह सब कुछ करेगी ॥६९॥ हे देवि ! जब उमा देवी का नियम समाप्त हो जायेगा, तब पार्वती अपने रूप को प्राप्त कर लेगी ॥७०॥ उस समय पार्वती तुम्हारे साथ हो जायेगी । तुम उस समय उमा के रूपांश से युक्त हो जाओगी ॥७१॥ हे वरदे ! लोक में लोग अंश रहित, केवल तुम्हारी अनेक आकारों वाली, कामनाओं को सिद्ध करने वाली तथा सर्वत्र व्यापिका रूप से तुम्हारी पूजा करेंगे ॥७२॥ ब्रह्मज्ञानी पुरुष तुम्हारी उपासना ओङ्कार ही जिसका मुख है ऐसी गायत्री के रूप में करेगें । महाबलवान् आक्रान्त राजागण तुम्हारी उपासना, उर्जित आकार वाली के रूप में करेंगे ॥७३॥ तुम वैश्यों की माता भू देवी हो । शूद्र जन तुम्हारी पूजा शैव के रूप में करते हैं । तुम मुनियों की भी क्षुब्ध नहीं होने वाली क्षमा हो, नियमों का पालन करने वालों की तुम दया हो ॥७४॥ तुम महा उपाय रूप सन्देह हो और नीतिज्ञों की तुम नीति हो । तुम अर्थो एवं धनों की परिचित्ति हो, तुम निजींवों के हृदय की वासना हो ॥७५॥ तुम सभी जीवों की मुक्ति हो, सभी शरीरधारियों की तुम गति हो । अनुरक्त चित्त वालों की तुम

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