Srishti Khanda Extracted Page 583
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-583
Sanskrit Original
स तु वव्रे वर्ध दैत्यश्शिशुतः सप्त वासरात् । स तु सप्त दिनो बाल: शङ्कराद्यो भविष्यति ॥४७॥ तारकस्य निहंता स भास्कराभो भविष्यति । सांप्रतं चाप्यपत्नीकः शङ्करोभगवान्प्रभुः ॥४८॥ हिमाचलस्य दुहिता या च देवी भविष्यति। तस्याः सकाशाद्यः सूनुररण्याः पावको यथा ॥४९॥ जनयिष्यति तं प्राप्य तारको न भविष्यति | मयाऽभ्युपायः कथितो यथैष हि भविष्यति ॥५०॥ शेषं चाप्यस्य विभवं विभजध्वमनंतरम्। स्तोककालं प्रतीक्षध्वं निर्विशंकेन चेतसा॥५ १॥ इत्युक्ता स्त्रिदशास्तेन साक्षात्कमलयोनिना । जग्मुस्ते प्रणिपत्येशं यथा योगं दिवौकसः ॥५२॥ ततो यातेषु देवेषु ब्रह्मा लोकपितामहः। निशां सस्मार भगवांस्तां देवीं पूर्वसंभवाम् ॥५३॥ ततो भगवती रात्रिरुपतस्थे पितामहम् । तां विविक्ते समालोक्य ब्रह्मोवाच विभावरीम् ॥५४॥ ब्रह्मोवाच विभावरि महत्कार्य देवानां समुपस्थितम् । तत्कर्तव्यं त्वया देवि शृणु कार्यस्य निश्चयम् ॥५५॥ तारको नाम दैत्येंद्र: सुरशत्ररनिर्जितः । तस्याभवाय भगवान् जनयिष्यति चेश्वरः॥५६॥ सुतं स भविता तस्य तारकस्यांतकः किल। शङ्करस्याभवत्पत्मी सती दक्षसुता तु या ॥५७॥ सापि तु कुपिता देवी कस्मिश्रित्कारणांतरे। भवित्री हिमशैलस्य दुहिता लोकभाविनी ॥५८॥ विरहेण हरस्तस्या मत्वा शून्यं जगत्त्रयम् । स तस्य हिमशैलस्य कंदरे सिद्धसेविते ॥५९॥ प्रतीक्षमाणस्तज्जन्मकिंचित्कालं निवत्स्यति । तयोः सुतप्ततपसो भविता यो महान्सुतः ॥६०॥ भविष्यति स दैत्यस्य तारकस्य विनाशकः । जातमात्रा च सा देवी स्वल्पसंज्ञेव भामिनी॥६९॥ हुआ है ॥४५॥ मैंने वरदान माँगने के लिए कहकर उसको त्रैलोक्य को भस्म कर देने में समर्थ तपस्या करने से रोका है ॥४६॥ उस दैत्य ने वरदान में माँगा कि मेरी मृत्यु सात दिन के बालक से हो । शङ्करजी का जो सात दिन का पुत्र होगा सूर्य के समान कान्ति वाला वह बालक ही उसका वध करेगा । इस समय भगवान् शङ्कर पत्नी से रहित हैं ॥४७-४८॥ जो देवी हिमालय की पुत्री होगी उसी के गर्भ से अरणी से उत्पन्न होने वाली अग्नि के समान वह बालक ॥४९॥ उत्पन्न होगा । उसके उत्पन्न होने पर ही तारकासुर का विनाश होगा । मैंने तारकासुर के विनाश का उपाय बतला दिया और जो उसका ऐश्वर्य होगा उसका तुम लोग विभाग करो । थोड़े समय तक आपलोग निःशङ्क होकर प्रतीक्षा करें ।।५०-५१॥ ब्रह्माजी के इस प्रकार से कहने पर देवता उनको प्रणाम करके अपने-अपने स्थान पर चले गये ॥५२॥ देवताओं के चले जाने पर लोकपितामह ब्रह्माजी ने पहले से ही उत्पन्न रात्रि देवी का स्मरण किया।।५३।। उसके बाद रात्रि देवी ब्रह्माजी के सन्निकट आयीं । उनको एकान्त में देखकर ब्रह्माजी ने कहा ॥५४॥ ब्रह्माजी ने कहा-- हे रात्रि ! देवताओं का बहुत बड़ा काम आ गया है, उस कार्य को तुम्हे करना है । में उस कार्य को बतलाता हूँ ॥५५। तारक नामक दैत्यों का राजा अपराजेय है । उसका विनाश करने वाले पुत्र को भगवान् शिव उत्पन्न करेंगे ॥५६॥ शङ्करजी का वह पुत्र तारकासुर का विनाश करेगा । शङ्करजी की पत्नी जो सती थीं।५७॥ वे किसी कारण से अपने पिता से क्रुद्ध हो गयीं । वह लोक कल्याणकारिणी देवी हिमालय की पुत्री होने वाली हैं॥ ५८॥ उनके विरह में भगवान् शिव त्रैलोक्य को सूना-सूना मानकर सिद्धों के द्वारा सेवित हिमालय की कन्दरा में॥५९॥ हिमाचल पुत्री के जन्म की प्रतीक्षा करते हुए कुछ समय तक निवास करेंगे । उन दोनों की तपस्या के फल स्वरूप जो पुत्र होगा ॥६०॥ वही तारकासुर का विनाश करने वाला होगा । उत्पन्न होते ही वह देवी (पार्वती) थोड़ा सा ज्ञान होते ही ॥६१॥ भगवान् शिव के सङ्गम की लालसा से विरहोत्कण्ठित हो जायेंगी । उन दोनों का सुन्दर तपस्या जन्य
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