Srishti Khanda Extracted Page 582
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-582
Sanskrit Original
असुरस्य च तस्य भयेन गतं सविषादशरीरनिमित्ततया । उपभोग्यतयाधिकृतं सुचिरं विमलद्युतिपूरितदिग्वदनम् ॥३४॥ भवतैवविनिर्मितमादियुगे सुरहेतिसमूहवरं कुलिशम्। दितिजस्य शरीरमवाप्यगतं शतथामतिभेदमिवाल्पविदः ॥३५॥ बाणैश्च युधि विद्धांगा द्वारि द्वास्थैर्निद्शिताः । लब्धप्रवेशाः कृच्छेण वयं तस्यामरद्विषः ॥३६॥ सभायाममरा देव प्रकृष्योपनिवेशिताः । वेत्रहस्तै रजल्पंतस्तथोपहसिताः परैः ॥३७॥ महार्थाः सिद्धसर्वार्था भवंतः स्वल्पभाषिणः। शास्त्रयुक्तमथ ब्रूत माऽमरा बहुभाषिणः ॥३८॥ सभेयं दैत्यसिंहस्य न शक्रस्य विश्वृंखला। वदद्धिरिति दैत्यस्य प्रेष्यै र्विहसिता बहु॥३९॥ ऋतवो मूर्तिमंत श्चाप्यहर्निशमुपासते। कृतापराधं सत्रासं नत्यजंति कथंचन ॥४०॥ तत्रीलयनयोपेतं सिद्धगंधर्वकिन्नरैः । सरागमुपधाविष्टं गीयते तस्य वेश्मसु ॥४९। कृताकृतोपकरणै मिंत्रादिगुरुलाघवः । शरणागतसंत्यागी त्यक्तसत्यप्रतिश्रय: ॥४२॥ इतिनिश्शेषमथवा निश्शेषं केन शक्यते। तस्याविनयमाख्यातुं स्त्रष्टा तत्र परायणम्॥४३॥ इत्युक्त्वा व्यरमद्वायुः शनैर्देवविचेष्टितम् । सुरानुवाचभगवांस्ततः स्मितमुखांबुजः ॥४४॥ ब्रह्मोवाच अवध्यस्तारको दैत्यः सर्वैरपि सुरासुरैः। यस्य वध्यस्स नाद्यापि जातस्त्रिभुवने पुमान् ॥४५॥ मया स वरदानेन छंदयित्वा निवारितः । तपसः सांप्रतं राजा त्रैलोक्यदहनात्मकः ॥४६॥ बनाया है ॥३२॥ उस सुमेरु पर्वत के शिखर को तारकासुर ने अपना निवास स्थान बना लिया हैं । वहाँ की कन्दरयें जो रत्नजटित हैं उनमें बहुत से दैत्य निवास करते हैं ॥३३॥ दीर्घकाल से जिस पर देवताओं का अधिकार था जो प्रकाशमान होने के कारण दिशाओं को प्रकाशित करता था । वह तारकासुर के भय से विषाद युक्त शरीर वाला हो गया है ॥३४॥ सत्ययुग में आपने ही वज्र को देवताओं के शसं में श्रेष्ठ बनाया था, किन्तु वह तारकासुर के शरीर पर पड़कर अज्ञानी जीव के ज्ञान के समान चूर-चूर हो गया ॥३५॥ युद्ध में जिनके अङ्ग विद्ध हो गये हैं, ऐसे हमलोग उस असुरराज के द्वार पर जाकर द्वारपालों के द्वारा जनाये जाने पर बड़ी मुश्किल से प्रवेश कर पाते हैं॥३६॥ हे देव ! समा में शंत्रुओं के द्वारा उपहास पूर्वक विना कुछ बोले हुए तथा द्वारपालो द्वारा नीचे बैठाये जाते हैं ॥३७॥ वे सब कहते हैं, देवता बहुत बोलते है । अतएव आपलोग महान अर्थ वाले है । आप लोगों की सारी कामनायें पूर्ण हैं । अतएव शास्त्रानुकूलं बातें ही तुमलोग बोलो ॥३८॥ तारकासुर के भृत्य कहते हैं कि यह दैत्यराज की सभा है यह इन्द्र की अव्यवस्थित सभा नहीं है । यह कहकर वे बहुत उपहास करते हैं ॥३९॥ सदा भयभीत वनी हुयी ऋतुएँ उस तारकासुर की सेवा में शरीर धारण करके रात-दिन उपस्थित रहती हैं, सिद्ध, गन्धर्व तथा किन्नर सदा वीणा के लय से युक्त उसके भवन में रागयुक्त सदा गायन करते रहते हैं ॥४१॥ कृत्रिम अथवा नित्य साधनों के द्वारा सूर्य इत्यादि बड़े शरणागतों को वह परित्याग करता है । वह सत्य प्रतिज्ञा का परित्याग करने वाला है ॥४२॥ इसतरह से उसके सम्पूर्ण अपराध का वर्णन कौन कर सकता है ? उसके अपराधों के विषय में स्वयं ब्रह्माजी आप ही प्रमाण हैं ॥४३॥ इसतरह से देवताओं की स्थिति का वर्णन करके वायुदेव चूप हो गये । उसके वाद मुस्कुराते हुए ब्रह्माजी ने देवताओं से कहा ॥४४॥ ब्रह्माजी ने कहा-- तारकासुर नामक दैत्य सभी देवताओं और असुरो के लिए अवध्य है । वह जिसके द्वारा मारे जाने वाला है, वह पुरुष, आज तक त्रैलोक्य में उत्पन्न ही नहीं
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