Srishti Khanda Extracted Page 580

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-580

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Sanskrit Original

दृष्ट्वा मूर्त्तिस्थूलसूक्ष्मां चकार ये वै भावाः कारणे केचिदुक्ता: । संभूतास्ते त्वत्त एवादिसर्गे भूयस्तास्त्वां वासनांतेभ्युपेयुः ॥९४॥ त्वत्संकेतस्त्वंतरायो निगूढः: कालो मेयो ध्वस्तसंख्याविकल्पः । भावाभावा व्यक्ति संहारहेतुः सोनंतस्त्वं तस्य कर्ता निधानम् ॥१५॥ स्थूलस्सर्वोनर्थभूतस्ततोन्यस्सोर्थस्सूक्ष्मो यो हि तेभ्योऽपिगीतः । स्थूला भावाश्चावृता यैश्च तेषां तेभ्यः स्थूलस्त्वं पुराणे प्रणीतः ॥१६॥ भूतं भूतं भूतिमद्धूतभावं भावे भावे भावितं त्वं युनक्षि । युक्तं युक्तं व्यक्ति भावान्निरस्य स्थाने स्थाने व्यक्तिवृत्तिं करोषि ॥१७॥ इत्थं देवो व्यक्ति भाजां शरण्यस्त्राता गोप्ता भावितोऽ नंतमूर्तिः । पुलस्त्य उवाच विरेमुरमराःस्तुत्वा ब्रह्माणमिति कारणम् ॥१८॥ तस्थुर्मनोभिरिष्टार्थसंप्राप्तिप्रार्थनास्ततः । एवं स्तुतो विरिंचिस्तु प्रसादं परमं गतः ॥९९॥ अमरान्वरदोप्याह वामहस्तेन निर्दिशन्। ब्रह्मोवाच नारीवाभर्तृकाकस्माद्धस्तसंत्यक्त भूषणा ॥२०॥ न राजसे कुतश्शक्र म्लानवक्त्रसरोरुहः । हुताशन वियुक्तोपि धूमेन न विराजसे ॥२१॥ तृणौघेन प्रतिच्छन्नो दग्धदावश्चिरोषितः । यमामयशरीरेण क्लिष्टोनाद्य विराजसे ॥२२॥ आप ही हैं ॥१३॥ इन सबों को देखकर आपने अपना स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर बना लिया । जितने भी कारण पदार्थ ` बतलाये गये हैं वह सबके सब आदि सर्ग में आप से ही उत्पन्न हुए हैं, और अन्त में (प्रलयकाल में) वे पुन: आप में ही मिल जायेंगे ।।१४।। काल अमेय इत्यादि जितने भी अनन्त भेद हैं, उन सभी भाव, अभाव आदि पदार्थो की अभिव्यक्ति और संहार के कारण स्वरूप निगूढ अन्तरायभूत आपके सङ्केत स्वरूप ही हैं । उन सबों के कर्त्ता, अनन्त स्वरूप आप ही हैं ॥१५॥ जितने भी स्थूल पदार्थ हैं वे सभी अनर्थ स्वरूप हैं । उन सबों से भिन्न जो सूक्ष्म पदार्थ हैं, वे अर्थ स्वरूप बतलाये गये हैं, जिन सबों से स्थूल पदार्थ अध्यवसन्न हैं, उन सबों से आप स्थूल हैं, यह पुराणों में बतलाया गया है ॥१६॥ आप सभी भूतो को भूति सम्पन्न तथा सभी भाव पदार्थो को सोचकर मिला देते हैं तथा समस्त संयुक्त पदार्थो की अभिव्यक्ति को दूर करके आप विभिन्न उचित स्थानों पर उनकी अभिव्यक्ति करते हें। १७॥। इस तरह समस्त व्यक्त पदार्थो के अनन्तमूर्त आप शरण्य, रक्षक तथा गोप्ता रूप से माने जाते हैं । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- इसतरह से जगत् के कारण स्वरूप ब्रह्माजी की स्तुति करके देवगण अपने मनोभिलषित अर्थ की प्राप्ति की इच्छा से चुप लगा गये । इसतरह स्तुति किए जाने पर ब्रह्माजी अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥१८-१९॥ अपने बायें हाथ से देवताओं को वरद मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए वे देवताओं से कहे ब्रह्माजी ने कहा-- हे इन्द्र ! जिस तरह पति विहीन नारी के हाथ के कङ्गन को कोई छीन ले उस तरह से तुम्हारी शोभा को किसने छीन लिया ? तुम्हारा मुखकमल क्यों मुरझाया हुआ है ? हे हुताशन ! (अग्निदेव) धूम से रहित होने पर भी तुम क्यों नहीं सुशोभित हो रहे हों ॥२०-२१॥ वन को जलाकर दीर्घकाल से सोये के समान तथा तृण से ढंके हुए के समान तुम क्यों प्रतीत हो रहे हो ? हे यम ! तुम अपने रुग्ण शरीर से दुःखी के समान सुशोभित नहीं हो रहे हो ॥२२॥ जिसके कारण

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