Srishti Khanda Extracted Page 579

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-579

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

केवलं वासवं त्वेकं मुन्डयित्वा विमुच्यताम्। सितवस्त्र परिच्छन्नं शुनः पादेन चिह्नितम् ॥५॥ एवं कृते ततो देवा दूयमानेन चेतसा। जम्मुर्जजहुरुं द्रष्टुं शरणं कमलोद्भवम् ॥६॥ विनिर्विण्णास्तमासाद्य शिरोभिर्धरणीं गताः । तुष्टुवुः सुष्ठवर्णाढ्यै र्वचोभिः कमलासनम् ॥७॥ देवा ऊचुः नमस्त्वोंकारांकुरादिप्रसूत्यै विश्वस्थानानंतभेदस्य पूर्वम् । संभूतस्यानंतरं सत्त्वमूले संहारेच्छोस्ते नमः सत्त्वमूर्त्ते ॥८॥ व्यक्तीनां त्वामादिभूतं महिम्ना चास्मादस्मानभिधानाद्विचिंत्य । द्यबापृथ्व्यो रूरद्धलोकांस्तथाधश्चांडादस्मात्वं विभागं चकर्थ ॥९॥ व्यक्तंमेरु र्यज्जरायुस्तवाभूद् देवं विद्मस्त्वत्णीतोवकाशः । व्यक्तं देवाजज्ञिरे यस्य देहाद्देहस्यांतश्चारिणो देहभाजः ॥९०॥ द्यौस्ते मूर्धा लोचने चंद्रसूयौं व्यालाः केशाः श्रोत्ररंध्रे दिशस्ते । गात्रं यज्ञः सिंधवः संधयो वै पादौभूमिस्तूदरंते समुद्राः ॥९९॥ मायाकारः कारणात्वंप्रसिद्धोवेदैः शांतोज्योतिरर्कस्त्वमुक्तः । वेदार्थेन त्वां विवृण्वांन्ति बुद्धया हृत्पद्मांत: संनिविष्टं पुराणम् ॥९२॥ त्वां चात्मानं लब्धयोगा गृणंति सांख्ये र्या: स्ताः सप्त सूक्ष्माः प्रणीताः । तासां हेतुर्याष्टमी चापि गीता तास्वंतस्थो जीवभूतस्त्वमेव ॥९३॥ ही मेरा घर है ॥४॥ अकेले इन्द्र का शिर मुड़वाकर तथा उसको उजला वस्र पहनकर तथा उसके शरीर को कुत्ते के चरण चिह्नों से चिहित करके छोड़ दो ॥५॥ इस तरह से किए जाने के वाद दुःखी मन से सभी देवता जगद् गुरु ब्रह्माजी का दर्शन करने के लिए उनके पास गये ॥६॥ अत्यन्त दुःखी देवता ब्रह्माजी के यहाँ जाकर पृथिवी पर माथा टेक कर उनकी स्तुति करने लगे ॥७॥ देवताओं ने कहा-- हे सत्त्वमूर्ते ! आप को नमस्कार है । आप ओंकार स्वरूप हैं, विश्व में उत्पन्न अनन्त भेद रूपी अङ्कुर की उत्पत्ति के लिए आप कारण स्वरूप हें । अतएव आप सर्वप्रथम ब्रह्मारूप से हुए । उसके बाद उसकी रक्षा करने के लिए सत्त्वमूर्त विष्णु रूप से आप होते हैं और जगत् का संहार करने के लिए आप रुद्र रूप धारण किए हैं । आपको नमस्कार है ॥७-८॥ आप ही सभी व्यक्तियों के आदि भूत हैं । आपने अपनी महिमा से विचार करके हमलोगों का नाम रखा है । आपने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का दो विभाग करके ऊपर के लोकों कों आकाश में स्थापित किया है, तथा नीचे के लोकों को पृथिवी पर तथा पृथिवी के नीचे स्थापित किया हैं ॥९॥ यह सुमेरु पर्वत जो आपका जरायू (गर्भ) बना था । इससे लगता है कि यह सम्पूर्ण अवकाश आपका ही बनाया हुआ है । आपके ही शरीर से देवता उत्पन्न हुए । अतएव सभी शरीरधारी आपके शरीर हैं ॥१०॥ द्युलोक आपका शिर है, सूर्य और चन्द्रमा आपके दोनों नेत्र हैं, सर्प ही आपके देह हैं, तथा दिशाएँ आपके कर्ण संप्र हैं । यज्ञ ही शरीर है, नदियाँ ही सन्धि स्थान हैं, पृथिवी ही आपके दोनों पैर हैं और सभी समुद्र आपके उदर स्थान हैं ॥११॥ वेदों ने आपको माया का प्रसिद्ध निर्माण करने वाला, शान्त ज्योति तथा सूर्य स्वरूप बतलाया है । विज्ञ पुरुष वेदार्थ के द्वारा आपकी व्याख्या करते हुए बतलाते हैं कि सवों के हृदय में आप अन्तर्यामी रूप से प्रविष्ट पुराण पुरुष हैं ॥१२॥ योगी पुरुष आपको ही आत्मा बतलाते हैं । सांख्यों का कहना है कि सात जो सूक्ष्म तत्त्व (महान्, अहङ्कार, तथा पञ्च तन्मात्राएँ) हैं, उनके भी कारण स्वरूप जो जीव तत्त्व स्वरूप है, वह प्री N - ‘~

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know