Srishti Khanda Extracted Page 578
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-578
Sanskrit Original
लोकपालांस्ततो दैत्यो बद्धा चेंद्रमुखात्रणे । स रुद्रान्सुदृढै: पाशैः पशुपाल: पशूनिव ॥११०। स भूयोरथमास्थाय जगाम स्वकमालयम् । सिद्धगंधर्वसंघुष्ट विपुलाचलमस्तकम् ॥१ १ ९॥ स्तूयमानोदितिसुतै रप्सरोभिः सुसेवितः। इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे देवासुरसंग्रामे तारकजयो नाम द्विचत्वारिशत्तमोऽध्यायः ॥४२॥ -क््भ्ार तिरालिसवाँ अध्याय पुलस्त्य उवाच प्रादुरासीत्प्रतीहारः शुभ्रचीनांशुकांबरः । सजानुभ्यां महीं गत्वा पिहितास्यश्च पाणिना ॥१॥ उवाचानाविलं वाक्यमल्पाक्षरपरिष्कृतम् । दैत्येद्रमर्कवृंदाभं विभ्रतं भास्वरं वपुः॥२॥ कालनेमिः सुरान्बद्ध्वा प्रादाय द्वारि तिष्ठति। सविज्ञापयतिस्थेयं क्व वंदिनिचयैः प्रभो ॥३॥ तन्निशम्याब्रवीद्वैत्यः प्रतीहारस्य भाषितम्। यथेष्टं स्थीयतामेभिर्गृहं मे भुवनत्रयम् ॥४॥ बाँधकर घर लाओं जिससे कि मेरे पिता बंधे हुए देवताओं को देखें ॥१०९। उसके बाद तारकासुर ने जिस तरह कोई पशु का स्वामी पशुओं को बाँध देता है उसी तरह इन्द्र आदि लोकपालों तथा रुद्रों को पाश में कसकर बाँध कर, रथ पर बैठकर अपने घर चला गया । उसके गृह में सिद्धों एवं गन्धर्वो की ध्वनि होती रहती थी और वह पर्वत शिखिर के समान ऊँचा था ॥१०९-११०॥ उस समय सभी दैत्य उसकी स्तुति करते थे और अप्सरायें उसकी सेवा करती थीं । इस तरह श्रीपद्महापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के देवासुर संग्राम में तारकासुर विजय नामक बयालिसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।४२।। प सभी देवताओं द्वारा ब्रह्माजी की स्तुति, शङ्कर का पुत्र तारकासुर का वध करेगा, यह ब्रह्माजी का कहना, रात्रि देवी को ब्रह्माजी का वरदान, हिमाचल की पत्नी मेना के गर्भ से पार्वती के जन्म का वर्णन, नारदजी द्वारा पार्वतीजी के सामुद्रिक लक्षणों का वर्णन, शङ्करजी का कामदेव को भस्म करना, रतिकृत शङ्करजी की स्तुति, सप्तर्षि पार्वती संवाद, मैं शङ्करजी को ही पति बनाऊंगी यह पार्वती का सप्तर्षियों को कहना, शिव पार्वती विवाह, गणेशजी का वर्णन, वीरक को पार्वतीजी द्वारा अपना पुत्र बनाना, ब्रह्माजी की आज्ञा से पार्वती के शरीर में रात्रि का प्रवेश, पार्वती का काला होना पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- वञ्राङ्गक का द्वारपाल उसके सामने गया वह शुभ्र चीनाशुंक धारण किए हुए था। उसने पृथिवी पर घुटना टेक कर तथा अपने मुख को हाथ से ढंककर ॥१॥ कम अक्षरों वाले शुभ वाक्य को वद्राङ्ग को सुनाया । हे दैत्येन्द्र ! ! कालनेमि नामक दैत्य अनेक सूर्यो के समान कान्ति वाले तथा देदीप्यमान शरीर वाले देवताओं को बाँधकर अपको समर्पित करने के लिए द्वार पर खड़े हैं । वह पूछ रहे हैं कि इन बन्दी बनाये गये देवताओं को कहाँ रखना है ?।।२-३॥। उसे सुनकर वञ्राङ्ग ने कहा इन सबों को जहाँ रहना हो वहाँ रहें त्रैलोक्य
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