Srishti Khanda Extracted Page 577
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-577
Sanskrit Original
श्रीपद्यमहापुराण पवनोऽङ्कुशहस्तश्च विस्तारितमहाजवः । भुजगेंद्रसमारूढो जलेशो भगवान्स्वयम् ॥९७॥ नरयुक्ते रथे देवो राक्षसेशो वियच्चरः। तीक्ष्णखड्गयुतो भीमः समरे समवस्थितः ॥९८॥ महासिंहरथे देवो धनाध्यक्षो गदायुधः । चंद्रादित्यावश्विनौ च चतुरंगवलान्विताः ॥९९॥ सेनान्यो देवराजस्य दुर्जया भुवनत्रये। कोटय स्ताखयखिशह्ेवदेवनिकायिनाम् ॥९० ०॥ हिमाचलाभे सितचारुचामरे सुवर्णपद्मामलसुंदरस््रजि । कृताभिरामोज्ज्वलकुंकुमांकुरे कपोललीलालिकदंबसंकुले ॥१० ९॥ स्थितस्तदैरावणनामकुंजरे महामनाश्चित्रविभूषणांबर: । विशालवञ्रः सुवितानभूषितः प्रकीर्णकेयूरभुजंगमंडलः ॥१० २॥ सहस्त्रदृग्वंदित पादपल्लव स्त्रिविष्टपे$ शोभत पाकशासनः । तुरंगमातंगकुलौघसंकुला सितातपत्रध्वजशालिनी च ॥९०३॥ बभूव सा दुर्जय पत्ति संतता विभाति नानायुधयोधदुस्तरा । ततोश्विनौ च मरुतः ससाध्याः सपुरंदराः ॥१०४॥ यक्षराक्षसगंधर्वा दिव्यनानास्रपाणयः । जधुर्दैत्येश्वरं सर्वे संभूय तु महाबलाः ॥१०५॥ न चैवास्तराण्यसज्जंत गात्रे वज्राचलोपमे । अथो रथादवप्लुत्य तारको दानवाधिपः ॥१०६॥ जघान कोटिशो देवान्करपार्ष्णिभिरेव च । हतशेषाणि सैन्यानि देवानां विप्रदुद्रुवुः ॥१०७॥ दिशो भीतानि संत्यज्य रणोपकरणानि च । दृष्ट्वा तान्विद्वुतान् देवांस्तारको वाक्यमब्रवीत्॥१०८॥ मा वधिष्ठ सुरान् दैत्या वब्रांगाय च मंदिरे। शीघ्रमानीयदश्यंतां बद्धान्पश्यत्वयं सुरान् ॥१०९॥ अपने हाथ में अंकुश धारण करके तथा अपने वेग का विस्तार करके सर्पराज पर सवार थे । स्वयं जल के स्वामी भगवान् वरुण नरयुक्त रथ पर सवार थे । आकाश में संचरण करने वाले राक्षसेश्वर नित्रहति देवता अपने हाथ में तीक्ष्ण खड्ग लेकर युद्ध में उपस्थित थे ॥९८॥ धनाधिप कुबेर महासिंह जिसमें जोते गये थे ऐसे रथ पर बैठे थे । वे अपने हाथ में गदा धारण किए थे । चन्द्रमा, सूर्य और दोनों अश्विनी कुमार अपनी चतुरंगिणी सेना से सम्पन्न ये॥९९॥ देवराज इन्द्र के देवताओं के भिन्न-भिन्न समुदाय के सेनापति त्रैलोक्य में तैतिस करोड़ विख्यात हैं ॥१००॥ उस समय हिमालय के समान कान्ति से सम्पन्न जिस पर दो श्वेत चमर लगे थे, सुवर्ण कमल की माला से समलंकृत जिसके गालों को चमकते हुए कुंकुम से सजाया गया था ऐसे ऐरावण नामक हाथी पर इन्द्र बैठे थे । वे महामना विचित्र आभूषणों तथा वस्नो को धारण किए हुए थे । उनके हाथ में विशाल वज्र था । ऊपर चाँदनी लगी थी । उनकी भुजाओं में केयूर समूह सुशोभित हो रहा था ॥१०१-१०२॥ उनकी एक हजार आँखें थी । उनके चरणों की वंदना देवता करते थे । घोड़े तथा हाथियों के समूह से तथा श्वेत छत्रों से सुशोभित वह सेना ॥१०३॥ सदा दुर्जय के समान प्रतीत होती थी, अनेक आयुधों तथा योद्धाओं के कारण वह दुस्तर थी । उसके बाद दोनों अश्विनी कुमार, मरुद्गण, साध्यगण, इन्द्र, ॥१०४॥ यक्ष, राक्षस, गन्धर्व ये सभी महाबलवान् देवता एक साथ मिलकर अनेक दिव्यास्रों से दैत्येश्वर तारकासुर पर प्रहार करने लगे ॥१०५॥ किन्तु उसके वज्राचल के समान अड्डों पर दिव्यास्तरों का कोई प्रभाव नहीं हो रहा था । उसके बाद दानवाधिप तारकासुर रथ से कूद कर ॥१०६॥ अपने हाथों तथा पैरों से कुचलकर देवताओं को मार डाला । मरने से बची हुयी देवताओं की सेना अपने आयुधों को छोड़कर विभिन्न दिशाआं में भाग गयी । देवताओं को भगे हुए देखकर तारकासुर ने कहा ॥१०७-१०८॥ दैत्यों देवताओं को मत मारो । सबों को 6.
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know