Srishti Khanda Extracted Page 576

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-576

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Sanskrit Original

कार्य किमत्र तदब्रूहि नीत्युपायोपबृंहितम् । एतच्छुत्वा तु वचनं महेंद्रस्थ गिरांपतिः ॥८ ४॥ इत्युवाच महाभागो बृहस्पतिरुदारधीः । बुहस्पतिरुवाच सामपूर्वा श्रुतानीतिश्वतुरंगा पताकिनी ॥८ ५॥ जिगीषतांसुरश्रेष्ठ स्थिति रेषा सनातनी । सामभेदस्तथादानं दंडश्चांगचतुष्टयम् ॥८६॥ न सांत्वगोचरे लुब्ध नभेद्यास्त्वेकधर्मिणः। न दानमत्र संसिद्ध्यै प्रसह्मौवापहारिणाम् ॥८ ७॥ एकोऽ भ्युपायो दंडोऽत्र भवतां यदि रोचते । एवमुक्तः सहस्राक्ष एवमेतदुवाच ह॥८८॥ कर्तव्यतां च संचित्य प्रोवाचामरसंसदि । इंद्र उवाच अवधानेन मे वाचं शृणुध्वं नाकवासिनः ॥८९॥ भवंतो यज्ञभोक्तारो दिव्यात्मानो हि सान्वयाः । स्वे महिप्रिस्थिता नित्यं जगतः पालने रताः ॥९०॥ क्रियतां समरोद्योगः सैन्यं संयोज्यतां मम । आह्वियंतां च शस्त्राणि पूज्यंतां शस्त्रदेवताः ॥९१॥ वाहनानि विमानानि योजयद्ध्वं ममेश्वराः । यमं सेनापतिं कृत्वा शीघ्रमेव दिवौकसः ॥९२॥ इत्युक्तास्समनह्मंत देवानां ये प्रधानतः । वाजिनामयुतेनाजौ हेमघंटा परिष्कृतम् ॥९३॥ नानाश्चर्यगुणोपेतं संप्राप्तं देवदानवैः। रथं मातलिना युक्तं देवराजस्य दुर्जयम्॥९४॥ यमो महिषमास्थाय सेनाग्रे समवर्त्तत । चंडकिंकरबृंदेन सर्वतः परिवारितः ॥९५॥ कल्पकालोद्रतज्वालापूरितोम्बरगोचरः । हुताशनस्त्वजारूढः शक्तिहस्तो व्यवस्थितः ॥९६॥ इन्द्र की बातों को सुनकर बृहस्पति ने कहा ॥८४॥ उदार बुद्धि वाले बृहस्पति ने इसतरह से कहा-- विजयाभिलाषियों की सेना चार अङ्घों वाली बतलायी गयी है ॥८५॥ हे सुरश्रेष्ठ ! यही सनातनी नीति है कि सेना के चार अङ्ग होने चाहिए, साम (शान्ति) भेद (शत्रु की सेना में फूट डालना) दान (शत्रुओं को दान देकर उनको अपने में मिला लेना) और इन सबों से काम न चले तो शत्रु को दण्ड देना चाहिए ॥८६॥ दान व दान और साम नीति के विषय नहीं हो सकते हैं, क्योंकि वे उसके लोभी नहीं हैं । एक धर्म वाले होने के कारण उन पर भेद नीति भी नहीं काम करेगी वे बल पूर्वक अपहरण कर लेने वाले हैं, अतएव यह नीति भी उन पर सफल नहीं होगी ॥८७॥ अतएव यहाँ एक ही उपाय हे, वह है दण्ड । अतएव आपलोगों को अच्छा लगे तो युद्ध करें । बृहस्पति के इस तरह कहने पर इन्द्र ने॥८८॥ आपने कर्तव्य का विचार करके देवताओं की सभा में कहा इन्द्र ने कहा-- हे स्वर्गवासियों ! आपलोग हमारी बात को सावधानी से सुनें ॥८९॥ आप सभी लोग सवंश यज्ञों के भोक्ता, दिव्यात्मा, जगत् की रक्षा करने में संलग्न रहने वाले तथा अपनी महिमा में स्थित रहने वाले हैं ॥९०॥ आप लोग युद्ध की तैयारी करें । मेरी सेना को एकत्रित कर लें, शस््रों को धारण कर लें ओर शस्रों की अधिष्ठातृ देवताओं की पूजा कर लें ॥९१॥ हे देवताओं! आपलोग यमराज को सेनापति बनाकर मेरे वाहनों एवं विमानों को तैयार करें ॥९२॥ इस तरह से कहने पर जो प्रधान देवता थे वे इन्द्र के र्थ को तैयार किए उसमें सुवर्ण के घंटों वाले दश हजार घोड़े जुते थे ॥९३॥ जो रथ देवों एवं दानवों से प्राप्त अनेक आश्चर्य से युक्त था जिसके सारथि मातलि थे, इस प्रकार का इन्द्र का दुर्जय रथ तैयार हुआ ॥९४॥ प्रचण्ड किंकर समूह से घिरे हुए यमराज उस सेना के आगे खड़े थे ॥९५॥ कल्प के अन्त में उत्पन्न होने वाली ज्वाला से युक्त अग्नि देव आपने हाथ में शक्ति धारण करके मेष पर सवार थे ॥९६॥ पवनदेव

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