Srishti Khanda Extracted Page 575
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-575
Sanskrit Original
श्रीपद्यमहापुराण तारकस्य वचः श्रुत्वा ग्रसनो नाम दानव: । सेनानीर्दैत्यराजस्य सज्जं चक्रे बलं च तत् ॥७०॥ आहत्य भेरीं गंभीरां दैत्यानाहूय सत्वरः। दशकोटीश्वरा दैत्या दैत्यानां चंडविक्रमाः ॥७९॥ तेषामग्रेसरो जंभः कुजंभोऽनंतरोऽसुरः । महिषः कुंजरो मेघः कालनेमि र्निमिस्तथा ॥७२॥ मंथनो जंभकः शुम्भो दैत्येंद्रा दशनायकाः। अन्ये चशतशस्तत्र पृथिवी तुलनक्षमाः ॥७३॥ गरुडानां सहस्रेण चक्राष्टक विभूषितः । सकूवरपरीवारश्चतुर्योजनविस्तृतः ॥७४॥ स्यंदनस्तारकस्यासीत् व्याघ्रसिंहखरार्वभिः। युक्ता रथास्तु ग्रसन जंभ कौजंभ कुंभिनाम् ॥७५॥ मेघस्य द्वीपिभिर्युक्तः कूष्मांडैः कालनेमिनः । पर्वताभश्चतुर्दष्टो निमेश्चैवमहागजः ॥७६॥ शतहस्ततुरंगस्थो मंथनो नाम दैत्यराट् । जं भकस्तृष्टमारूढो गिरींद्राभं महाबलः ॥७७॥ शुंभो मेषं समारूढोऽन्येप्येवं चित्रवाहनाः । प्रचंडाश्रित्रवर्माण: कुंडलोष्णीषभूषिताः ॥७८॥ तद्दलं दैत्यसिंहस्य भीमरूपं व्यजायत । प्रमत्तमत्तमातंगतुरंगरथसंकुलम् ॥७९॥ प्रतस्थेऽ मरयुद्धाय बहुपत्तिपताकिकम्। एतस्मिन्नंतरे वायु दॅवदूतोऽ सुरालये ॥८०॥ दृष्ट्वा तद्दानवबलं जगामेंद्रस्य शंसितुम्। स गत्वा तु सभां दिव्यां महेद्रस्य महात्मनः ॥८ १॥ शशंस मध्ये देवानां तत्कार्यं समुपस्थितम् । तच्छुत्वा देवराजस्तु निमीलितविलोचनः ॥८ २॥ बृहस्पतिमुवाचेदं वाक्यं काले महाभुजः । इंद्र उवाच संप्राप्रोति विमर्दोयं देवानां दानवैः सह ॥८३॥ कहा शाघ्र मेरी सेना तैयार करो ॥६८॥ यदि आपलोगों को मेरा प्रिय करना है तो बड़े-बड़े देवताओं को निगृहीत किया जाय । अमुरों देवताओं के निगृहीत हो जाने पर मुझे सर्वाधिक प्रसन्नता होगी ॥६९॥ तारक की बाणी को सुनकर ग्रसन नामक उसका सेनापति दैत्यराज की सेना को तैयार कर दिया ॥७०॥ उसने शीघ्र ही भेरी ताड़न करके सेना को बुलाया । उस सेना में दश करोड़ अत्यन्त बलवान् दैत्य थे ॥७१॥ उन सबों के आगे चलने वाले दश सेना नायक थे । उनका नाम था-- जम्भ, कुजम्भ, महिष, कुञ्जर, मेघ, कालनेमि, मंथन, जम्भक, शुम्भ । वे दशो दैत्येन्द्र के सेनानायक थे । इसके अतिरिक्त अनेक पृथिवी को उठा लेने में समर्थ दैत्य थे ॥७२-७३॥ कूबर से युक्त तारक का रथ चार योजन विस्तृत था । ग्रसन के रथ में व्याघ्र, जम्भ के रथ में सिंह, कुजम्भ के रथ में गधे तथा कुम्भ के रथ में घोड़े जुते थे ॥७५॥ मेघ के रथ में हाथी जुते थे, कालनेमि के रथ में कुष्माण्ड (भूत) जुते थे । कालनेमि का हाथी पर्वत के समान चार दाँतो वाला था ॥७६॥ मंथन नाम का दैत्यराज सौ हाथ के घोड़े पर बैठा था। जंभक ऊंट पर बैठा था महाबलवान् वह देखने में गिरिराज (पर्वतराज) के समान लगता था ॥७७॥ शुम्भ बकरे पर बैठा था दूसरे भी दैत्य विचित्र सवारियों पर बैठे थे प्रचण्ड आकार वाले उन सबों के कवच चित्र-विचित्र थे । वे सब कुण्डल एवं पगड़ी से अलंकृत थे ॥७८॥ दैत्यज की वह सेना अत्यन्त भयङ्कर थी । उस सेना में मदमत्त हाथी घोड़े तथा रथ भरे थे ॥७९॥ अनेक ध्वजों एवं पताकों वाली वह सेना देवताओं के साथ युद्ध करने के लिए प्रस्थान की । उसी समय देवताओं के दूत वायु असुरराज की उस दानवों की सेना को देखकर इन्द्र को बतलाने के लिए गये। वह महेन्द्र की दिव्य सभा में जाकर ॥८०-८१॥ उस उपस्थित कार्य का वर्णन किया । उसे सुनकर इन्द्र ने तो अपनी आँखें बन्द कर ली ॥८२॥ महाभुज इन्द्र ने समयानुसार बृहस्पति से कहा कि देवताओं का दानवों के साथ संग्राम होने वाला है ॥८३। अतएव आप नीति तथा उपाय से युक्त यह बात बतलाइये कि क्या करना चाहिए ?
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