Srishti Khanda Extracted Page 574
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-574
Sanskrit Original
Poe सृष्टिखण्ड ५४९ आजम्मुर्हर्षितास्तत्र तथाचासुरयोषितः । जगुर्हर्षसमाविष्टा नजृतुश्चाप्सरोगणाः ॥५५॥ ततो महोत्सवे जाते दानवानां महाद्युते। विषण्णमनसो देवाः सहेंद्रा अभवंस्तदा ॥५६॥ बरांगीतु सुतं दृष्टवा हर्षेणापूरिता तदा। बहु मेने च दैत्येंद्रो विजातं तं तदा तया ॥५७॥ जातमात्रस्तु दैत्येद्रस्तारकश्चोग्रविक्रमः । अभिषिक्तो सुरै मुख्यैः कुजंभ महिषादिभिः ॥५८॥ सर्वासुरमहाराज्ये पृथिवीतुलनक्षमे। स तु प्राप्तमहाराज्यस्तारको तृपसत्तम॥५९॥ उवाच दानवश्रेष्ठो युक्तियुक्तमिदं वचः तारक उवाच श्रणुध्वमसुराः सर्वे वाक्यं मम महाबलाः ॥६ ०॥ वंशक्षयकरा देवा: सर्वेषामेव दानवाः । अस्माकं जातिधर्मेण विरूढं वैरमक्षयम् ॥६९॥ वयं तपश्चरिष्यामः सुराणां निग्रहाय तु । स्वबाहुबलमाश्रित्य सर्व एव न संशय: ॥६ २॥ तच्छुत्वा संमतं कृत्वा पारियात्र ययौ गिरम् । निराहारः पंचतपाः पत्रभुग्वारि भोजन: ॥६ ३॥ शंत शतं समानां तु तपांस्येतान्यथाकरोत् । एवं तु कर्शिते देहे तपोराशित्वमागते ॥६४॥ ब्रह्मागत्याह दैत्येंद्रं वरं वरय सुव्रत। स वव्रे सर्वभूतेभ्यो न मे मृत्युर्भवेदिति ॥६५॥ तमुवाच ततो ब्रह्मादेहिनां मरणं ध्रुवम्। यतस्ततोपि वरय मृत्यु यस्मान्न शंकसे ॥६६॥ ततः संचिंत्य दैत्येंद्रःशिशोर्वै सप्तवासरात्। वव्रे महासुरो मृत्युं मोहितो ह्यवलेपतः ॥६७॥ जगामोमित्युदाहत्य ब्रह्मा दैत्यो निजं गृहम् । अथाह मंत्रिणस्तूर्णं बलं मे संप्रयुज्यताम् ॥६८॥ यदि वो मत्प्रियं कार्य निग्राह्याः सुरसत्तमाः । निगृहीतेषु मे प्रीतिर्जायते चातुलाऽ सुराः ॥६९॥ आयी । वे प्रसन्न होकर गीत गाने लगीं और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥५४-५५॥ हे महाद्युति सम्पन्न भीष्म ! दानवों के महोत्सव के समाप्त हो जाने पर इन्द्र आदि सभी देवतागण उदास हो गये ॥५६॥ उस समय उत्पन्न हुए पुत्र को देखकर वराङ्गी प्रसन्न हो गयी और उससे उत्पन्न हुए उस पुत्र का दैत्येन्द्र वज्राङ्ग ने बहुत अधिक सम्मान किया ॥५७॥ अत्यन्त पराक्रमी तारक को उत्पन्न होते ही कुजम्भ तथा महिष आदि मुख्य असुरों ने उसे अपना राजा बना दिया ॥५८॥ पृथिवी से जिसकी तुलना की जा सकती है ऐसे सम्पूर्ण असुरों के राज्य का महाराजत्व प्राप्त करके राजश्रेष्ठ तारकासुर ॥५९॥ ने युक्तियुक्त वाणी से कहा तारकासुर ने कहा-- हे महाबलवान् सभी असुरों ! आपलोग हमारी बात को सुनें ॥६०॥ हे दानवों ! देवता हमसबों के वंश का विनाश करने वाले हैं । हमलोगों की जाति तथा धर्म से उन सबों का अत्यधिक वैर बढा हुआ है ॥६१॥ हमलोग तपस्या करके अपने बाहुबल के सहारे देवताओं का निग्रह करेंगे, इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है ॥६२॥ इस बात को सुनकर सबों से विचार करके वह परियात्र पर्वत पर चला गया । वह सौ वर्षो तक निराहार रहकर, पंचाग्नि ताप कर पत्ते चबाकर, तथा केवल पानी पीकर इन सभी तपस्याओं को किया । इसतरह से शरीर के कृश हो जाने पर वह तपोराशि बन गया॥६३-६४॥। ब्रह्माजी ने आकर दैत्येन्द्र तारकासुर से कहा हे सुव्रत ! वरदान माँगो । उसके बाद उसने वर माँगा कि किसी भी जीव से मेरी मृत्यु न हो ॥६५॥ उससे ब्रह्माजी ने कहा कि शरीरधारियों का मरना निश्चित है, अतएव तुम ऐसे से मृत्यु का वरण करो जिससे तुम्हें मृत्यु का कोई भय न हो ॥६६॥ उसके बाद अपने अभिमान से मोहित होने के कारण उसने सात दिन के बच्चे से अपनी मृत्यु को माँगा ॥६७॥ यह सुनकर ब्रह्माजी ने कहा ठीक है । उसके बाद ब्रह्माजी अपने लोक में चले गये और तारकासुर अपने घर लौट आया । उसके बाद उसने मन्त्रियों से
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