Srishti Khanda Extracted Page 572

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-572

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Sanskrit Original

शैल उवाच नाहं महात्रते दुष्टः सेव्योहं सर्वदेहिनाम् । विप्रियं ते करोत्येष रुषितः पाकशासनः ॥३१॥ एतस्मिन्नंतरे जातः कालोवर्षसहस्रकः। तस्मिन् ज्ञात्वा तु भगवान्काले कमलसंभवः ॥३२॥ तुष्टः प्रोवाच ब्रज्रांगं तदागत्य जलाशयम् । ब्रह्मोवाच ददामि सर्वकामं त उत्तिष्ठ दितिनंदन ॥३३॥ एवमुक्तस्तदोत्थाय सदैत्येन्द्रस्तपोनिधिः । उवाच प््रांजलिर्वाक्यं सर्वलोकपितामहम् ॥३४॥ वज्रांग उवाच आसुरो मास्तु मे भावः संतु लोका ममाक्षयाः । तपस्यभिरतिर्मेस्तु शरीरस्यास्य वर्तनम् ॥३५॥ एवमस्त्विति तं देवो जगाम स्वकमालयम् । वद्रांगोपि समाप्ते तु तपसि स्थिरसंयमः ॥३६॥ संगंतुमिच्छन्स्वां भार्या न ददर्शाश्रमे स्वके । क्षुधाविष्टः स शैलस्य गहनं प्रविवेश ह ॥३७॥ आदातुं फलमूलानि स च तस्मिन्व्यलोकयत् । रुदन्तीं स्वां प्रियां दीनां तरुप्रच्छादिताननाम् ॥३८॥ तां विलोक्य ततो दैत्यः प्रोवाच परिसांत्वयन्। वञ्रांग उवाच केन तेऽपकृतं भद्रे यमलोकं यियासुना ॥३९॥ कं वा कामं प्रयच्छामि शीध्रं प्रब्रूहि मानिनि ॥ वरांग्युवाच त्रासितास्म्यपविद्धास्मि ताडिता पीडितास्मि च ॥४०॥ से कहा ॥३०॥ पर्वत ने कहा-- हे महाव्रते ! मैने कोई दुष्टता नहीं की है । मैं तो सबों क लिए सेवनीय हूँ । तुम्हारा अपकार क्रुद्ध होकर इन्द्र कर रहा है ॥३१॥ उसी समय एक हजार वर्ष पूरा हो गया इस बात को जानकर कमल से उत्पन्न होने वाले ब्रह्माजी ॥३२॥ प्रसन्न होकर उस जलाशय पर आये और वज्राङ्ग से कहे । ब्रह्माजी ने कहा-- हे दैत्य ! तुम उठो । तुम्हें मैं सम्पूर्ण अभिलषित वरदानों को दे रहा हूँ ॥३३॥ ब्रह्माजी के इस प्रकार से कहने पर वह तपोनिधि दैत्येन्द्र उठकर तथा हाथ जोड़कर सर्वलोक पितामह ब्रह्माजी से कहा ॥३४॥ वच्जांग ने कहा-- मुझमें असुर भाव न उदित हो, मुझे अक्षय लोक की प्राप्ति हो जब तक मेरा शरीर रहे तब तक मेरा मन तपस्या करने में लगा रहे ॥३५॥ एवमस्तु ! इसतरह से कहकर ब्रह्माजी अपने लोक में चले गये । वज्राङ्ग भी तपस्या के समाप्त हो जाने पर संयम का पालन करते हुए अपनी पत्नी के साथ संगम करना चाहा, किन्तु उसने उसे आश्रम में नहीं देखा । भूख से पीडित होने के कारण वह गहन वन में प्रवेश कर गया ॥३७॥ वह फल मूल लेने के लिए गया था और वहाँ उसने देखा कि पेड़ की ओट में अपना मुँह छिपाकर उसकी पत्नी रो रही थी ॥३८॥ उसको देखकर वज्राङ्ग ने उसे सान्त्वना प्रदान करते हुए कहा चञ्राङ्ग ने कहा- हे भद्रे ! किसने तुम्हारा अपकार किया है ? कौन यमलोक जाना चाहता है ?॥३९॥ हे मानिनि ! तुम शीघ्र बलाओं कि मैं तुम्हारी किस इच्छा को पूरी करूँ । वराङ्गी ने कहा दुष्ट इन्द्र ने मुझे विधवा के समान बहुत अधिक पीटा है, प्रताडित किया है, भयभीतकिया है और त्रास दिया है । जब मैंने अपने दु:ख का अन्त नहीं देखा तो फिर अपने प्राणों का परित्याग करने के लिए तैयार हो गयी ॥४०-४१॥ आप मुझे तारक पुत्र प्रदान करें जिससे मैं इस दुःख सागर से बच सकूँ । वराङ्गी

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