Srishti Khanda Extracted Page 571

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-571

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Sanskrit Original

तपसे मे रति देव निर्विघ्नं तच्च मे भवेत् । त्वत्प्रसादेन भगवन्नित्युक्ता विरराम ह ॥१७॥ तस्मिस्तूष्णीस्थिते दैत्ये प्रोवाचेदं पितामहः । ब्रह्मोवाच तपस्त्वं कुरु मापन्न: सोस्मच्छासनसंस्थितः ॥१८॥ अनया चित्तशुद्या हि पर्याप्तं जन्मनः फलम् । इत्युक्त्वा पद्मजः कन्यां ससर्जायतलोचनाम् ॥१९॥ तामस्मैप्रददौ देवः पत्त्यर्थे पद्मसंभवः । वरांगीति च नामास्याः कृत्वा यातः पितामहः॥२०॥ वञ्रांगोपि तया सार्ध जगाम तपसे वनम् । ऊदुर्ध्वबाहुस्सदैत्येंद्रो चरद्दर्षसहस्रकम् ॥२९॥ कालं कमलपत्राक्षः शुद्धबुद्धिर्महातपाः । तावच्चाधोमुखः कालं तावत्पंचाम्चिमध्यगः ॥२२॥ निराहारो घोरतपास्तपोराशिरजायत । ततः सोतर्जले चक्रे वासं वर्षसहस्रकम् ॥२३॥ जलांतरं प्रविष्टस्य तस्य पत्नी महाब्रता । तस्यैव तीरे सरसः स्थिताऽसौ मौनमाश्रिता ॥२४॥ निराहारं तपोघोरं प्रविवेश महाद्युतिः। तस्यां तपसि वर्तत्यामिन्द्रश्चक्रे विभीषिकाम् ॥२५॥ गत्वा तुमर्कटाकारस्तदाश्रमपदं महत् । वृसीं चकर्ष बलवान् गंधाद्यर्चा करंडकम्॥२६॥ ततस्तु सिंहरूपेण भीषयामास भामिनीम् । ततो भुजंग रूपेणाप्यदशच्चरणद्दयम् ॥२७॥ तपोबलवशात्सा तु न वध्यत्वं जगाम ह । भीषिकाभिरनेकाभिः क्लेशयन् पाकशासनः ॥२८॥ विरराम यदा नैव व्रांगमहिषी तदा । शैलस्य दुष्टतां मत्वा शापं दातुं समुद्यता॥२९॥ तां शापाभिमुखीं दृष्ट्वा शैलः पुरुषविग्रहः। उवाच तां वरारोहां वरांगी भीतलोचनः ॥३०॥ की आज्ञा का पालन किया है ॥१५॥ हे देव ! आप मेरे प्रपितामह हैं ? में आपकी आज्ञा का पालन करता हूँ । मैंने इन्द्र को छोड़ दिया ॥१६॥ मेरा प्रेम तपस्या में है । मै चाहता हूँ कि मेरी तपस्या आपकी कृपा से निर्विघ्न रूप से पूरी हो जाय । इतना कहकर वद्राङ्ग चूप हो गया ॥१७॥ उस दैत्य के मौन हो जाने पर ब्रह्माजी बोले ब्रह्माजी ने कहा-- मेरी आज्ञा में रहकर तुम तपस्या करो ॥१८।। अपने चित्त की शुद्धि के द्वारा तुमने अपने जन्म का फल प्राप्त कर लिया । इस तरह से कहकर ब्रह्माजी ने एक बड़े-बड़े नेत्रों वाली कन्या की सृष्टि कर दी ॥१९॥ उसका नाम उन्होंने वराङ्गी रखा और उसको वद्राङ्ग की पत्नी बना दिया । उसके बाद पितामह ब्रह्माजी चले गये ॥२०॥ वराङ्ग भी उस वराङ्गी के साथ तपस्या करने के लिए वन में चला गया और अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाकर एक हजार वर्ष तक तपस्या करता रहा ॥२१॥ उसके नेत्र कमल दल के समान थे । शुद्ध बुद्धि वाला वह महातपस्वी, उतने ही समय तक नीचे मुख करके पञ्चाग्नि का सेवन करता रहा ॥२२॥ वह घोर तपस्वी निराहार रहता था इस तरह वह तपोराशि हो गया । उसके बाद वह जल के भीतर एक हजार वर्ष तक रहा ॥२३॥ उसके जल में पवेश कर जाने पर उसकी पत्नी भी उसी सरोवर के तट पर मौन होकर बैठ गयी ।॥२४।। वह भी निराहार रहकर घोर तपस्या करने लगी । उसके तपस्या करते समय वहाँ पर इन्द्र ने भय उत्पन्न कर दिया ॥२५॥ बन्दर के आकार में उस आश्रम में प्रवेश करके इन्द्र ने वृषी (मृगचर्म) तथा पूजा की टोकरी की खींच लिया ॥२६॥ उसके बाद इन्द्र ने उसे सिंह का रूप धारण करके डराया । उसके बाद सर्प का रूप धारण करके उसने वराङ्गी के दोनों पैरों में काट लिया ॥२७॥ किन्तु अपनी तपस्या के बल से वराङ्गी मरी नहीं जब इन्द्र अनेक प्रकार के भयों को उत्पन्न करना नहीं छोड़ा तो यह सारा उत्पात पर्वत के द्वारा किया हुआ जानकर वह पर्वत को शाप देने के लिए तैयार हो गयी॥२८-२९॥ उसको शाप देने के लिए उद्यत देखकर पर्वत ने मनुष्य शरीर धारण करके भयभीत होकर वराङ्गी

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