Srishti Khanda Extracted Page 570

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-570

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

श्रोतुमिच्छामि ते ब्रह्मन्यथाभूतः कृतं च यत् । तारकश्च कथंभूतो दानवो बलवत्तरः ॥२॥ कार्तिकेयेन स ब्रह्मन्कथं ध्वस्तो महासुरः । कथं रुद्रेण मुनयः प्रेषिता मंदरं गिरिम् ॥३॥ कथं लब्धा उमा तत्र रुद्रेण परमेष्ठिना। एतदाख्याहि मे सर्व यथाभूतं महामुने ॥४॥ पुलस्त्य उवाच कश्यपेन पुरा प्रोक्ता दिति दैत्यारणिः शुभा। वञ्रसारमयैश्चांगैः पुत्रो देवि भविष्यति॥५॥ वञ्रांगोनामपुत्रस्तु भविता धर्मवल्सलः। सा च लब्धवरा देवी सुषुवे वज्रदुश्छिदम् ॥६॥ स जातमात्र एवाभूत्सर्वशास्त्रार्थपारग:। उवाच मातरं भक्त्या मातः किं करवाण्यहम् ॥७॥ तस्योवाच ततो हृष्टा दितिर्दैत्याधिपस्य तु । बहवो मे हताः पुत्राः सहस्राक्षेण पुत्रक॥८॥ तेषामपचितिं कर्तु गच्छ शक्रवधाय तु। बाढमित्येव तां चोक्ता जगाम त्रिदिवं बलात् ॥९॥ बध्वा ततः सहस्राक्षं पाशेनामोघवर्चसा। मातुरंतिकामागच्छद्व्याधः क्षुद्रमृगं यथा ॥१०॥ एतस्मिन्नंतरे ब्रह्मा कश्यपश्च महातपाः । आगतौ तत्र यत्रास्तां माता पुत्रावभीतकौ ॥१९९॥ दृष्ट्वा तु तावुवाचेदं ब्रह्मा कश्यप एव च । मुंचैनं पुत्रदेवेंद्रं किमनेन प्रयोजनम् ॥१ २॥ अवमानो वध: प्रोक्तः पुत्र संभावितस्य तु । अस्मद्वाक्येन योमुक्तस्त्वद्धस्तान्मृत एव सः॥९३॥ परस्य गौरवान्मुक्तः शत्रूणा शत्रुराहवे । सजीवन्नेव हि मृतो दिवसे दिवसे पुनः ॥१४॥ एतच्छुत्वा तु व्रजांगः प्रणतो वाक्यम्रवीत्। न मे कृत्यमनेनास्ति मातुराज्ञा कृता हि मे ॥१५॥ त्वं सुरासुरनाथो वै मान्यश्च प्रपितामहः । करिष्ये त्वद्चो देव एष मुक्तः शतक्रतुः॥९६॥ मुझे संक्षेप में शङ्करजी की महिमा तथा कार्तिकेय (गुह) की उत्पत्ति को सुनाइये ॥१॥ हे ब्रह्मन् ! इस प्रसङ्ग को मैं सुनना चाहता हूँ, तारकासुर इतना अधिक बलवान कैसे हो गया ॥२॥ कार्तिकेय ने उसका विनाश कैसे किया ? रुद्र ने मुनियों को मन्दराचल पर क्यों भेजा ?॥३॥ वहाँ पर परमेष्ठी रुद्र ने किस प्रकार उमा को प्राप्त किया ? हे ब्रह्मन्! इन सारी बातों को आप मुझे ठीक-ठीक सुनायें ॥४।। पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- महर्षि कश्यप ने पूर्वकाल में दैत्यों की माता दिति को यह वरदान दिया कि तुम्हारा पुत्र वज्र के सदृश अङ्गों वाला होगा ॥५॥ तुम्हारे धार्मिक पुत्र का नाम वञ्राङ्ग होगा । महर्षि कश्यप के वरदान को प्राप्त करके दिति ने वज्राङ्ग को जन्म दिया । उसके अङ्गों को काटना अत्यन्त कठिन था ॥६॥ उत्पन्न होते ही वह समस्त शास्त्रों का ज्ञाता हो गया । उसने भक्तिपूर्वक अपनी माता से कहा माँ में तुम्हारा कौन सा कार्य करूँ 2॥७॥ उस दैत्याधिप की बात को सुनकर दिति प्रसन्न हो गयी और कहा-- पुत्र ! इन्द्र ने मेरे अनेक पुत्रों को मार दिया है ॥८।। उन सबों का बदला लेने के लिए तुम जाकर इन्द्र को मार दो । बहुत अच्छा कहकर वज्राङ्ग भी स्वर्गलोक में चला गया ॥९॥ और अमोघ वर्चस्वी वद्राङ्ग इन्द्र को पाश से उसीतरह से बाँधकर अपनी माता के पास लाया जैसे कोई बहेलिया छोटे मृग को बाँध लेता है ॥१०॥ उसी समय ब्रह्माजी तथा महर्षि कश्यप दिति और वद्राङ्ग के पास आये ॥१०॥ ब्रह्माजी तथा कश्यप महर्षि दोनों ने कहा वत्स ! इसे तुम मुक्त कर दो इससे तुम्हारा कौन सा लाभ है ?॥११-१२॥ किसी सम्मानित व्यक्ति का अपमान उसकी मृत्यु के ही समान होता है । हमलोगों के कहने से यदि तुम इसे छोड़ देते हो तो इसे मरा हुआ ही समझो ॥१३॥ किसी बड़े की बात मानकर युद्ध में शत्रु के द्वार छोड़ा गया शत्रु तो जीवित होकर भी मरा हुआ है । वह तो प्रतिदिन मरता है ॥१४॥ इस बात को सुनकर वञ्राङ्ग ने नम्रतापूर्वक कहा-- मेरा इससे कोई प्रयोजन नहीं है । मैने अपनी माता 3. ७

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know