Srishti Khanda Extracted Page 569
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-569
Sanskrit Original
दक्षिणाश्चोपपद्यंतां याज्ञिकैश्च पृथक् पृथक् । गाश्वसूर्यो रसान्सोमो वायुः प्राणांश्च प्राणिषु ॥३९३॥ तर्पयन्तः प्रवर्ततामेते सौम्यैः स्वकर्मभिः । यथावदनुपूर्वेण महेंद्रमलयोद्भवाः ॥३९४॥ त्रैलोक्यमातरः सर्वाः समुद्रं यांतु सिंधवः। दैत्येभ्यस्त्यज्यतांभीश्च शांतिं व्रजत देवताः ॥३१५॥ स्वस्ति वोस्तुगमिष्यामि ब्र्मलोकंसनातनम् । स्वगृहे स्वर्गलोके वा संग्रामे वा विशेषत: ॥३१६॥ विश्वस्तैश्च गंतव्यं नित्यं क्षुद्राहि दानवाः। छिद्रेषु हरन्त्यिते न तेषां संस्थितिर्श्ुवा ॥३१७॥ सौम्यानां निजभावानां भवतामार्जवे मनः । एवमुक्त्वा सुरगणान् विष्णुस्सत्यपराक्रमः ॥३१८॥ जगाम ब्रह्मणा सार्द्ध ब्रहालोक॑ महायशाः । देवानां महतीं प्रीतिमुत्पाद्य भगवान्प्रभुः ॥३९९॥ एतदाश्चर्यमभवत्संग्रामे तारकामये। दानवानां च विष्णोश्च यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥३२०॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे पद्मोद्धवदेवासुरयुद्धे नामैकचत्वारिशत्तमोऽध्यायः ॥४१॥ —— ee बयालिसवाँ अध्याय भीष्म उवाच श्रुतः पद्मोद्भवो ब्रह्मन् विस्तरेण त्वयेरितः । समासाद्भवमाहात्म्यमुत्पत्तिं च गुहस्य च॥९॥ पृथिवी, सोम रसों को तथा वायु प्राणियों के प्राणों को ।।३१३॥ तृप्त करते हुए अपने-अपने सौम्य कर्मों को करते रहें । पहले के ही समान महेन्द्र तथा मलय पर्वत से निकलने वाली लोकमाता सभी नदियाँ समुद्रगामिनी हो जायं । अब दैत्यों के भय को त्याग दें और सभी देवता शान्ति का अनुभव करें ॥३१४-३१५॥ आप सबों का कल्याण हो मैं सनातन ब्रह्मलोक में जा रहा हूँ अपने घर में या स्वर्ग लोक में अथवा विशेष रूप से संग्राम में ॥३१६॥ दानवों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए, दानव स्वभाव से क्षुद्र प्रकृति वाले होते हैं । वे मौका पाते ही प्रहार करने लग जाते हैं । इन सबों की स्थिर प्रवृत्ति नहीं होती हे ॥३१७॥ शान्त स्वभाव वाले होने के कारण आप लोगों का मन सदा सरल बना रहता है । इस तरह देवताओं से कहकर सत्य पराक्रम महायशस्वी भगवान् विष्णु देवताओं को अत्यन्त प्रसन्न करके ब्रह्माजी के साथ ब्रह्मलोक चले गये ॥३१८-३१९॥ तारकामय संग्राम में भगवान् विष्णु और दानवों के बीच यही आश्चर्य कार्य हुआ जिसके विषय में आपने मुझसे पूछा है ॥३२०॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के पद्मोद्भव देवासुर संग्राम वर्णन नामक एकतालिसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ४९।। — ke शङ्करजी का माहात्म्य वर्णन, दिति के पुत्र वद्राङ्ग की उत्पत्ति, वज्राड़ द्वारा इन्द्र को बन्दी बनाकर उनको दिति के पासा लाना, ब्रह्म तथा कश्यप की आज्ञा से इन्द्र को मुक्त करना, ब्रह्माजी द्वारा वराङ्गी को वद्राङ्ग की पत्नी के रूप में प्रदान, वच्राड़ तथा वराङ्गी की तपस्या, ब्रह्माजी द्वारा वज्राङ्ग को वरदान, तारकासुर की उत्पत्ति और उसकी तपस्या, ब्रह्माजी द्वारा तारकासुर को वरदान, तारकासुर का इन्द्र के साथ युद्ध तथा देवताओं की पराजय भीष्मजी ने कहा-- हे ब्रह्मन् ! मैंने आपके मुख से पद्म की उत्पत्ति का विस्तार से वर्णन सुना अब आप
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