Srishti Khanda Extracted Page 568
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-568
Sanskrit Original
त्वामेतस्य ऋते ह्यस्मिन् शास्ता कश्चिन्न विद्यते । एष देवान्परिभवन्लोकांश्च सचराचरान् ॥२९८॥ ऋषीणां कदनं कृत्वा मामपिप्रतिगर्जति । तदनेन त्वदीयेन परितुष्टोस्मि कर्मणा ॥२९९॥ यदयं कालकल्पस्ते कालनेमिर्निपातितः । तदागच्छस्व भद्रं ते गच्छाम दिवमुत्तमाम् ॥३००॥ ब्रह्मर्षयस्त्वां तत्रस्थाः प्रतीक्षते सदोगताः। कं चाहं तव दास्यामि वरं वरभृतांवर ॥३०९॥ स्वस्थानस्थेषुदेवेषु तेषां च वरदो भवान् । निर्यातमेतत्रैलोक्यं स्फीतं निहतकंटकम् ॥३ ० २॥ अस्मिन्नेव मृधे विष्णो शक्राय सुमहात्मने। एवमुक्तो भगवता ब्रह्मणा हरिरव्ययः ॥३०३॥ देवान् शक्रमुखान्सर्वानुवाच शुभया गिरा। विष्णुरुवाच श्रूयतां त्रिदशास्सर्वे यावंतोऽत्र समागताः ॥३०४॥ सुपर्णसहितैस्तत्र पुरस्कृत्य पुरंदरम्। अस्माभिः समरे सर्वैः कालनेमिमुखा हताः ॥३०५॥ दानवाविक्रमोपेताः शक्रादपि महत्तराः । अस्मिन्महति संग्रामे द्वावेव तु विनिस्सृतौ ॥३०६॥ विरोचनस्तुदैतेयः स्वर्भानुश्च महाबलः । स्वां दिशं भजतां शक्रो दिशं वरुण एव च॥३०७॥ याम्यां यमः पालयतामुत्तरां च धनाधिपः | ऋश्ैः सह सदायोगं गच्छतां चंद्रमास्तथा ॥३०८॥ अयमृतुमुखं सूर्योभजतामयनैः सह । आज्यभागाः प्रवर्ततां सदस्यै रभिपूजिताः ॥३०९॥ हूयंतामग्नयो विप्रर्वेददृष्टेन कर्मणा । देवाश्च बलिहोमेन स्वाध्यायेन महर्षयः ॥३१०॥ श्राद्धेन पितरश्चैव तुष्टिं यांतु यथासुखम्। वायुश्चरतु मार्गस्थस्त्रिधादीप्यतु पावकः ॥३११॥ त्रयोवर्णाश्च लोकांसतरीस्तपर्पयंत्वात्मजैर्गुणैः । क्रतवः संप्रवर्ततां दीक्षणीयैर्हिजातिभिः ॥३१२॥ सचराचर लोकों तथा देवताओं को अभिभूत करते हुए ॥२९८॥ ऋषियों को काटकर यह मुझको भी धमकाता था । अतएव आपके इस कर्म से मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ ॥२९९॥ आपने इस काल के समान कालनेमि को मारा है । अब आप आइये, हमलोग उत्तम द्युलोक में चलें ॥३००॥ वहाँ पर सभा में ब्रह्मर्षिणण आपके आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं । हे बरदान देने वालों में श्रेष्ठ भगवन् ! मैं आपको कौन सा वरदान दूँ ॥३०१॥ देवताओं के अपने पदों पर आसीन हो जाने पर आप उन सबों को वरपद्रान करने वाले हैं । इसी संग्राम में इन्द्र को नि:शत्रु त्रैलोक्य का राज्य प्रदान कर दिया है । ब्रह्माजी के इस प्रकार से कहने पर अव्यय भगवान् श्रीहरि ने ॥३०३॥ इन्द्र इत्यादि देवताओं से कहा भगवान् विष्णु ने कहा-- जो देवता यहाँ उपस्थित हैं वे सब मेरी बात सुनें ॥३०४।। गरुड इत्यादि हम सबों ने इन्द्र को आगे करके कालनेमि इत्यादि दानवों को मारा है ॥३०५॥ ये दानव इन्द्र से भी अधिक पराक्रम सम्पन्न थे । इस संग्राम में दो दैत्य बचे हुए हैं ॥३०६॥ विरोचन नामक दैत्य तथा महाबलवान् राहु । अब इन्द्र अपनी पूर्व दिशा का. प्रशासन करें, वरुण पश्चिम दिशा का प्रशासन करे ॥३०७॥ दक्षिण दिशा का स्वामित्व यमराज करें और उत्तर दिशा का पालन. कुबेर करें ।_चन्द्रमा भी सभी नक्षत्रों के साथ संयोग को प्राप्त कर लें ॥३०८॥ ऋतु प्रधान सूर्य अयनों के. साथ रहें और सदस्यों के द्वारा यज्ञं में पूजित होकर आज्यभाग का उपभोग करें ॥३०९॥ ब्राह्मणगण वैदिकविधि से अग्नि में होम करें । देवता लोग बलि तथा होम् से, महर्षिगण स्वध्याय (वेदाध्ययन) के द्वार ॥३१०॥ तथा पितृगण श्राद्ध के द्वारा संतुष्ट होए । वायु अपने मार्ग. से चलें तथा तीनों प्रकार के अग्निदेव प्रदीप्त हो जायँ ॥३११॥ तीनों वणो के लोग अपने गुणों के द्वारा तीनों लोकों का आप्यायित करें । दीक्षित ब्राह्मणों के द्वारा क्रतुओं का अनुष्ठान किया जाय ॥३१२॥ याज्ञिके-पुरुषं अलग-अलग अपनी दक्षिणा प्राप्त करें । सूर्य
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know