Srishti Khanda Extracted Page 567
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-567
Sanskrit Original
प्ड्र श्रीपद्ममहापुराण क्रव्यादानि च भूतानि तृप्तिं यांति महामृधे । तमप्रतिमकर्माणं समानं सूर्यवर्चसा ॥२८३॥ चक्रमुद्यम्य समरे कोपदीप्तो गदाधरः । प्रष्टं दानवं तेजः कुर्वाणं स्वेन तेजसा ॥२८४॥ चिच्छेद बाहूस्तेनैव समरे कालनेमिनः। तच्च वक्त्रशतं घोरं साम्निचूर्णाट्ठहासि वै॥२८५॥ तस्य दैत्यस्य चक्रेण प्रममाथ बलाद्धरिः । सच्छिन्नबाहुर्विशिरानप्राकम्पत दानवः ॥२८६॥ कबंधावस्थितः संख्ये विशाख इवपादपः । तं वितत्यमहापक्षौ वयोः कृत्वासमंजवम् ॥२८७॥ उरसा ताडयामास गरुड: कालनेमिनम् । सतस्य देहोभिमुखो विबाहुः खात्परिभ्रमन् ॥२८८॥ निपपात दिवं त्यक्त्वा क्षोभयन्धरणीतलम्। तस्मिन्निपतिते दैत्ये देवाः सर्षिगणास्तथा ॥२८९॥ साधुसाध्विति वैकुंठं समेताः प्रत्यपूजयन् । अपरे ये तु दैत्या वै युद्धे दृष्टपराक्रमाः ॥२९०॥ ते सर्वे बाहुभिर्व्याप्ता न शेकुश्चलितुं रणे । कांश्चित्केशेषु जग्राह कांश्चित्कण्ठेष्वपीडयत् ॥२९१॥ चकर्त कस्यचिद्दक्त्र मध्ये गृह्णात्तथापरम्। ते गदाचक्रनिर्दग्था गतसत्वा गतासवः ॥२९२॥ गगनादभ्रष्टसर्वांगा निपेतुर्धरणीतले । तेषु सर्वेषु दैत्येषु हतेषु पुरुषोत्तम: ॥२९३॥ शक्रप्रियं ततः कृत्वा कृतकर्मगदाधरः । तस्मिन्विमर्दे संवृत्ते संग्रामे तारकामये॥२९४॥ तं च देशं जगामाशु ब्रह्मालोकपितामहः । सर्व ब्रह्मर्षिभिः सार्द्ध गंधर्वाप्सरसां गणैः ॥२९५॥ देवदेवं हरिं देवः पूजयन्वाक्यमब्रवीत्। कृतं देवमहत्कर्म सुराणां शल्यमु्ूतम् ॥२९६॥ निधनेन च दैत्यानां वयं च परितोषिताः । योऽयं त्वया हतो विष्णो कालनेमिर्महासुरः ॥२९७॥ और महासंग्रामों में मांसभक्षी जीव तृप्त हो जाते हें । उस अप्रतिम कर्म को करने वाले तथा सूर्य के समान चमकने वाले ॥२८३॥ चक्र को उठाकर युद्ध में क्रोध से लाल हुए भगवान् विष्णु ने अपने तेज से दानव के तेज को विनष्ट करते हुए ॥२८४॥ उस चक्र से कालनेमि की भुजाओं को काट दिया । अट्टहास करते समय जिनसे अग्नि की चिनगारो निकलती थी ऐसे उस दानव के सैकड़ों मुखों को भगवान् श्रीहरि ने बलपूर्वक चक्र से काट दिया । जिसकी भुजाएँ और शिर कट गये थे वह दानव क॑पा नहीं ॥२८५-२८६॥ उसका शरीर ठूंठे पेड के समान संग्राम स्थल में खड़ा था । उसको अपने पङ्घों को फैलाकर तथा वायु के वेग से युक्त करके ॥२८७॥ गरुड ने अपनी छाती से धक्का दिया और उसका वह भुजा और शिर से रहित शरीर आकाश से पृथिवी पर नाचता हुआ गिर पड़ा ॥२८८॥ वह आकाश का परित्याग करके परथिवी को कँपाता हुआ गिरा । उसके गिर जाने पर देवताओं तथा महर्षियों ने बहुत अच्छा कहकर इस कार्य का अभिनंदन किया । दूसरे दैत्य जो युद्ध में अपने पराक्रम को प्रदर्शित कर चुके थे वे सबके सब श्रीमगवान् की भुजाओं से व्याप्त होने के कारण हिल-डुल न सके । भगवान् ने कुछ दानवों के केश को पकड़ लिया, कुछों के गले को दबा दिया ॥२८९-२९१॥ कुछों के शिर को काट दिया, कुछ दानवों को बीच से काट दिया । इसतरह से गदा और चक्र के तेज से दग्ध होने के कारण वे सब मर गये ॥२९२॥ जिनके सभी अङ्ग नष्ट भ्रष्ट हो गये थे वे दानव आकाश से नीचे गिर पड़े । उन सभी दैत्यों के मार दिए जाने पर भगवान् पुरुषोत्तम।२९३॥ उस तारकामय युद्ध के समाप्त हो जाने पर अपने काम को पूरा करके भगवान् विष्णु ने इन्द्र को प्रसन्न कर दिया ॥२९४॥ उसी स्थान पर शीघ्र ही लोक पितामह ब्रह्माजी आ गये, उनके साथ ऋषिगण, गन्धर्व तथा अप्सराओं का समूह था ॥२९५॥ उन्होंने देवदेव श्रीहरि की पूजा करते हुए कहा हे देव ! आपने देवताओं के शत्रु को मारकर बहुत बड़ा काम किया है ॥२९६॥ दैत्यों की मृत्यु से हम पूर्णत: सन्तुष्ट हैं । हे भगवन् !आपने जो इस कालनेमि नामक महाअसुर को मारा है ॥२९७॥ इसको आपको छोड़कर दूसरा कोई नहीं मार सकता था । सम्पूर्ण
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