Srishti Khanda Extracted Page 566
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-566
Sanskrit Original
सबाहुशतमुद्यम्य सर्वायुधगणान्रणे। क्रोधादद्विगुणरक्ताक्षो विष्णोर्वक्षस्यपातयत् ॥२६८॥ दानवाश्चापि समरे मयतारपुरोगमाः । उद्यतायुधनिस्त्रिंशा विष्णुमभ्यद्रवन्रणे ॥२६९॥ सताड्यमानोऽतिबलै दैत्यैः सर्वायुद्योद्यतैः। न चचाल ततो युद्धे कंप्यमान इवाचलः ॥२७०॥ संयुक्तश्च सुपर्णेन कालनेमिर्महासुरः । सर्वप्राणेन महतीं गदामुद्यम्य बाहुभिः ॥२७१॥ घोरां ज्वलंती मुमुचे संरब्धो गरुडोपरि। कर्मणा तेन दैत्यस्य विष्णुर्विस्मयमागमत् ॥२७२॥ तदा तेन सुपर्णस्य पातिता मूर्ध्नि सा गदा। सुपर्ण व्यथितं दृष्ट्वा क्षतं च वपुरात्मनः ॥२७३॥ क्रोधसंरक्तनयनो वैकुंठाश्चक्रमाददे । व्यवर्द्धत च वेगेन सुपर्णेन समं विभुः ॥२७४॥ भुजाश्चास्य व्यवर्धत व्याप्तवंतो दिशो दश । विदिशश्चैव खं चापि गां चैव प्रतिपूरयन् ॥२७५॥ ववृधे स पुनरलोकान्क्रांतुकाम इवोजसा । तं जयाय सुरेंद्राणां वर्द्धमानं नभस्तले ॥२७६॥ ऋषयः सहगंधर्वास्तुष्टुवु मधुसूदनम् । स द्यां किरीटेन लिखन् शिरसा भास्वरेण च॥२७७॥ पदभ्यामाक्रम्य वसुधां दिशः प्रच्छाद्य बाहुभिः । सहस्रकरतुल्याभं सहस्रारमरिक्षयम् ॥२७८॥ दीप्ताप्रिसदृशं घोरं दर्शनेन सुदर्शनम् । सुवर्णरेणुपर्यतं वज्रनाभं भयावहम् ॥२७९॥ मेदोस्थिमज्जारुधिरैः सिक्तं दानवसंभवैः। अद्वितीयं प्रहरणं क्षुरपर्यंतमंडलम्॥२८०॥ स्रग्दाममालानिचितं कामगं कामरूपिणम्। स्वयं स्वयंभुवा सृष्टं भयदं सर्वविद्विषाम्॥२८९॥ दधार रोषेणाविष्टं नित्यमाहवदर्पितम्। क्षेपणाद्यस्य मुह्यति लोकाः सस्थाणुजंगमाः॥२८२॥ हाथों में आयुध धारण किया ॥२६७॥ वह अपनी सैकड़ों भुजाओं को उठाकर युद्ध में अपने समस्त आयुधों का प्रहार श्रीभगवान् के वक्षस्थल पर किया । उस समय उसकी आँखें क्रोध के कारण दो गुना लाल हो गयी थीं॥२६८॥ मय तथा तार आदि दानव भी अपने आयुधों को उठाकर भगवान् विष्णु पर टूट पड़े ॥२६९॥ भगवान् विष्णु उन अत्यन्त बलवान् दैत्यों के द्वारा भी सभी आयुधों के द्वारा मारे जाते हुए विचलित नहीं हुए । वे पर्वत के समान अचल बने रहे ॥२७०॥ गरुड के साथ संयुक्त होकर कालनेमि ने अपनी जलती हुयी गदा को उठाकर पूण जोर लगाकर गरुड के ऊपर प्रहार किया । कालनेमि के उस कर्म को देखकर भगवान् विष्णु आश्चर्यित हो गये ॥२७१-२७२॥ उसने अपनी गदा से गरुड के शिर पर प्रहार किया । गरुड को व्यथित देखकर तथा अपने शरीर को क्षत-विक्षत देखकर ॥२७३॥ क्रोध से आँखें लाल करके श्रीभगवान् ने अपने हाथ में चक्र को उठा लिया और वे बड़े वेग से गरुड के साथ बढने लग गये ॥२७४॥ उनकी भुजाएँ बढकर दशो दिशाओं में व्याप्त हो गयीं। विदिशाएँ, आकाश तथा पृथिवी भर में वे व्याप्त हो गयीं असुरेन्द्रो पर विजय प्राप्त करने के लिए आकाश में बढ़ते हुए भगवान् विष्णु की स्तुति गन्धर्वो तथा ऋष्यों ने की । श्रीभगवान् अपने देदीप्यमान शिर तथा किरीट से आकाश को छू रहे थे ॥२७५-२७७॥ पृथिवी पर खड़ा होकर तथा भुजाओं से दिशाओं को आच्छादित करके सूर्य की किरणों के समान कान्ति वाले श्रीभगवान् शत्रुओं का विनाश करने वाले तथा हजारों अरों वाले ॥२७८॥ जलती हुयी अग्नि के समान भयङ्कर, देखने में सुन्दर लगने वाले सुवर्ण के पराग से युक्त, वज्र के समान नाभि वाले, भय उत्पन्न करने वाले ॥२७९॥ दानवों के मेदस मांस तथा रक्त से संसिक्त, अद्वितीय आयुध क्षुर प्रदेश पर्यन्त मण्डलकार ॥२८०॥ माला से अलंकृत अपने मनोऽनुकूल चलने वाले, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, जिसका निर्माण स्वयं ब्रह्माजी ने किया था, उस शत्रुओं को भयभीत करने वाले ॥२८१॥ युद्ध के दर्प सें दृप्त सुदर्शन चक्र को श्रीभगवान् ने अपने हाथ में उठा लिया । जिसका प्रहार करने पर स्थावर जंगात्मक लोक बेहोश हो जाता है॥२८२॥
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