Srishti Khanda Extracted Page 565

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-565

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Sanskrit Original

जुड श्रीपदामहापुराण अयं स किल युद्धेषु सुरार्थे त्यक्तजीवितः । सविभुस्तेजसा युक्तं चक्रं क्षिपति शत्रुषु ॥२५२॥ अयं स कालो दैत्यानां कालभूते मयि स्थिते। अतिक्रांतस्य कालस्य फलं प्राप्स्यति केशवः ॥२५३॥ दिष्ट्येदानीं समक्षं मे विष्णुरेष समागतः । निष्धिष्टो बाहुना संख्ये मय्येव प्रणशिष्यति ॥२५४॥ यास्याम्यपचितिं दिष्ट्या पूर्वेषामद्य संयुगे । इमन्नारायणं हत्वा दानवानां भयावहम् ॥२५५॥ क्षिप्रमेव हनिष्यामि रणेऽमरगणानहम् । जात्यंतरगतोप्येष बाधते दानवान्मृधे॥२५६॥ एषोनंतःपुरा भूत्वा पद्मनाभ इति श्रुतः । जघानैकार्णवे घोरे तावुभौ मधुकैटभौ ॥२५७॥ द्विधा भूतं वपुः कृवा सिंहस्यार्द्ध नरस्य च। पितरं मे जघानैको हिरण्यकशिपुं पुरा ॥२५८॥ यं सुतं गर्भमाधत्त ह्वादितिर्देवतारणिः । त्रीन् लोकानाजहारैकः क्रममाणस्त्रिभिः क्रमैः ॥२५९॥ भूयस्त्विदानीं संप्राप्ते संग्रामे तारकामये । मया सह समागम्य सदेवो विनशिष्यति ॥२६०॥ एवमुक्त्वा बहुविधं क्षिप्रं नारायणं रणे । वाग्भिरप्रतिरूपाभि ् युद्धमेवाभ्यरोचयत् ॥२६१॥ क्षिप्यमाणोऽ सुरेन्द्रेण न चुकोप गदाधरः । क्षमा बलेन महता सस्मितं चेदमब्रवीत् ॥२६२॥ अल्पं दर्पबलं दैत्यस्थिरमक्रोधजं बलम् । हतस्त्वं दर्पजैदोषै हित्वा यो भाषसे क्षमाम् ॥२६३॥ अधमस्त्वं मम मतो धिगेतत्तव वाग्बलम् । के तत्र पुरुषाः संति यत्र गर्जाति योषितः ॥२६४॥ अहं त्वां दैत्य पश्यामि पूर्वेषां मार्गगामिनम् । प्रजापतिकृतं सेतुं त्यक्त्वा कः स्वस्तिमान्भवेत् ॥२६५॥ अद्या त्वां नाशयिष्यामि देवव्यापारघातकम्। स्वेषु स्वेषु च स्थानेषु स्थापयिष्यामि देवताः॥२६६॥ एवं ब्रुवति वाक्ये तु मृधे श्रीवत्सधारिणि । जहास दानवः कोधाद्धस्तांश्चक्रेण सायुधान् ॥२६७॥ अपने चक्र से शत्रुओं पर प्रहार करता है ॥२५२॥ काल स्वरूप मेरे रहते हुए दैत्यों का काल है । इसने काल का अतिक्रमण किया है । यह इसका फल प्राप्त करेगा ॥२५३॥ भाग्यवशात् इस समय यह मेरे सामने आ गया है । युद्ध में मैं इसे पिस दूँगा और यह मेरे द्वारा विनष्ट हो जायेगा ॥२५४॥ इस नारायण को युद्ध में मारकर आज में अपने पूर्वजों की पूजा को सम्पन्न करूँगा यह दानवों के लिए अत्यन्त भयङ्कर है ॥२५५॥ इसके बाद मैं शीघ्र ही देवताओं को युद्ध में मार डालूँगा । देव जाति का होने के कारण यह युद्ध में दानवों को दुःख देता है ॥२५६॥ एकार्णव की बेला में अनन्त बनकर पद्मनाभ शब्द से अभिहित किया जाने वाले इसने मधु एवं कैटभ का बध किया २५७॥ इसने आधा सिंह तथा आधा मनुष्य दो तरह का शरीर बनाकर अकेले ही मेरे पिता हिरण्यकशिपु को मार दिया ॥२५८॥ देवताओं की माता ने इसको अपने गर्भ में धारण किया और इसने तीन डग में तीनों लोकों को ले लिया ॥२५९॥ वह पुन: इस तारकामय युद्ध में मेरे साथ युद्ध करके विनष्ट हो जायेगा ॥२६०॥ इसतरह अनेक प्रकार से अनुचित वाणियों से आक्षेप करने के बाद उसने युद्ध करना चाहा ॥२६१॥ अनेक प्रकार से असुरेन्द्र के द्वार आक्षिप्त होकर भी क्षमा बल से युक्त श्रीभगवान् क्रुद्ध न होकर मुस्वराते हुए कहे ॥२६२॥ हे दैत्य घमण्ड का बल अल्प होता है क्षमा का बल स्थिर होता है । तुम अपने अभिमानजन्य दोषों से ही मार दिए गये हो क्योंकि तुम क्षमा का परित्याग करके बोल रहे हो ॥२६३॥ मेरे मतानुसार तुम अधम हो, तुम्हारे इस वाणी के बल को धिक्कार है । जहाँ पर स्रिया गरजती है, वहाँ पर कायर पुरुष रहते हैं ॥२६४॥ हे दैत्य ! मैं देखता हूँ कि तुम भी अपने पूर्वजों के ही मार्ग पर चलते हो । प्रजापति के द्वारा निर्मित मार्ग का परित्याग करके कौन कुशल से रह सकता है॥२६५॥ देवताओं के व्यापार को विनष्ट करने वाले तुमको में आज मारूँगा । तथा देवताओं को मैं उनके पदों पर स्थापित करूंगा ॥२६६॥ जब श्रीवत्सचिह्ृधारी श्रीभगवान् बोल रहे थे, उसी समय वह दानव जोर से हँसा और

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