Srishti Khanda Extracted Page 564

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-564

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Sanskrit Original

स स्वयंभूरिवाभाति महाभूतपतिर्महान् । सर्वलोकमयो दैत्यः सर्वलोकभयावहः ॥२३७॥ स लोकपालैकवपुश्चंद्रसूर्यग्रहात्मतानू । पावकानिलसंभूतो रराज युधि दानवः ॥२३८॥ पारमेष्ठ्ये स्थितः स्थाने लोकानां प्रभवोषमे। तं तुष्टुवु दैत्यगणा देवा इव पितामहम् ॥२३९॥ पंच तं नाभ्यवर्तत विपरीतेन कर्मणा। वेदो धर्मः क्षमा सत्यं श्रीश्च नारायणाश्रया ॥२४०॥ स तेषामनुप स्थानात्सक्रोधो दानवेश्वरः । वैष्णवं पदमन्विच्छन्स गतो देवता यतः ॥२४९॥ स ददर्शसुपर्णस्थं शंखचक्रगदाधरम् । दानवानां विनाशाय भ्रामयंतं गदां शुभाम् ॥२४२॥ स जलांभोदसद्शं विद्युत्सदृशवाससम् । आरूढं स्वर्णपत्राढ्यं खेचरंकाश्यपं खगम् ॥२४३॥ दुष्टदैत्यविनाशाय दृष्ट्वा खस्थमिवस्थितम् । दानवो विष्णुमक्षोभ्यं बभाषे क्षुब्धमानसः॥२४४॥ अयं स रिपुरस्माकं पूर्वेषां प्राणनाशनः। अर्णवावासिनश्चैव मधोश्च कैटभस्य च॥२४५॥ अयं स रिपुरस्माकमसमः किल कथ्यते । अनेकसंयुगेऽनेन दानवा बहवो हताः ॥२४६॥ अयं स निर्घृणो लोके स्त्रीबालनिरपत्रपः । येन दानवनारीणां सौीमंतोद्धरणं कृतम् ॥२४७॥ अयं स विष्णुर्देवानां वैकुंठश्च दिवौकसाम् । अनंतो भोगिनां मध्ये स्वयंभूश्च स्वयंभुवः ॥२४८॥ अयंसनाथोदेवानामस्माभिर्विप्रकृष्यते । अस्य क्रोधं समासाद्य हिरण्यकशिपु हत: ॥२४९॥ अस्य च्छायामुपाश्रित्य देवा मखमुखे स्थिताः । आज्यं महर्षिभिर्दत्तमश्नुवंति त्रिधा हुतम् ॥२५०॥ अयं स निधने हेतुः सर्वेषाममरद्विषाम् । अस्य चक्रप्रविष्टानि कुलान्यस्माकमाहवे॥२५१९॥ प्रथिवी के समान प्रतीत होने लगा । वह सभी लोकों को भयभीत बनाने वाला दैत्य सर्वभूतमय हो गया ॥२३७॥ . सम्पूर्ण लोकपाल शरीरक अग्नि तथा वायु से उत्पन्न वह दानव युद्ध में सुशोभित हो रहा था । चन्द्रमा, सूर्य आदि ग्रह उसके शरीर बन गये थे ॥२३८॥ लोकों की उत्पत्ति स्थान के समान वह ब्रह्माजी के पद पर जाकर बैठ गया, तथा सभी दैत्यगण उसकी उसी तरह स्तुति करने लगे जिस तरह देवता ब्रह्माजी की स्तुति करते हैं ॥२३९॥ उसके विपरीत कर्म के कारण, वेद, धर्म, क्षमा, सत्य तथा नारायणाश्रित लक्ष्मीदेवी ये पाँचों उसका अनुवर्तन नहीं किए ॥२४०॥ इन सबों की अनुपस्थिति से क्रुद्ध हुआ वह दानवेश्वर; भगवान् विष्णु के लोक में वैष्णव पद की इच्छा से गया॥२४१॥ उसने, शङ्क, चक्र तथा गदा धारण करने वाले, गरुड पर बैठे हुए तथा दानवों का विनाश करने के लिए अपनी शुभ गदा को घुमाते हुए श्रीभगवान् को देखा ॥२४२॥ उसने जल भरे मेघ के समान, विद्युत् के समान देदीप्यमान वस्त्र धारण किए हुए, तथा सुवर्ण के समान देदीप्यमान पङ्क वाले गरुड पर बैठे हुए भगवान् विष्णु को देखा ॥२४३॥ दुष्ट दैत्यों का विनाश करने के लिए आकाश में स्थित अक्षोभ्य भगवान् विष्णु को देखकर क्षुब्ध मन वाले उस दानव ने कहा ॥२४४॥ यह समुद्रवासी हमारे पूर्वज मधु एवं कैटभ का शत्रु है ॥२४५॥ यह हमलोगों का असाधारण शत्रु कहलाता है । अनेक युद्धा में इसने बहुत से दानवों को मार दिया है ॥२४६॥ यह लोक में स्त्री तथा बालकों के प्रति निष्ठुर तथा निर्लज्ज है । इसने दानवों की स्त्रियों के माँग का सिंदूर धो दिया है ॥२४७॥ यह देवताओं का विष्णु है । स्वर्ग वासियों का वैकुण्ठ है सर्पो में यह अनन्त है तथा ब्रह्मा में यह स्वयम्भू है ॥२४८॥ यह देवताओं का स्वामी है, तथा हमलोगों से सदा दूर रहता है । इसके ही क्रोध का विषय बनकर हिरण्यकशिपु मारे गये ॥२४९॥ इसके ही आश्रय को प्राप्त करके देवता यज्ञा में स्थित रहते हैं, और महर्षियों द्वारा प्रदत्त एवं होम किए गये घृत का पान करते हैं ॥२५०॥ यही समस्त दैत्यों की मृत्यु का कारण है । इसके चक्र में हमारे अनेक वंश प्रवेश कर गये ॥२५१॥ यह देवताओं के लिए अपने प्राण का न्योछावर करो वाला है । यह तेज से सम्पन्न

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