Srishti Khanda Extracted Page 563
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-563
Sanskrit Original
श्रीपद्यमहापुराण ऊरुवेगप्रमथितै: शृंगशैलाग्रपादपैः । अपातयद्देवगणान्वज्रेणेव महागिरीन् ॥२२३॥ बाहुभिश्च सनिस्त्रिशैश्रिछत्नभिन्नशिरोरुहा:। न शेकुश्चलितुं देवा: कालनेमिहता युधि॥२२४॥ मुष्टिभि निहताः केचित्केचिच्चद्विदलीकृता: । यक्षगंधर्वपतगा: समहोरगकिन्नराः ॥२२५॥ तेनवित्रासिताः पेतुः समरे कालनेमिना । न शेकुर्यत्मवंतोपि यत्नं कर्तुं विचेतस: ॥२२६॥ तेन शक्रःसहस्त्राक्षोऽ स्पंदितः शरबंधनैः । निष्प्रयत्नः कृतः संख्ये चलितुं न शशाक ह॥२२७॥ निर्जलांभोदसद्शो निर्जलार्णवसप्रभः । निर्व्यापारः कृतस्तेन विपाशो वरुणो मृधे ॥२२८॥ रणे वैश्रवणस्तेन परीतः कालरूपिणा । विलपन् लोकपालेशस्त्याजितो धनदः क्रियाम्॥२२९॥ यमः सर्वहरस्तेन मृत्युप्रहरणो रणे । याम्यामवस्थां संत्यज्य भीतः स्वां दिशमाविशत्॥२३०॥ सलोकपालानुत्सार्य हत्वा तेषां च कर्म तत् । दिक्षु सर्वासु देहं स्वं चतुर्धाविदधे तदा ॥२३१॥ सनक्षत्रपथंगत्वा दिव्यंस्वर्भानुदर्शितम् । जहारलक्ष्मीं सोमस्य यच्चास्य विषयं महत् ॥२३२॥ चालयामास दीप्तांशुं धर्म द्वारासभास्करम्। शासनं चास्यविषयं जहार दिनकर्म च॥२३३॥ सोंग्रिंदेवमुखं जित्वा चकारात्ममुखाश्रयम्। वायुं च तरसा जित्वा चकारात्मवशानुगम् ॥२३४॥ ससमुद्रात्समानीयसमस्ताः सरितो बलात् | चकाराभिसुखा वीर्या देहभूताश्च सिंधवः ॥२३५॥ अपः स्ववशगाः कृत्वा दिविजायाश्च भूमिजा: । छादयामास जगतीं सुगुप्तां धरणीधरैः ॥२३६॥ अनेक प्रकार के अखों, धनुषों तथा परिधों से युक्त अपने हाथों से दिव्य आकाश को छेंक लिया था ॥२२१॥ उसके वस्र वायु से फरफरा रहे थे । उसकी युद्ध करने की इच्छा थी वह सायंकालीन सूर्य की किरणों से चमकने वाली शिलाओं से युक्त सुमेरु पर्वत के समान प्रतीत होता था ॥२२२॥ अपने जङ्घो के वेग से तोड़े गये पर्वत के शिखरों पर विद्यमान बड़े-बड़े वृक्षों से वज्र के प्रहार से गिरे हुए पर्वतों के समान देवताओं को गिरा रहा था ॥२२३॥ उसने हाथों में निख्िंश धारण करके देवताओं के शिरों को काट दिया । कालनेमि के आयुधों से मारे गये देवता चल भी नहीं पा रहे थे ॥२२४॥ कुछ देवताओं यक्षों गन्धर्वो सर्पो तथा किन्नरों को उसने मुक्के से मार दिया तथा कुछ देवताओं को चीर दिया ॥२२५॥ कालनेमि से भयभीत होकर वे युद्ध में गिर पड़े तथा प्रयास करके भी वे युद्ध करने के लिए नहीं उठ सके ॥२२६॥ उसने इन्द्र को बाणों के बन्धनों से बाँध दिया तथा उन्हें प्रयत्न हीन बना दिया जिससे वे हिल-डुल भी नहीं सके ॥२२७॥ जल रहित मेघ के समान, तथा जल रहित समुद्र के सदृश कान्ति वाले वरुण को उसने युद्ध में निर्व्यापार तथा पाश विहीन बना दिया ॥२२८॥ युद्ध में काल के समान कालनेमि, से घिरे हुए कुबेर विलाप करते हुए अपने धन प्रदान की क्रिया को त्याग दिये ॥२२९॥ सबों के प्राण को हरने वाले तथा मृत्यु रूपी अस्त्र को धारण करने वाले यमराज को उसने युद्ध में मरे जैस बनाकर उन्हें दक्षिण दिश में भेज दिया॥२३०॥ उसने लोकपालों को भगाकर तथा उनके कर्मो का हरण करके सम्पूर्ण दिशाओं में अपने शरीर को चार प्रकार का बना दिया ॥२३१॥ वह नक्षत्र मार्ग में जाकर दिव्य राहु के रूप में दिखा और चन्द्रमा के राज्य की महान लक्ष्मी का हरण कर लिया उसने सूर्य को अपने तेज से भगा दिया तथा इन के रात तथा दिन करने के कर्म का हरण कर लिया ॥२३३॥ वह अग्नि देव की ज्वाला को जितकर अपने मुख में रख लिया और वायु को बलपूर्वक जितकर अपने अधीन बना लिया ॥२३४॥। उसने समुद्र से बलपूर्वक सभी नदियों को जितकर उन सबों को अपने अभिमुख बहने वाली बनाया और सभी नदियाँ उसका शरीर बन गयीं ॥२३५॥ वह स्वर्ग तथा भूलोक के समस्त जलों को स्ववशवर्ती बनकर संसार की सम्पूर्ण पृथिवी को पर्वतों से ढँक दिया।२३६॥ महाभूतों के स्वामी वह
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