Srishti Khanda Extracted Page 562

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-562

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Sanskrit Original

दुंदुभीनां च निर्ह्लादो दैत्यमंतर्दधुः स्वनम् । तेन्योन्यमभिसंपेतु र्यातयंत: परस्परम् ॥२०७॥ बभंजुर्बाहुभि बहियुद्धमन्ये युयुत्सव: । देवानामशनीर्घोराः परिधांश्रोत्तमायुधान्॥ २ ० ८॥ निखिंशान्ससृजुः संख्ये गदागुर्वीश्च दानवाः । गदानिपातैर्भग्रांगा बाणैश्च शकलीकृताः ॥२०९॥ परिपेतुर्भृशं केचित्पुनः केचित्तु जघ्निरे। ततो रथैश्चतुरगैर्विमानैश्च गजादिभिः ॥२९०॥ समीयुस्तेतिसंरब्धा रोषादन्योन्यमाहवे । संवर्त्तमानास्समरे संदष्टौष्टपुटाननाः ॥२ ९ ९॥ रथारथैर्नियुध्यंते पादाताश्च पदातिभिः । तेषां रथानां तुमुलः सशब्दः शब्दवाहिनाम् ॥२१२॥ नभोनभस्वान् हि यथा नभस्ये जलदस्वनैः । बभंजिरे रथान्केचित्केचित्संमृदितारथैः ॥२९३॥ संबाधमन्ये संप्राप्ता न शेकुश्चलितुं रथाः । अन्योन्यमध्ये समरे दोर्भ्यामुत्क्षिप्य दंशिताः ॥२९४॥ संहादमाणास्सबला जन्नुस्तत्रासिचर्मिणः । अस्त्रैरन्ये विनिर्भिन्ना रक्तं वेमुर्हता युधि ॥२९५॥ क्षरज्जलानां सदृशा जलदानां समागताः । अन्योन्यबाणवर्षेण युद्धदुर्दिनमाबभौ ॥२९६॥ एतस्मिन्नंतरे क्रुद्धः कालनेस्सि दानवः। अवर्धतसमुद्रौधैः पूर्यमाण इवांबुदः ॥२९७॥ तस्य विद्युल्लतापीडाः प्रदीप्ताशनिवर्षिणः । गात्रैर्नगगिरिप्रख्यै विनिपेतुर्बलाहकाः ॥२९८॥ क्रोधान्निश्चसतस्तस्य भ्रूभेदस्वेदवर्षिणः । साम्निस्फुलिंगाः प्रतता मुखान्निश्चेरुर्चिषः ॥२९९॥ तिर्यगूर्ध्वं च गगने ववृधुस्तस्य बाहवः । पर्वतादिवनिष्क्रांताः पंचास्या इव पन्नगा: ॥२२०॥ सोस्रजालै बहुविधे र्धनुभिः परिधैरपि। दिव्यमाकाशमावत्रे पर्वतैरुच्छ्तिरिव ॥२२९॥ सोनिलोद्धूतवसनस्तस्थौ संग्रामलालसः । संध्यातपग्रस्तशिलः साक्षान्मेरुरिवाचलः ॥२२२॥ ध्वनि दव गयी । वे परस्पर में एक दूसरे पर प्रहार करते हुए युद्ध करने लगे ॥२०७॥ युद्ध करने के लिए उत्सुको ने अपनी भुजाओं से दूसरे की भुजा को ऐंठ दिया और देवताओं के भयङ्कर वज्रों तथा उत्तम परिधायुधों को विनष्ट कर दिया ॥२०८॥ दानवों ने युद्ध में भारी गदाओं और निस््िंशों की सृष्टि कर दी । गदा के प्रहार से दानवों के अङ्ग टूट गये थे तथा वाणों से कट गये थे ॥२०९॥ बहुत से बीर गिर पड़े और कुछ प्रहार कर रहे थे । उसके पश्चात् वे रथों, अश्वों, विमानों तथा हाथियों आदि से अत्यन्त क्रोध पूर्वक युद्ध करने लगे । युद्ध मे विद्यमान वीरों ने क्रोध से अपने ओठों को काट लिया ॥२११॥ एक रथी दूसरे रथी से युद्ध कर रहे थे तथा पैदल पैदल सेना से युद्ध कर रहे थे । उनके शब्द करने वाले रथों की तुमुल ध्वनि श्रावण में गरजने वाले आकाश की ध्वनि के समान प्रतीत हो रही थी । कुछ बीरों ने रथों को तोड़ दिया तथा कुछ बीर रथों से मसल गये ॥२१२-२१३॥ कुछ रथ वीच में दब जाने के कारण चल नहीं सके । युद्ध में वीरों ने एक दूसरे को अपनी भुजाओं से खींचकर मार दिया ॥२१४॥ खड्ग तथा ढाल धारण किए हुए बलवान् वीर प्रसन्न होकर, मर रहे थे । दूसरे वीर अखों से मारे जाने के कारण खून वमन कर रहे थे ॥२१५॥ जल बरसाने वाले मेधों के समान बाणों की वर्षा से दुर्दिन जैसी प्रतीति होने लगी।२१६। उसी समय कालनेमि दानव उसतरह से बढने लगा जैसे समुद्री वाढ से मेघ बढ रहा हो ॥२१७॥ उसकी शिखा में लगी हुयी माला के समान विद्युलताएँ प्रदीप्त वज्र की वर्षा कर रही थीं । पर्वत शिखर के समान अङ्गों के द्वारा उसने मेघों को गिरा दिया ॥२१८॥ वह क्रोध से लम्बी श्वास ले रहा था । उसकी भुकुटि से पसीना बह रहा था । उसके फैले हुए मुख से चारो ओर अग्नि की चिनगारी फैल रही थी ॥२१९॥ वह अपनी भुजाओं को तिरछा करके आकाश में उसे ऊपर की ओर फैलाये हुए था । लग रहा था उसके हाथ जैसे पर्वत से निकले हुए विषैले पाँच मुखों वाले सर्प हों ॥२२०॥ वह आकाश को छू रहा था ऊँचे पर्वतों के शिखरों के समान वह अपने

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