Srishti Khanda Extracted Page 560

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-560

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Sanskrit Original

तं कालनेमिं समरे द्विषतां कालनेमिनम् । वीक्षंतेस्स सुराः सर्वे भयविह्लललोचना: ॥१७७॥ तं वीक्षेतेस्म भूतानि ग्रसंतं कालनेमिनम् । त्रिविक्रमं विक्रमंतं नारायणमिवापरम् ॥१७८॥ सोभ्युच्छूयं पुनः प्राप्तोमारुताधूणितांबरः । प्राक्रामदसुरो योद्धं त्रासयन्सर्वदेवताः ॥९७९॥ समेयिवान्सुरेन्द्रेण परिष्वक्तो भ्रमन्रणे । कालनेमिर्बभौ दैत्यः सविष्णुरिव मंदरः ॥९८०॥ अथविव्यथिरे देवाः सर्वेशक्रपुरोगमाः । कालनेमिनमायांतं दृष्ट्वा कालमिवापरम्॥१८ १॥ दानवाननुपिप्रीषुः कालनेमिर्महासुरः । व्यवर्धतमहातेजास्तपांते जलदो यथा ॥१८२॥ तं त्रैलोक्यांतरगतं दृष्ट्वा ते दानवेश्वराः। उत्तस्थुरपरिश्रांताः पीत्वेवामृतमुत्तमम् ॥१८३॥ ते वीतभयसंत्रासा मयतारपुरोगमाः । तारकामयसंग्रामे सततं जितकाशिनः ॥१८४॥ रेजुरायोधनगता दानवा युद्धकांक्षिणः । मंत्रमभ्यसतां तेषां व्यूहं च परिधावताम् ॥९८५॥ परेक्षतां चाभवत्प्रीति दनिवं कालनेमिनम्। ये तु तत्र मयस्यासन्मुख्या युद्धपुरस्सराः ॥१८६॥ ते तु सर्वे भयं त्यक्त्वा हृष्टा योद्धमुपस्थिताः। मयस्तारो वराहश्च हयग्रीवश्च दानवः ॥१८७॥ विप्रचित्तिसुतः श्वेतः खरलंबावुभावपि । अरिष्टो बलिपुत्रश्च किशोराख्यस्तथैव च ॥१८८॥ स्वर्भानुश्चामरप्रख्यश्चक्र योधी महासुरः। एतेस्त्रवेदिनः सर्वे सर्वे तपसि सुस्थिता: ॥१८९॥ दानवाः कृतिनो जग्मुः कालनेमिनमुद्धतम् । ते गदाभिस्सुगुर्वीभिश्चक्रैर थपरश्वधैः॥। १९ ०ना कालकल्पैश्च मुसलैः क्षेपणीयैश्च मुद्ररैः । अश्मभिश्चाद्रिसदृशैस्तथा शैलैश्च दारुणैः ॥९९॥ करने के कारण जो कुछ चंचल हो गया था ॥१/७५॥ इस प्रकार के उठे हुए लम्बे दाहिने श्रेष्ठ हाथ से वह देवताओं द्वारा मारे गये दानवों को उठो-उठो इस प्रकार से कहते हुए ॥१७६॥ समर में उससे द्वेष करने वालों के लिएःकाल के समान कालनेमि को सभी देवताओं ने भय से व्याकुल नेत्रों से देखा ॥१७७॥ देवों ने उसः कालनेमि को सभी भूतों को खाते हुए त्रिविक्रमावतारधारी दूसरे नारायण के समान पग संचार करते हुए के समान देखा ॥१७८॥ आकाश में संचरण करने वाले वायु के द्वारा अपनी ऊँचाई को प्राप्त किए हुए वह असुर देवताओं को भयभीत-करते हुए युद्ध करने के लिए आगे बढ रहा था ॥१७९॥ रण में घूमता हुआ वह इन्द्र के साथ युद्ध करने के लिए आया। वह कालनेमि दानव विष्णु से युक्त मंदराचल पर्वत के समान सुशोभित हो रहा था ॥१८०॥ दूसरे काल के समान आते हुए कालनेमि को देखकर देवतागण अत्यन्त दुःखी हुए ॥१८१॥ उस कालनेमि नामक महाअसुर ने दानवों को प्रसन्न कर दिया । ग्रीष्म ऋतु के अंत में उठने वाले मेघ के समान वह महातेजस्वी.बढ गयाः ।।१८२॥ त्रैलोक्य के अन्तर्गत विद्यमान उसको देखकर बड़े-बड़े दानव अत्यन्त प्रसन्न हुए । अमृत-का पान करक उत्साहित देवताओं के समान वे युद्ध करने के लिए उठ खड़े हुए ॥१८३॥ मय तथा तार इत्यादि! सभी दानव भय एवं त्रास से रहित हो गये । वे सभी तारकामय संग्राम में विजय प्राप्त करने वाले थे ॥१८४॥ युद्ध चाहने वाले सभी दानव युद्धस्थल में जाकर सुशोभित हो रहे थे, वे मन्त्रों को जप रहे थे और परिघ धारण करके इधर-उधर' दौड़ रहे थे।१८५॥ वे कालनेमि को देखकर प्रसन्न हो गये । जो मय दानव के युद्ध में मुख्य रूपः से आगे रहते'थे॥।१८६॥ वे सभी भय का परित्याग करके युद्ध करने के लिए युद्धस्थल में उपस्थित हो गये । ऐसे दानव थे मय; तार, वराह, हयग्रीव ॥१८७॥ विप्रचित्ति पुत्र श्वेत, खर, लंबु दोनों बलि के पुत्र अरिष्ट तथा किशोर ।। १८८॥ देवताओं के समान प्रतीत होने वाले सुभानु जो चक्र से युद्ध करता था । ये सभी अखों के ज्ञाता थे, ये सबके सब तपस्या करने वाले थे।१८९॥ ये सभी दानव महाबलवान् कालनेमि की सेना में जाकर मिल गये । भारी गदाओं; क्रों, फरसों १९०॥

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