Srishti Khanda Extracted Page 559
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-559
Sanskrit Original
यज्ञशोभिषु देवेषु स्वर्गमार्गदिशत्सु च । लोकपालेषु सर्वेषु दिक्षुसंधानवर्तिषु ॥९६२॥ भावे तपसि सिद्धानामभावे पापकर्मणाम् । देवपक्षे प्रमुदिते दैत्यपक्षे विषीदति ॥९६३॥ त्रिपादविग्रहे धर्मेऽधर्मे पादपरिग्रहे । अपावृत्ते महाद्वारे वर्तमाने च सत्पथे॥१६४॥ लोकेषु घर्मवृत्तेषु प्रवृततेष्वाश्रमेषु च । प्रजारक्षणयुक्तेषु राजमानेषु राजसु ॥१६५॥ प्रशांतेषु च लोकेषु शांते तमसि दानवे। अभ्निमारुतयोस्तस्मिन्वृत्त संग्रामकर्मणि ॥१६६॥ तन्मयाविमला लोकास्ताभ्यां जयकृतक्रियाः। तीब्रं दैत्यभयं श्रुत्वा मारुताग्निकृतं महत् ॥१६७॥ कालनेमीतिविख्यातो दानवः प्रत्यदृश्यत । भास्कराकारमकुटः शिंजिताभरणांगदः ॥१६८॥ मंदराद्रिप्रीकाशो महारजतसंवृतः । शतप्रहरणोदग्रः शतबाहुः शताननः ॥१६९॥ शतशीर्षः स्थितः श्रीमान् शतश्रंग इवाचलः । कक्षे महति संवृद्धो निदाध इव पावकः॥१७०॥ धूम्रकेशो हरिश्मश्नु तुरो विकटाननः। त्रैलोक्यांतरविस्तारं धारयन्विपुलं वपुः ॥१७९॥ बाहुभिस्तुलयन्व्योम क्षिपन्पद्धयांमहीधरान् । ईरयन्मुखनिःश्वासै ृ ष्टिकारान् बलाहकान् ॥१७२॥ । तिर्यगायतकरक्ताक्षं मंदरोदग्रवर्चसम् । दिधक्ष॑तमिवायांतं सर्वान्देवगणान्मृधे ॥१७३॥ ` तर्जयंतं सुरगणांश्छादयंतं दिशो दश । संवर्तकाले हृषितं दृष्टं मृत्युमिवोत्थितम्॥१७४॥ सुतलेनोच्छ्यवता विपुलांगुलिपर्वणा । लंबाभरणपूर्णेन किंचिच्चलितकर्मणा ॥१७५॥ उच्छितेनाग्रहस्तेन दक्षिणेन वपुष्मता । दानवान्देवनिहतान् ब्रुवन्तं तिष्टतेति च ॥१७६॥ मार्ग को बतलाने लगे । दिशाएँ परस्पर में संयुक्त हो गयीं ॥१६१-१६२॥ जब सिद्धों तथा तपस्वियों का प्राधान्य हो गया तथा पापियों का अभाव हो गया, देवपक्ष प्रसन्न हो गया तथा दैत्य पक्ष सङ्कटापन्न हो गया ॥१६३॥ धर्म तीन चरणों वाला हो गया तथा अधर्म का एक ही चरण वाला रह गया । मुक्ति का महाद्वार खुल गया, सन्मार्ग स्थित हो गया।१६४॥ सभी लोग धर्म के कार्यो को करने लगे तथा आश्रमों की व्यवस्था व्यवस्थित हो गयी । राजागण प्रजाऑं | की रक्षा करके सुशोभित होने लगे ॥१६५॥ वायु तथा अग्नि के द्वारा युद्ध करने के बाद सारा संसार शान्ति का अनुभव करने लगा तथा दानव रूप अन्धकार विनष्ट हो गये ॥१६६॥ अग्नि तथा वायु के सडय़ाम करते समय सारे लोक स्वच्छ हो गये, और वे दोनों विजयी हो गये । इस तरह अग्नि तथा वायु द्वारा उत्पादित दैत्यों के लिए भयङ्कर भय को सुनकर ॥१६७॥ कालनेमि के नाम से विख्यात दानव दिखायी पड़ा । वह सर्प के समान देदीप्यमान मुकुट धारण किये था । उसके अङ्गद नामक भूषण से ध्वनि आ रही थी ॥१६८। उसका आकार मंदराचल पर्वत के समान विशालकाय था वह चाँदी के अभरणों से ढँका था भयङ्कर सैकड़ों आयुधों को धारण किये था । उसके सैकड़ों हाथ और सैकड़ों मुख थे ॥१६९॥ वह सैकड़ों शिरों के द्वारा सैकड़ों शिखरों वाले पर्वत के समान प्रतीत होता था। वह विस्तृत कक्ष (इन्धन) में समृद्ध हुयी अग्नि के समान प्रतीत होता था ॥१७०॥ उसके धुएँ के समान केश काली काली दाढी, निकले हुए दाँत तथा भयङ्कर मुख थे । उसका विशाल शरीर त्रैलोक्य व्यापक विस्तार वाला था॥ १७१॥ वह अपनी भुजाओं से आकाश को तौल सा रहा था पैरों से पर्वतों को इधर-उधर प्रक्षिप्त कर रहा था, तथा मुख की वायु से वर्षालु मेघों को इतस्तत: उडा रहा था ॥१७२॥ उसकी लाल-लाल आँखें टेढ़ी थीं उसका तेज मन्दराचल के समान अत्यधिक था । वह युद्ध में मानो समस्त देवताओं को मानो जलाते हुए आ रहा था ॥१७३॥ देवताओं को डाँटते हुए, दशों दिशाओं को ढँकते हुए उसके द्वारा प्रलय काल में प्रसन्न होने वाली मृत्यु जैसे जल गयी हो।१७४॥ सुन्दर तलवें की उठी हुयी उसकी अङ्गुलियों के पर्व बहुत बड़े-बड़े थे । आभरणों से परिपूर्ण, कर्म के नी
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