Srishti Khanda Extracted Page 558
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-558
Sanskrit Original
सासिशब्दैश्शिलावर्ष: संपतद्धिश्च पादपैः । जघान देवसंघांस्ते दानवानभ्यजीवयत्॥९४७॥ शाकरी वारुणी च माये अंतर्हिते तदा। अभवद्धोरसंचारा पृथिवी पर्वतैरिव ॥९४८॥ न चारुद्धो द्वुमगणै देवोदूृश्यत कश्चन । तदपध्वस्तधनुषं भम्रप्रहरणाविलम् ॥१४९॥ निष्प्रयत्मं सुरानीकं वर्जयित्वा गदाधरम् । स हि युद्धगतः श्रीमानीशो न स्म व्यकंपत॥१५०॥ सहिष्णुत्वाज्जगत्स्वामी न चुक्रोध गदाधरः । कालज्ञः कालमेघाभः समीक्षन्कालमाहवे ॥१५९॥ देवासुरविमर्द च द्रष्टुकामस्तदा हरिः । ततो भगवतादिष्टो रणे पावकमारुतौ ॥१ ५ २॥ चोदितौ विष्णुवाक्येन ततो मायांव्यकर्षताम् । ताभ्यामुद्भ्रान्तवेगाभ्यां प्रबुद्धाभ्यां महाहवे॥१५३॥ दग्धा सा पार्वती माया भस्मीभूता ननाश ह । सोनिलोनलसंयुक्तस्सोनलश्वानिलाकुल: ॥९५४॥ दैत्यसेनां ददहतु र्युगांतेष्विवमूच्छितौ । वायुः प्रजवितस्तत्र पश्चादप्रिश्च मारुतात् ॥१५५॥ चेरतुदनिवानीके क्रीडंतावनलानिलौ। भस्म भूतेषु भूतेषु 4 प्रपतत्सूत्पतत्सु च॥१५६॥ दानवानां विमानेषु निपतत्सु समंततः । वातस्कंधापविद्धेषु कृतकर्मणि पावके ॥१५७॥ मायावधे प्रवृतेत्तु स्तूयमाने गदाधरे । निष्प्रयत्नेषु दैत्येषु त्रैलोक्ये मुक्तबंधने॥१५८॥ परहृष्टषु च देवेषु साधुसाध्वितिजल्पिषु। जयेदशशताक्षस्य दैत्यानां च पराजये॥१५९॥ दिक्षु सर्वासु शुद्धासु प्रवृत्ते धर्मविस्तरे । अपावृते चंद्रपथे स्वस्थानस्थे दिवाकरे ॥१६०॥ प्रवृत्तिस्थेषु भूतेषु नृषु चारित्रवत्सु च । अभिन्नबंधने मृत्यौ हूयमाने हुताशने ॥१६९॥ SN ++ «८ +++ «तन को उत्पन्न कर दिया ॥१४६॥ उसने कृपाण के शब्दों तथा गिरते हुए वृक्षं से दैत्यों को जीवित करते हुए देवताओं को मारा ॥ १४७॥ उस समय चन्द्रमा और वरुण दोनों की माया विनष्ट हो गयी । पर्वतों के पहार से मर जाने के कारण पृथिवी पर चलना मुश्किल हो गया ॥१४८॥ कोई भी देवता ऐसा नहीं दिखता था जो वृक्षों से घिर न गया हो । उनके धनुष टूट गये और आयुध दूषित हो गये ॥१४९॥ भगवान् गदाधर को छोड़कर सम्पूर्ण देव सेना प्रयत्न रहित (किं कर्तव्य विमूढ हो गयी । युद्ध में विद्यमान श्रीभगवान् भयभीत नहीं हुए ॥१५०॥ जगत् के स्वामी श्रीभगवान् सहिष्णु होने के कारण क्रुद्ध नहीं हुए । काल को जानने वाले श्यामवर्ण के मेघ के समान कान्ति वाले, वे युद्ध में काल की प्रतीक्षा कर रहे थे ॥१५१॥ श्रीहरि देवासुरसंग्राम को देखना चाहते थे । उसके बाद श्रीभगवान् ने अग्नि और वायु को युद्ध करने का आदेश दिया ॥१५२॥ भगवान् विष्णु की माया को दूर करने की आज्ञा से प्रेरित होकर उन दोनों वेग सम्पन्न देवताओं ने अपनी माया फैलायी ॥१५३॥ उस समय पार्वती माया भस्म होकर विनष्ट हो गयी । अग्नि से युक्त वायु तथा वायु से युक्त अग्नि दोनों ने ॥१५४॥ प्रलय कालीन अग्नि के समान समिद्ध होकर दैत्यों की सेना को जलाया । वहाँ पर पहले जोर से हवा चलने लगी और उसके बाद अग्नि भी प्रदीप्त हो गयी ॥१५५॥ दानवों की सेना में वायु तथा अग्नि क्रीडा करते हुए संचरण करने लगे फिर तो दानव भस्म होकर गिरने लगे तथा फिर वे खड़े हो जाते थे ॥१५६॥ चारो ओर दैत्यसेना के विमान गिरने लगे वायु के वेग से युक्त अग्नि ने उन सबों को जला दिया ॥१५७॥ जब भगवान् माया का वध कर रहे थे उस समय देवता उनकी स्तुति कर रहे थे । दैत्य प्रयत्न हीन हो गये और त्रैलोक्य दैत्यों के बन्धन से रहित हो गये ॥१५८॥ सभी देवता प्रसन्न हो गये वे सभी बहुत अच्छा, बहुत अच्छा कह रहे थे । जब इन्द्र विजयी हो गये और दैत्य पराजित हो गये॥१५९॥ सभी दिशायें शुद्ध हो गयीं और चारो ओर धर्म का विस्तार हो गया । चन्द्रमा का मार्ग खुल गया तथा सूर्य अपने स्थान पर स्थित हो गये ॥१६०॥ जब यज्ञं में देवगण सुशोभित होने लगे तथा लोकपालगण स्वर्ग के
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