Srishti Khanda Extracted Page 557
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-557
Sanskrit Original
शमयस्वासुरी मायां यया दह्यामहे रणे। सोम उवाच यन्मां वदसि युद्धार्थं देवराज वरप्रद ॥९३३॥ एष वर्षामि शिशिरं दैत्यमायापकर्षणम् । एतान्मे शीतनिर्दग्धान्पश्यस्व हिमवेष्टितान् ॥१३४॥ तथा हिमकरोत्सृष्टाः सपाशाहिमवृष्टयः। वेष्टयंति च तान्दैत्यान्वायुर्मेधगणानिव ॥१३५॥ तौ पाशशीतांशुधरौ वरुणेंदू महाबलौ। जध्नतुर्हिमपातैश्च पाशपातैश्च दानवान् ॥१३६॥ द्वावंबुनाथौ समरे तौ पाशहिमयोधिनौ। मृधे चेरतुरंभोभिः क्षुब्धाविव महार्णवौ ॥१३७॥ ताभ्यामापूरितं सर्व तद्दानवबलं महत् । जगत्संवर्त्तकांभोदैः प्रवर्षेरिव संवृतम् ॥१३८॥ तावुद्यतावंबुनाथौ शशांकवरुणावुभौ । शमयामासतुस्तां तु मायां दैत्येन्द्रनिर्मिताम् ॥१३९॥ शीतांशुजालनिर्दग्धाः पाशैश्चास्कंदिता रणे । न शेकुश्चलितुं दैत्या विशिरस्का इवाद्रयः ॥१४०॥ शीतांशुनिहतास्ते तु दैत्या स्सर्वे निपातिताः । हिमप्लावितसर्वांगा निरूष्माण इवाग्नयः ॥१४१॥ तेषां तु दिवि दैत्यानां निपतंति शुभानि वै। विमानानि विचित्राणि निपतंत्युत्यतंति च ॥९४२॥ ताऱ्पाशहस्तग्रथितान् छादितान् शीतरश्मिभिः । मयो ददर्श मयावी दानवान्दिवि दानवः ॥१४३॥ सशैलजालां विततां खड्गपट्टिशहासिनीम् । पादपोत्करकूटस्थां कंदराकीर्णकाननाम् ॥१४४॥ सिंहव्याघ्रगणाकीर्णा नदद्धिर्देवयूथपै: । ईहामृगगणाकीर्णा पवनाघू्णितद्टुमाम् ॥१४५॥ निर्मितां स्वेनपुत्रेण कूजंती दिवि कामगाम् । प्रथितां पार्वतीं मायां ससृजे स समंततः ॥१४६॥ वरुण के सहायक बनकर तुम जाओ ॥१३२॥ हमलोग जिससे जल रहे हैं, तुम उस आसुरी माया को शान्त कर दो। सोम ने कहा-- हे वरप्रदान करने वाले इन्द्र ! आप मुझे युद्ध करने के लिए कह रहे हैं ।।१३३॥ में दैत्यों को विनष्ट करने वाली ठंढी की वर्षा करता हूँ, मेरे शैत्य से दग्ध हुए तथा हिम से वेष्टित असुरों को आप देखें॥१३४॥ शीतल किरणों से सृष्ट पाश से युक्त हिम वृष्टियाँ, जिस तरह वायु मेघ समूह को वेष्टित कर लेती है, उसी तरह वेष्टित कर ले रही है ॥१३५॥ उसके पश्चात् महाबलवान् पाशधारी वरुण तथा शीतल किरणों वाले चन्द्रमा दोनों दानवों को पाश के प्रहार से तथा शीतल किरणों से मार डाले ॥१३६॥ युद्ध में वे दोनों चन्द्रमा और वरुण अपने हिमायुध तथा पाश धारण किए हुए उमड़ते हुए दो सागरों के समान विचरण कर रहे थे ॥१३७॥ उन दोनों ने विशाल दानव सेना को जल से भर दिया जिसतरह प्रलय काल की बेला में संवर्तक मेघ से संसार जल से भर जाता है ॥१३८॥ चन्द्रमा और वरुण दोनों जल स्वामियों ने उस दैत्येन्द्र के द्वारा निर्मित माया को जल से शान्त कर दिया ॥१३९॥ शीतल किरण समूह से दग्ध तथा पाश से बंधे हुए दैत्य युद्ध में उसी तरह नहीं चल फिर पा रहे थे जिस तरह शिखर विहीन पर्वत नहीं चल फिर पाते हैं । शीतायुध से मारे गये सभी दैत्य गिर पड़े उनके सारे अंग हिम से भर गये थे और वे उष्मा रहित अग्नि के समान हो गये थे ॥१४०-१४१॥ उन दैत्यों के सुन्दर तथा विचित्र विमान आकाश से नीचे गिर रहे थे फिर ऊपर की आरे चले जाते थे ॥१४२॥ मायावी दानव मय ने उन सवों को पाश में बंधे हुए तथा हिम से ढँके हुए दानवों को देखा ॥१४३॥ उसने अपने पुत्र के द्वारा निर्मित, पर्वत समूह से भरी हुयी, खड्गों तथा पट्टिसों से परिपूर्ण वृक्ष समूह से युक्त तथा जिसके बन में अनके गुफाएँ थीं ॥ १४४। जिसमें सिंह एवं व्याध्रों के समूह भरे हुए थे, तथा देव सैनिक नाद कर रहे थे, ईहा मृगो से भरी हुयी तथा वायु के वेग से वृक्ष समूह झुम रहे थे ॥१४५॥ जो अपनी इच्छानुसार आकाश में संचरण करने वाली थी, इसतरह की पार्वती माया
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