Srishti Khanda Extracted Page 556
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-556
Sanskrit Original
वरुण उवाच एषा दुर्विषहा माया देवैरपि दुरासदा। और्वेणनिर्मिता पूर्व॑ पावकेनोर्वसूनुना ॥११९॥ तस्मिंस्तु व्यथिते दैत्ये निवीर्यैषा न संशयः । शापोह्यास्याः पुरा दत्तः सृष्टा येनैव तेजसा ॥१२०॥ यद्येषा प्रतिहंतव्या कर्तव्यो भगवान्सुखी । दीयतां मे सखा शक्र तोययोनि निशाकरः ॥१२१॥ तेनाहं सह संगम्य यादोभिश्च समावृतः। मायामेतां हनिष्यामि त्वत्प्रसादान्न संशयः ॥९२२॥ एवमस्त्विति संहृष्टः शक्रस्त्रिदशवर्धनः । संदिदेशाग्रतः सोमं युद्धायशिशिरायुधम् ॥१२३॥ गच्छ सोम सहायन्त्वं कुरुपाशधरस्य वै । असुराणां विनाशाय जयार्थं त्रिदिवौकसाम् ॥९२४॥ त्वं मतः प्रतिवीर्यश्च ज्योतिषामपि चेश्वरः । त्वन्मयान्सर्वलोकेषु रसान् वेदविदोविदुः ॥१२५॥ त्वया समो न लोकेस्मिन्विद्यते शिशिरायुधः। क्षयवृद्धी तवाव्यक्ते सागरे चैव चांबरे ॥१२६॥ प्रवर्तयस्यहोरात्रात्कालं संमोहयन् जगत् । लोकच्छायामयं लक्ष्म तवांकः शशविग्रहः ॥१२७॥ नविदुः सोम ते मायां ये च नक्षत्रयोनयः । त्वमादित्यपथादूर्ध्वं ज्योतिषां चोपरि स्थितः ॥१२८॥ तमः प्रोत्सार्यं सहसा भासयस्यखिलं जगत् । शीतभानुर्हिमतनुरज्योतिषामधिपः शशी ॥१२९॥ अपि तत्कालयोगात्मा इज्यो यज्ञरथोव्ययः। ओषधीशः क्रियायोनिरपांयोनिरनुष्णगुः ॥९३०॥ शीतांशुरमृताधार श्रपलः श्वेतवाहनः । त्वं कांतिः कांतवषुषां त्वं सोमः सोमपायिनाम्॥१३९॥ सौम्यस्त्वं सर्वभूतानां तिमिरध्नस्त्वमृक्षराट् । तद्गच्छ त्वं महासेन वरुणेन वरूथिना ॥१३२॥ इन्धन रहित अग्नि स्वरूप है । उसका स्पर्श करने में अग्नि भी समर्थ नहीं है ॥११७॥ शत्रुओं का निग्रह करने वाली यह माया तुम्हारे वंश की वशवर्तिनी होगी । यह अपने पक्ष वालों की रक्षा करेगी और विपक्ष का विध्वंस करेगी।११८॥ बरुण ने कहा-- यह उर्व महर्षि के पुत्र और्व के द्वारा निर्मित माया है । इसको सह पाना अत्यन्त कठिन है । हे इन्द्र ! मुझे मित्र के रूप में जल से उत्पन्न होने वाले चन्द्रमा को प्रदान कीजिये ॥११९।। उसके साथ तथा जलचरों के साथ मिलकर में निश्चित रूप से इस माया को विनष्ट कर दूँगा ॥१२२॥ वरुण के द्वारा इसतरह से कहे जाने पर इन्द्र ने शिशिरायुध चन्द्रमा को युद्ध करने का आदेश दिया ॥१२३॥ उन्होंने कहा हे चन्द्रमा ! तुम वरुण के सहायक बनकर युद्ध करो, जिससे कि असुरों का विनाश हो जाय और देवताओं को विजय प्राप्त हो।१२४॥ वेदज्ञों का कहना है कि तुम ही इसके विरोधी योद्धा हो तथा सभी नक्षत्रों के स्वामी हो । सभी लोकों में विद्यमान् जल आपका ही स्वरूप है ॥१२५॥ इसलोक में तुम्हारे समान कोई शिशिरायुध नहीं है आपकी क्षीणता और वृद्धि दोनों समुद्र तथा आकाश दोनों में अव्यक्त रूप से होते हें ॥१२६॥ तुम कहीं हो और जगत् मोहित करके दिन तथा रात्रि के द्वारा काल का प्रवर्तन करते हो । तुममें विद्यमान यह शशक का शरीर, संसार की छाया रूप है॥१२७॥ हे सोम ! नक्षत्र योनि वाले तुम्हारी माया को लोग नहीं जानते हैं । तुम आदित्य मार्ग तथा सभी नक्षत्रों के ऊपर विद्यमान हो ॥१२८॥ आप अंधकार को दूर करके सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करते हो । तुम्हारी किरणें शीतल हैं, तुम्हारा शरीर वर्फ के समान शीतल हें । तुम सभी ज्योतियों के स्वामी और शशक के चिह्न वाले हो॥१२९॥ तुम शीघ्र ही योग करने वाले, तुम ही पूजनीय और यज्ञ स्वरूप हो । तुम ओषधियों के स्वामी, क्रियाओं को करने वाले, जल को उत्पन्न करने वाले तथा शीतल किरणों वाले ॥१३०॥ शीतांशु, अमृत के आश्रय, चञ्चल तथा श्वेत वाहन वाले हो तुम कान्ति सम्पन्न शरीर वालों की कान्ति, तथा सोमपान करने वालों के सोम हो ॥१३१॥ तुम भूतों की सौभ्यता तथा अन्धकार को विनष्ट करने वाले तथा नक्षत्रों के स्वामी हों हे महासेन ! सेना सम्पन्न
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know