Srishti Khanda Extracted Page 555
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-555
Sanskrit Original
श्रीपद्यमहापुराण प्रभातकाले संप्राप्ते कांक्षितव्ये समागमे । भगवस्तर्पितः पुत्रः कैर्हव्यैः प्राप्स्यते सुखम् ॥१०४॥ कुत्र चास्य निवासः स्याद्धोजनं तु किमात्मकम् । विधास्यतीह भगवान्वीर्य तुल्यं महौजसः ॥१०५॥ ब्रह्मोवाच बडवामुखे च वसतिः समुद्रे वै भविष्यति । ममयोनिर्जलं विप्र तच्चामेयं ब्रजत्वयम्॥९०६॥ तत्रायमास्ते नियतं पिबन्वारिमयं हविः। तद्वारिविस्तरं विप्र विसृजाम्यालयं च तम् ॥९१०७॥ ततोयुगांते भूतानामेष चाहं च पुत्रक । सहितो विचरिष्यावो निष्पुराणकराविह ॥१०८॥ एषोम्रिरंतकाले तु सलिलाशी मया कृतः । दहनः सर्वभूतानां सदेवासुररक्षसाम्॥१०९॥ एवमस्त्विति तं सोग्रिः संवृतज्चालमंडलः । प्रविवेशार्णवमुखं नत्वोर्वं पितरं प्रभुम् ॥११०॥ प्रतियातस्ततो ब्रह्मा ते च सर्वे महर्षयः । और्वस्याग्नेः प्रभावज्ञाः स्वां स्वां गतिमुपागताः॥९ ९९॥ हिरण्यकशिपु दृष्ट्वा तदातन्महदद्धुतम्। उर्व॒॑प्रणतसर्वागो वाक्यमेतदुवाच ह ॥११२॥ भगवन्नद्धतमिदं संवृत्तं लोकसाक्षिकम् । तपसा ते मुनिश्रेष्ठ परितुष्टः पितामहः ॥१९३॥ अहं तु तव पुत्रस्य तव चैव महाव्रत । भृत्य इत्यवगंतव्यः श्लाध्यस्त्वमिह कर्मणा ॥१९४॥ तन्मां पश्य समापन्नं :-तवैवाराधने रतम् । यदि सीदेन्सुनिश्रेष्ठ तवैव स्यात्पराजयः॥९९५॥ उर्व उवाच धन्योस्म्यनुगृहीतोस्मि यस्य ते हं गुरुर्मतः । नास्ति ते तपसानेन भयं चैवेह सुव्रत ॥११६॥ तामेव :मायां गृह्णीष्व- मम, पुत्रेण निर्मिताम् । निरिंधनामग्रिमयी दुःस्पर्शा पावकैरपि ॥११७॥ एषा ते स्वस्य वंशस्य वशगारिविनिग्रहे। रक्षिष्यत्यात्मपक्षं च विपक्षं च प्रधक्ष्यति ॥९९८॥ को ज्जार्ना]]प्रदान कर रहे है, जिससे कि इसका कल्याण हो ॥१०३॥ प्रात:काल होने पर जब हमदोनों (पिता-पुत्र) का समागम होगा उस समय हे भगवन् ! मेरा पुत्र क्या भोजन करेगा 2॥१०४॥ इसका निवास कहाँ होगा, और इसका भोजन क्या होगा ? जो मोजन इसके अत्यन्त ओजस्वी. पराक्रम के अनुकूल हो ॥१०५॥ ब्रह्माजी ने कहा-- इसका निवास -बडवामुखं समुद्र में होगा और मुझसे उत्पन्न जल का यह पान करेगा । यह वहीं जाकर निवास करे।। १०६॥।' वहीं 'पर सदा जल को: पीता रहेगा । उस जल का विस्तार इसके लिए प्रलयकाल'तकबनाये रहुँगा॥१०७॥ हे वत्स ! जब प्रलय-की वेला होगी उस समय मैं और यहः (और्वाग्नि) दोनों विहार करेंगे । हम दोनों संसार का बिनाश कर देंगे॥।१०८॥ जिसको मैने जल पीने वाला बनाया है, वह युग के अन्त में देवताओं सुरों तथा मनुष्यों को जला देगा ॥१०९॥ ऐसा: ही हो यह कहकर उस अग्नि ने अपनी ज्वाला कोः समेटःलिया और' अपने पिता उर्व को प्रणाम करकेः समुद्र में प्रवेश कर गया ॥१ १०॥। उसके बाद ब्रह्माजी! तथा-सभी महर्षिगण लौट गये और्व अग्नि के प्रभाव को जानने वाले वे सब अपने-अपने घर चले गये ॥१११॥ हिरण्यकशिपु ने-इसः अद्भुत प्रसंग को देखां था। उसने महर्षि उर्व को साष्टाङ्ग प्रणाम'किया,'और कहा ॥ ११:२॥॥हे भगवन् ! यह समस्त लोगों के सामने अद्भुतःकर्म हुआ'हे ॥ आपकी 'तपस्या: से ब्रह्माजी सन्तुष्ट हो, गये. है .॥१ १ ३॥ हे महाव्रतः में आपका-तथा आपके पुत्रःका- दास हूँ ।:आपका- यह कर्म अत्यन्त प्रशंसनीय हैः। ११४१ 'मैं'आपकी'पूजा करता हूँ अतएवःआप मुझ' पर कृपा कीजिये ।:हे मुनिश्रेष्ठः! मुझको कष्ट होने का अर्थ है किआपका-परांजय हो. गया।।। १-१५ और्व ने कहा मैं तो तुम्हारा गुरु बनकर! धन्य और अनुग्ृहीतःहो-गयाः।-अतएव हेःसुव्रत ! मेरी ।इसः तपस्या के कारण तुम्हें किसी भीः प्रकार कां कष्ट नहीं 'होगा।११६॥' तुम मेरे पुत्र केद्वारा निर्मित उसी माया को अपनाए लो/ बह
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