Srishti Khanda Extracted Page 554
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-554
Sanskrit Original
क्व दारा: क्व च संयोग: क्वच भावविपर्ययः । नन्वियं ब्रह्मणा सृष्टा मनसा मानसी प्रजा ॥९०॥ यद्यस्ति तपसोवीर्य युष्माकं विजितात्मनाम् । सृजध्वं मानसा्युत्रान््राजापत्येन कर्मणा ॥९१॥ मनसा निर्मिता योनिराधातव्या तपस्विभिः । नो दारयोगं बीजं व्रतमुक्तं तपस्विनाम् ॥९२॥ यदिदं लुप्तधर्माख्यं युष्माभिरिहनिर्भयैः । व्याहतं सद्धिरत्यर्थमसद्धिरिव संमतम् ॥९३॥ वपुर्दीप्तांतरात्मानमेषकृत्वा मनोमयम् । दारयोगं विनास्रक्ष्ये पुत्रमात्मतनूरुहम्॥९ ४॥ एवमात्मानमात्मा मे द्वितीयं जनयिष्यति। प्राजापत्येन विधिना दिधक्षंतमिव प्रजाः ॥९५॥ वरुण उवाच उर्वस्तु तपसाविष्टो निवेश्योरुं हुताशने । ममंथैकेनदर्भेण पुत्रस्य प्रसवारणिम् ॥९६॥ तस्योरुं सहसा भित्वा वरोऽसौ हाप्निरुत्थितः । जगतो दहनाकांक्षी पुत्रोऽम्निस्समपद्यत ॥९७॥ उर्वस्योरु विनिर्भिद्य और्वोनामांतकोऽनलः । दिधक्षुरिवलोकांस्त्रीन् जज्ञे परमकोपनः॥९८॥ उत्पद्यमानश्चोवाच पितरं दीनया गिरा । क्षुधा मे बाधते तात जगद्भक्षे त्यजस्व माम् ॥९९॥ त्रिदिवारोहिभि ज्वलि जुम्भमाणो दिशो दश । निर्दहन्सर्वभूतानि ववृधे सोतकोपमः ॥१० ०॥ एतस्मिन्नंतरे ब्रह्मा मुनिमुर्व॑ समागतः । उवाच वार्यतां पुत्रो जगतस्त्वं दयां कुरु ॥१०१॥ अस्यापत्यस्य ते विप्र करिष्ये साह्यमुत्तमम् । तथ्यमेतद्दचः पुत्र शृणुत्वं वदतांवर॥९०२॥ और्व उवाच धन्योस्म्यनुगृहीतोस्मि यन्मे त्वं भगवन् शिशोः। मतिमेतां ददासीह परमात्मन्हिताय वै ॥१०३॥ किए बिना कृत्यों को करना ये तीनों केवल दम्भ मात्र हैं ॥८९॥ ब्रह्माजी ने तो मन से ही सारी प्रजां की सृष्टि कर दी थी । उन्होंने दारसंग्रह, सत्री संयोग तथा मन का विपर्यय (मन में काम विकार को लाना) इन सबों को कहाँ किया॥९ ०॥ अपने मन को वश में रखने वाले आपलोगों में यदि तपस्या का बल है तो आपलोग प्राजापत्य कर्म के द्वारा मानस पुत्रों की सृष्टि कीजिये ॥९१॥ तपस्वियों को तो मन से निर्मित योनि में ही आधान (गर्भाधान) करना चाहिए । तपस्वियों के लिए दारयोग (विवाह) का विधान नहीं किया गया है ॥९२॥ निर्भय होकर आपलोगों ने जो धर्म का लोप बतलाया है, वह सज्जनों के लिए नहीं अपितु असज्जनों के लिए ही अनुकूल है॥९३॥ में दीप्त अन्तरात्मा वाले शरीर को मनोमय बनाकर अपने शरीर से पत्नी संयोग के बिना ही पुत्र की सृष्टि करूंगा ॥९४॥ इस तरह से मेरी आत्मा प्राजापत्य विधि से प्रजाओं को जलाते हुए के समान दूसरे आत्मा (पुत्र) की सृष्टि करेगा॥९५। वरुण ने कहा-- तपस्वी उर्व ने अपने जङ्घे को अग्नि में प्रवेश कराकर एक कुश से अपने जङ्घे का मंथन किया और उससे प्रसवारणि को उत्पन्न किया ॥९६॥ उनके जङ्घे का सहसा भेदन करके यह श्रेष्ठ अग्नि उत्पन्न हुआ । वह पुत्र रूपी अग्नि जगत् को जला देना चाहता था ॥९७॥ उर्व के ऊरू भाग को फोड़कर वह और्व नामक परम क्रोधी अग्नि उत्पन्न हुआ । मानो वह त्रैलोक्य को जला देना चाहता हो ॥९८॥ उत्पन्न होते ही उसने दीन वाणी में अपने पिता से कहा हे पितः ! मुझे भूख लगी है, आप मुझे छोड़ दीजिये में संसार का भक्षण करूँगा ॥९९॥ उसकी स्वर्ग चुम्बिनी ज्वाला दशो दिशाओं में फैल रही थी । समस्त भूतां को जलाते हुए वह यमराज के समान बढकर हो गया ॥१००॥ उसी समय उर्व मुनि के पास ब्रह्माजी आ गये और कहे तुम अपने पुत्र को रोको, संसार पर कृपा करो ॥१०१॥ तुम्हारे इस पुत्र की सर्वोत्तम सहायता करूँगा । हे पुत्र ! मेरी यह सत्य वाणी है, तुम मेरी वात को सुनो ॥१०२॥ और्व ने कहा-- में तो धन्य और अनुगृहीत हो गया कि आप मेरे शिशु पुत्र
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