Srishti Khanda Extracted Page 553
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-553
Sanskrit Original
श्रीपद्ममहापुणण बहूनि विप्रगोत्राणि मुनीनां भावितात्मनाम्। एकदेहानितिष्टंति विविक्तानि विना प्रजाः ॥७६॥ एवंभूतेषु सर्वेषु पुत्रैमेनास्ति कारणम्। भवांश्च तापसश्रेष्टः प्रजापतिसमद्युतिः ॥७७॥ तत्प्रवर्तस्व वंशाय वर्धयात्मानमात्मना । समाधत्स्वोर्जितं तेजो द्वितीयां कुरु वै तनुम् ॥७८॥ स एवमुक्तो मुनिभिर्मुनिर्मनमसि ताडितः । जगर्हतानृषिगणान् वचनं चेदमब्रवीत् ॥७९॥ यथाहि विहितो धर्मो मुनीनां शाश्वत: पुरा। आर्ष हि केवलं कर्म वन्यमूलफलाशिनः ॥८०॥ ब्रह्मयोनौ प्रसूतस्य ब्राह्ाणस्यात्मवर्तिनः । ब्रह्मचर्य सुचरितं ब्रह्माणमपि चालयेतू॥८ १॥ जनानां वृत्तयस्तिस्रो ये गृहाश्रमवासिनः। अस्माकं च वनेवृत्तिर्वनाश्रमनिवासिनाम् ॥८२॥ अब्भक्षा वायुभक्षाश्च दंतोलूखलिनस्तथा। अशमकुट्टादयो यत्र पंचाम्रितपसश्च ये ॥८३॥ एते तपसि तिष्ठन्तो ब्रतैरपि सुदुश्चरैः । ब्रह्मचर्य पुरस्कृत्य प्रार्थयंति परां गतिम्॥८४॥ ब्रह्मचर्याद्वाह्मणस्य ब्राह्मणत्वं विधीयते। एवमाहुः परे लोके बहाचर्यविदो जनाः ॥८५॥ ब्रह्मचर्येस्थितो धमो ब्रह्मचर्ये स्थितं तपः । ये स्थिता ब्रह्मचर्ये तु ब्राह्मणा दिवि ते स्थिताः॥८६॥ नास्ति योगं विना सिद्धि नास्तियोगं विना यशः । नास्ति लोके यशोमूलं ब्रह्माचर्यात्परंतप ॥८७॥ योनिगृहोंद्रियग्राम भूतग्रामं च पंचकम् । ब्रह्मचर्य समाधत्ते किमतः परमं तपः ॥८८॥ अयोग केशधरणमसंकल्पब्रतक्रिया । अब्रह्मचर्या चर्या च त्रयं स्यादंभसंज्ञितम् ॥८९॥ अकेले इस वंश में बचे है किन्तु आप की भी कोई सन्तान नहीं है । आप कौमार व्रत को धारण करके केवल क्लेश का ही अनुभव करते हैं ॥७५॥ ब्राह्मणों के बहुत से गोत्र हैं जिनमें केवल एक ही पुरुष आप जीवित हैं, और सन्तान हीन हैं आप भी ब्रह्मचर्य व्रत को अपनाकर केवल क्लेश का ही अनुभव कर रहे हैं ।७६॥ हे विप्र ! प्रभाव सम्पन्न बहुत से मुनियों के गोत्र में केवल एक ही व्यक्ति बचा है । उनके वंश में कोई सन्तान नहीं है ॥७७॥ वे सव कहते हैं कि मुझे पुत्रों से कोई प्रयोजन नहीं है आप तो तपस्या के कारण ब्रह्माजी के समान कान्ति सम्पन्न हैं अतएव आप अपने से ही अपने वंश का संवर्द्धन करें । आप अपने तेज को धारण करें और अपने दूसरे शरीर को उत्पन्न करें ॥७८॥ मुनियों के द्वार इस तरह से कहे जाने पर मुनि उर्व के मन में चोट लगी । वे उन ऋषियों की निन्दा किए और कहे ॥७९॥ वन में रहकर केवल वन के मूल और फलों को खाने वाले ऋषियों का जो प्राचीन काल में शाश्वत धर्म बतलाया गया है कि केवल आर्ष कर्मो को करना चाहिए ॥८०॥ ब्राह्मण योनि में उत्पन्न, आत्मनिष्ठ ब्राह्मण के लिए ब्रह्मचर्य का पालन ही सर्वोत्तम कर्म है । वह ब्रह्मा को भी हिला सकता है ॥८ १॥ गृहस्थाश्रम में रहने वाले लोगों के लिए तीन प्रकार की वृत्तियाँ बतलायी गयी हैं । मैं तो वन में रहता हूँ अतएव हमारी वृत्ति वन में ही है ॥८२॥ वन में तो जल पीकर रहने वाले, वायु पीकर रहने वाले, दाँत से ही कूटकर खाने वाले तथा पत्थर से कूटकर खाने वाले तपस्वी रहते हैं तथा वे पञ्चाग्नि का सेवन करते हैं ॥८ ३॥ इसतरह के तपस्वीजन ब्रह्मचर्य पालन पूर्वक कठोर ब्रतों के द्वारा मुक्ति को प्राप्त करना चाहते हैं ॥८४।। ब्रह्मण का ब्राह्मणत्व तो ब्रह्मचर्य से ही सुरक्षित रहता है, इसतरह से परलोक में ब्रह्मचर्य के महत्त्व को जानने वाले पुरुषों ने कहा है ॥८ ५॥ ब्रह्मचर्य में ही धर्म और तपस्या का निवास है । ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले ब्राह्मण स्वर्गलोक में जाते हें ॥८६॥ हे परंतप ! योग के बिना कोई भी सिद्धि नहीं मिलती है और न तो यश मिलता है । संसार में यश के मूल कारण ब्रह्मचर्य से बढकर कुछ भी नहीं है ॥८७॥ इन्द्रियों तथा पञ्चभूतों को अपने वश में करके ब्रह्मचर्य का पालन करने से बढकर कोई भी दूसरा तप नहीं है ॥८८॥ योग के बिना जटा धारण करना, सङ्कल्प किए बिना किसी व्रत को करना तथा ब्रह्मचर्य का पालन
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