Srishti Khanda Extracted Page 552

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-552

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Sanskrit Original

दैत्यचापच्युतान् घोरांश्छित्वा वज्रेण तान् शरान् । शक्रो दैत्यबलं घोरं विवेश बहुलोचनः ॥६ ०॥ सदैत्यप्रमुखान् सर्वान् हत्वा दैत्यबलं महत् । तामसेनास्त्रजालेन तमो भूतमथाकरोत् ॥६ १॥ तेन्योन्यं नान्वबुध्यंत दैत्यानां वाहनानि च । घोरेण तमसाविष्टाः पुरुहूतस्य तेजसा॥६२॥ मायापाशै विंमुक्तास्तु यत्मवंतः सुरोत्तमाः । शिरांसि दैत्यसंघानां तमोभूतान्यपातयन्॥६ ३॥ अपध्वस्ता विसज्ञाश्च तमसा नीलवर्चसा । पेतुस्ते दानवास्सद्यश््छिन्नपक्ष इवाद्रयः ॥६४॥ तत्राभिभूतदैतयेद्रमंघकारमिवांतरम् । दानवं देहसदनं तमोभूतमिवाभवत्॥६ ५॥ तथासृजन्महामायां मयस्तां तामसीं दहन् । युगांतोद्योतजननीं सृष्टामौर्वेणवह्विना ॥६६॥ सा ददाह च तां शाक्रीं मायां मय विकल्पिता। दैत्याश्चादित्यवपुषा सद्य उत्तस्थुराहवे ॥६७॥ मायामौर्वी समासाद्य दह्यमाना दिवौकसः । भेजिरे चंद्रविषयं शीतांशुसलिलहृदम् ॥६८॥ ते दह्यमाना और्वेण वह्निना नष्टचेतसः । शशंसुर्वञ्रिणं देवाः संतप्ताः शरणैषिणः ॥६९॥ संतप्ते मायया सैन्ये हन्यमाने च दानवैः । चोदितो देवराजेन वरुणो वाक्यमब्रवीत् ॥७०॥ पुरा ब्रह्मर्षिजः शक्र तपस्तेपे सुदारुणम् । उर्वः स पूर्व तेजस्वी सदृशो ब्रह्मणो गुणैः ॥७१॥ तं तपंतमिवादित्यं तपसा जगदव्ययम्। उपतस्थुर्मुनिगणा देवा देवर्षिभिः सह॥७२॥ हिरण्यकशिपुश्चैव दानवो दानवेश्वरः । ऋषिं विज्ञापयामास पुरापरमतेजसम् ॥७३॥ ऊचुर्ब्रह्मर्घयस्ते तु वचनं धर्मसंहितम् । ऋषिवंशेषु भगवंश्छिन्नमूलमिदंकुलम् ॥७४॥ एकस्त्वमनपत्यश्च॒ गोत्रायान्यो न विद्यते। कौमारं व्रतमास्थाय क्लेशमेवानुवर्तसे ॥७५॥ सा बना दिया ॥५९॥ इसके बाद इन्द्र ने दैत्यों के धनुष से छोड़ गये बाणों को वज्र से काट दिया और अनेक नेत्रं वाले इन्द्र दैत्यों की घोर सेना में प्रवेश करके ॥६०॥ सभी प्रमुख दैत्यों तथा उनकी सेना को मार कर तामस अस्र समूह से सब जगह अन्धकार फैला दिया ॥६१॥ वे दैत्य परस्पर में एक दूसरे को नहीं पहचान पा रहे थे । वे घोर अन्धकार से तथा इन्द्र के तेज से अविष्ट हो गये थे ॥६२॥ मायापाश से मुक्त हुए देवता भी युद्ध करने लगे। वे काले-काले दैत्यों के शिरों को काट कर गिराने लगे ॥६३॥ घोर अन्धकाराच्छत्र दैत्यों की सेना संज्ञाशून्य हो गयी। शीघ्र ही दानव पड्डों के काट देने के कारण असमर्थ बने पर्वतों के समान पृथिवी पर गिर पड़े ॥६४॥ दैत्येन्द्र भी उससे अभिभूत हो गये, उनके भीतर जैसे अन्धकार भर गया था । दानवों का शरीर अन्धकार के गृह के समान हो गया ॥६५॥ उस समय मय नामक दानव ने उस तामसी माया को जला देने वाली और्वी माया की सृष्टि की । उन्होंने युगान्त में फैलाने वाले प्रकाश से युक्त और्वाग्नि को प्रकट कर दिया ॥६६॥ उसके द्वारा इन्द्र की तामसी माया जल गयी और सूर्य के प्रकाश के समान प्रकाश फैल गया और दैत्य युद्ध करने के लिए तैयार हो गये ॥६७॥ उस और्वी माया के कारण देवता जलने लगे, वे शीतल किरण रूपी जलाशय रूप चन्द्रमा के पास गये ॥६८॥ और्व अग्नि से जलते हुए देवता ज्ञानहीन से हो गये थे । शरण चाहने वाले देवता इन्द्र से कहे कि हमलोग संतप्त हो गये हैं ॥६९॥ सेना के माया द्वारा संतप्त हो जाने तथा दैत्यों द्वारा मारे जाने पर इन्द्र ने वरुण को बुलाया तो वरुण ने कहा ॥७०॥ हे इन्द्र ! प्राचीन काल में ब्रह्मर्षि पुत्र उर्व ने सूर्य की तपस्या की । वे ऋर्षि पहले तेजस्वी बराह्मण के गुणों से युक्त थे ॥७१॥ सूर्य के समान तपते हुए ऋषि की तपस्या से यह जगत् संतप्त होने लगा । सभी देवता एवं मुनिगण तथा दानवेश्वर हिरण्कशिपु इन सबों ने जाकर परं तेजस्वी ऋषि की प्रार्थना की ॥७२-७३॥ उन ब्रह्मर्षियों ने धर्म पूर्वक कहा-- हे भगवन् ! ऋषियों के वंश में यह वंश छिन्नमूल (विनष्ट) हो गया है ॥७४॥ आप

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