Srishti Khanda Extracted Page 549

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-549

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Sanskrit Original

वरुणः पाशधृङ्मध्ये देवानीकस्य तस्थिवान्। युद्धमेवाभिलषन्भिन्नवेल इवार्णवः ॥१४॥ यक्षराक्षससैन्येन गुह्णकानां गणैरपि। युक्तश्च शङ्खपद्माभ्यां निधीनामधिपः प्रभुः ॥१५॥ राजराजेश्वरः श्रीमान् गदापाणिरदृश्यत । विभानयोधी धनदो विमाने पुष्पके स्थित: ॥१६॥ सराजराजः शुशुभे यक्षेशो नरवाहनः । पूर्वपक्षे सहस्त्राक्षः पितृराजश्च दक्षिणे॥९७॥ वरुणः पश्चिमे पक्ष उत्तरे नरवाहनः । चतुः पक्षाश्च चत्त्वारो लोकपाला महाबलाः॥९८॥ आत्मदिक्षु चरंतश्च तस्य देववलस्यते। सूर्यः सप्ताश्चयुक्तेन रथेनानिलागामिना ॥१९॥ श्रिया जाज्चल्यमानेन दीप्यमानैश्च रश्मिभिः । उदयास्तमयौ चक्रे मेरुपर्यन्तगामिना ॥२०॥ त्रिदिवद्वारचक्रेण तपसालोकमव्ययम्। सहस्ररश्मियुक्तेन भ्राजमानेन तेजसा ॥२९॥ चचार मध्ये देवानां द्वादशात्मा दिवाकरः । सोमः श्वेतहयोभाति स्यंदने शीतरश्मिमान् ॥२२॥ हिमतोयप्रपूर्णाभि भाभिराह्ादयञ्जगत् । तमृक्ष योगानुगतं शिशिरांशुंद्विजेश्वरम् ॥२३॥ शशच्छायांकिततनुं नैशस्य तमसः क्षयम् । ज्योतिषामीश्वरं व्योम्नि रसदं प्रभुमव्ययम्॥२४॥ ओषधीनां पवित्राणां निधानममृतस्य च। जगतः परमं भागं सौम्यं सर्वमयं रसम् ॥२५॥ ददृशुर्दानवाःसोमं हिमप्रहरणं स्थितम् । यः प्राणः सर्वभूतानां पंचधा भिद्यते नृषु ॥२६॥ सप्तस्कंधगतो लोकांस्तरीन्दधार चकार च । यमाहुरभ्रिकर्तारं सर्वप्रभवमीश्वरम् ॥२७॥ सप्तस्वरगता यस्य योनिर्गीर्भिरुदीयते । य॑ वदंति चलं भूतं यं वदंत्यशरीरिणम् ॥२८॥ समान उनका उत्तम शरीर था, उनके उदर पर हार सुशोभित हो रहा था । ऐसे वरुण पाश धारण किए हुए देवताओं की सेना में विद्यमान थे । उमड़ते हुए समुद्र के समान वे युद्ध की बेला आने की अभिलाषा कर रहे थे ॥१४॥ यक्षो एवं राक्षसों की सेना तथा गुहाकों के समूह से भी, युक्त शाङ्ग तथा पद्म नामक निधियों के स्वामी ॥१५॥ राजराजेश्वर कुबेर अपने हाथ में गदा लिए हुए दिखायी दे रहे थे । इस प्रकार के विमान से युद्ध करने वाले कुबेर पुष्पक विमान पर बैठे हुए थे ॥१६॥ इसतरह से वे राज राजेश्वर नरवाहन कुबेर सुशोभित होते थे । सेना के पूर्वभाग में इन्द्र थे, दक्षिणभाग में यमराज थे ।।१७॥। पश्चिम भाग में वरुण थे तथा उत्तर भाग में कुबेर थे । इसतरह से सेना के चारो भाग में चार महाबलवान् लोकपाल थे ॥१८। अपनी दिशाओं में संचरण करने वाली देवसेना के बीच में द्वादश शरीरधारी सूर्य विचरण कर रहे थे । उनका रथ वायु के समान वेग वाला था, उस में सात घोड़े जुते थे ॥१९॥ देदीप्यमान रश्मियों से वह चमक रहा था । सुमेरु पर्यन्त जाने वाले रथ के द्वारा उदय तथा अस्तमन करने का काम करते थे ॥२०॥ स्वर्ग के द्वारा चक्र भूत तपस्या के द्वारा उसका प्रकाश कभी क्षीण नहीं होता था । असंख्य रश्मियों के तेज से उनका रूप प्रकाशित हो रहा था ॥२१॥ चन्द्रमा के रथ का घोड़ा श्वेत वर्ण का था और उनकी किरणें शीतल थी ॥२२॥ वे अपनी शीतल जल से पूर्ण कान्ति के द्वारा संसार को आह्लादित करते थे । उन नक्षत्रों के योग से युक्त, द्विजश्वर चन्द्रमा को ॥२३॥ दानवों ने देखा कि वे शीत अस्र को धारण किए हुए हैं । उनका शरीर शशक (खरगोश) के चिह्न से युक्त है । रात्रि के अन्धकार को ये विनष्ट करने वाले हैं, ये नक्षत्रों के स्वामी हैं, आकाश में रस प्रदान करने वाले अव्यय स्वामी हैं तथा पवित्र ओषधियों के तथा अमृत के आकर (खजाना) हैं । जगत् के परम भाग, सर्व रसमय एवं सौम्य हैं । जो सभी प्राणियों के पाँच प्रकार के प्राण हैं ॥२३-२६॥ इनके सात स्कन्ध (स्थूल भेद) हैं । जो त्रैलोक्य को धारण करते हैं, जिनको अग्नि का जनक तथा सर्व समर्थ ईश्वर बतलाया गया है ॥२७॥ सात स्वरों वाली वाणी जिन से उद्धूत बतलायी जाती है । जिनको चल महाभूत तथा शरीर रहित कहा जाता

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