Srishti Khanda Extracted Page 548

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-548

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Sanskrit Original

एकतालीसवाँ अध्याय पुलस्त्य उवाच आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च महाबलौ । सबलाः सानुगाश्चैव संनह्यन्त यथा क्रमम्॥१॥ पुरुहूतश्च पुरतो लोकपालः सहस्रदृक् । ग्रामणीः सर्वदेवानामारुरोहवरद्विपम् ॥२॥ सव्ये चास्य रथःपार्शे पक्षिप्रवरकेतनः । सुचारुचक्रचरणो हैमच्छत्रपरिष्कृतः ॥३॥ देवगंधर्वेयक्षौधैरनुयातः सहस्रशः । दीप्तिमद्भश्च स्वर्गस्थै ् बहमर्षिभिरभिष्टुतः ॥४॥ वञ्रविस्फारितोद्धतौ विद्युदिंद्रायुधप्रभैः । युक्तं बलाहकगणैः पर्वतैरिव कामगैः ॥५॥ यमारूढः सभगवान्पर्येति सकलं जगत्। हविदनिषु गायंति विप्रा मखमुखेस्थिताः ॥६॥ स्वर्गसंग्रामयातेषु देवतूर्यनिनादिषु । सेंद्रं तमुपनृयन्ति शतशोह्यप्सरोगणाः ॥७॥ केतुना नागराजेन राजमानो यथा रविः । युक्तो हयसहस्रेण मनोमारुतरंहसा ॥८॥ सम्यग्रथवरो भाति युक्तो मातलिना तदा। कृत्स्नः परिवृतो मेरुर्भास्करस्येव तेजसा ॥९॥ यमस्तु दंडमुद्यम्य कालयुक्तं च मुद्दरम् । तस्थौ सुरगणानीके दैत्यानां चैव दर्शयन् ॥१०॥ चतुर्भिः सागरेर्युक्तो लेलिहानैश्च पन्नगैः। शङ्खमुक्तांगदधरो बिभ्रत्तोयमयंवपुः ॥१९॥ कालपाशान्समाविध्य हयैः शशिकरोपमैः । वाय्वीरितजलाकारैः कुर्वन्लीलाः सहस्रशः ॥१२॥ पांडुरोद्धतवसनः प्रवालरुचिरांगदः। मणिश्यामोत्तमवपुर्हारकेणार्चितोदरः ॥१३॥ देवसेना के दैत्य सेना के साथ युद्ध करते समय उर्व के ऊरूभाग से और्वानल की उत्पत्ति. का वर्णन, कालनेमि का वध, ब्रह्माजी द्वारा भगवान् विष्णु की स्तुति, भगवान् द्वारा देवताओं को वरदान महर्षि पुलस्त्य ने कहा--- आदित्यगण, वसुगण, रुद्रगण और महाबलवान् दोनों अश्विनी कुमार ये सब अपनी सेना तथा अनुचरों के साथ युद्ध करने के लिए क्रमशः तैयार हो गये ॥१॥ सभी देवताओं में प्रधान, सहस्राक्ष तथा सर्व प्रथम लोकपाल इन्द्र श्रेष्ठ हाथी पर बैठ गये ॥२॥ इन्द्र की दाहिनी ओर गरुडध्वज, सुन्दर चक्र हाथ में लिए हुए तथा सुवर्ण निर्मित छत्रधारी ॥३॥ जिनके पीछे हजारों देवता, गन्धर्व तथा यक्षों का समूह चल रहा था, देदीप्यमान, स्वर्ग में रहने वाले ब्रह्मर्षिगण जिनकी स्तुति करते रहते हें ॥४॥ वज्र के समान उत्पन्न, इन्द्रायुध के समान कान्ति वाले मेध गण, स्वेच्छानुसार चलने वाले पर्वत के समान ॥५॥ जिस पर चढकर श्रीभगवान् सम्पूर्ण जगत् में जाते हैं, यज्ञ में व्याप्त विप्रगण हविष्य प्रदान करते समय जिनका गायन करते हैं ॥६॥ स्वर्ग में संग्राम होने पर तथा देवताओं की तूर्य ध्वनि में, असंख्य अप्सराएँ जिनके सन्निकट में नृत्य करती हैं ।७॥ जो नागराज रूपी पताका के द्वारा सूर्य के समान सुशोभित होते हैं, जिनका मातलि से युक्त मन तथा वायु के समान वेग वाले हजारों अश्चों से युक्त रथ उसी तरह से सुशोभित होता है, जैसे सूर्य के तेज से सम्पूर्ण सुमेरु पर्वत प्रकाशित हो रहा हो । इसप्रकार के इन्द्र अपनी सेना के अग्रभाग में विद्यमान थे ॥९॥ यमराज ने अपना यमदण्ड तथा काल दुक्त मुग्दर को उठाकर, उसे दैत्यों को दिखाते हुए देवताओं की सेना में विद्यमान थे ॥१०॥ वरुण चार सागरों से युक्त जिनको सर्पचाट रहे थे, शङ्ख तथा मुक्तामय अंगद (केयूर) धारण किए हुए, जलमय शरीर धारण किए हुए ॥११॥ कालपाश से युक्त, चन्द्र किरणों के समान अश्वों के द्वारा, जिनका आकार वायुप्रेरित जल के समान था, उन अश्षों के द्वारा लीला कर रहे थे ।।१२॥ उनका श्वेत वस्त्र फड़फडा रहा था तथा उनका केयुर प्रवाल जटित था, श्याममणि (नीलमणि) के

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