Srishti Khanda Extracted Page 547

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-547

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Sanskrit Original

युद्धायाभिमुखस्तस्थौ धराधरविकंपनः । किशोरस्त्वतिसंहर्षात्किशोर इव चोदित:॥९८४॥ अभवद्दैत्यमध्ये स ग्रहमध्ये यथारवि: | लंबस्तु नवमेघाभः प्रलंबांबर भूषण: ॥१८५॥ दैत्यव्यूहणतो भाति सनीहारइवांशुमान् । वसुन्धराभस्तदनु दशनौष्ठेक्षणायुधः ॥१८६॥ हसंस्तिष्ठति दैत्यानाम्मध्ये क्रूरमहाग्रहः । अन्ये हयगतास्तत्र म्त्तेभेंद्रगताः परे ॥१८७॥ सिंहव्याघ्रगताश्चान्ये वराहतक्षेषु चापरे । केचित्खरोष्टरयन्तारः केचित्तोयदवाहनाः ॥१८८॥ पत्तयश्चापरे दैत्या भीषणा विकृताननाः । एकपादास्त्वपादाश्च ननृतुर्युद्धकांक्षिणः ॥१८९॥ आस्फोटयंतो बहवः स्वनंतश्च तथापरे। दृप्तशार्दूलनिर्घोषा नेदु्दनवपुङ्गवाः॥१९०॥ तेगदापरिैर्घोरैः शिलामुद्ररपाणयः । बाहुभिः परिघाकारैस्तर्जयंतिस्म देवताः ॥१९१॥ प्रासैः खड्गैश्च पाशैश्च तोमरां कुशपट्टिशैः । चिक्रीडुस्तेशतध्नीभिः शतथारैश्च मुद्ररैः ॥९९२॥ खड्गशैलैश्च शैलैश्च परिधैश्चोद्यतायुधैः। युक्तं बलाहकगणैः सर्वतः संवृतं नभः ॥१९३॥ एवं तद्दानवं सैन्यं सर्वसत्वमदोत्कटम् । देवताभिमुखं तस्थौ मेघानीकमिवोदितम् ॥९९४॥ रेजे च तद्दैत्यसहस्त्रगाढं वाय्वम्निशैलांबुदतोयकल्पम् । बलंबलौघाकुलमभ्युदीर्ण युयुत्सयोन्मत्तमिवाबभासे ॥१९५॥ श्रुतस्ते दैत्यसैन्यस्य विस्तारः कुरुनंदन। सुराणामपि सैन्यस्य विस्तरं वैष्णवं श्रुणु॥१९६॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे दैत्यसेनावर्णनं नाम चत्वारिशत्तमोऽध्यायः ॥४०॥ —— ae अरिष्ट ॥१८३॥ पर्वतों को कंपा देने वाला युद्ध स्थल में सामने खड़ा था, वह किशोर नामक दैत्य किशोर के ही समान दैत्यों के बीच में उसी तरह विद्यमान था जैसे | ग्रहों के बीच सूर्य विद्यमान हों । नवीन मेघ के समान कान्ति वाला लम्बा काला वस्त्र धारण करके ॥१८५॥ वह दैत्यों के बीच कुहरा से आच्छन सूर्य के समान प्रतीत होता था। उसके पीछे दाँत, ओष्ठ तथा नेत्र ही जिसके आयुध थे ऐसा वसुन्धराभ था ॥१८६॥ वह महाग्रह के समान दैत्यों के बीच में हँस रहा था । दूसरे भी घुड़सवार तथा हाथी सवार भी दैत्य युद्ध के लिए तैयार थे ॥१८७॥ कुछ दैत्य सिंह पर, कुछ व्याघ्र पर, कुछ वराह पर, कुछ भालू पर, कुछ गधों पर, कुछ ऊंटो पर सवार थे । कुछ तो मेघ पर ही सवार थे ॥१८८॥ दूसरे भयङ्कर तथा विकृत मुख वाले दैत्य पैदल सेना में थे । कुछ एक पैर वाले कुछ बिना पैर के ही थे । सब युद्ध करने की इच्छा से नृत्य कर रहे थे ॥१८९॥ कुछ दैत्य अपनी ताल ठोक रहे थे बहुत से चिल्ला रहे थे । भयङ्कर सिंह के समान भयङ्कर दानव श्रेष्ठ गर्जना कर रहे थे ॥१९०॥ अपने हाथ में शिला और मुद्रर धारण किए हुए वे भयङ्कर गदाओं, परिधों तथा परिघ के समान भुजाओं से देवताओं को डरा रहे थे ॥१९१॥ वे प्रास, खड्ग, पाश, तोमर, अङ्कुश, पट्टिश, शतघ्नी, सौ धारों वाले तथा मुद्रर से क्रीडा कर रहे थे।१९२॥खड्ग, खड्गशैल, शेल से तथा परिधों से क्रीडा करते थे । आकाश मेघगण से ढँक गया । इसतरह की दैत्यों की सेना मद से उत्कट बनी थी । वह देवताओं के सामने उठे हुए मेध के समान खड़ी हो गयी ॥१५९४॥ हजारों दैत्यं से युक्त वह सेना लगती थी वायु और अग्नि से युक्त पर्वत रूपी मेघ का जल हो, इस तरह की दैत्यों की अति बलवती सेना देवताओं से युद्ध करने की इच्छा से उन्मत के समान प्रतीत होती थी ॥१९५॥ हे कुरुनन्दन! आपने दैत्यों की सेना का विस्तार सुना अब आप देवताओं की सेना का विस्तार सुनें ॥१९६॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के दैत्यसेना वर्णन नामक चालीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ४०।। — ie

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