Srishti Khanda Extracted Page 546

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-546

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Sanskrit Original

दिव्यास्त्रशस्त्ररुचिरं पयोधरनिनादितम् । स्वक्षं रथवरोदारं सूपस्थं गगनोपमम् ॥१६८॥ गदापरिघसंपूर्ण मूर्तिमंतमिवार्णवम् । हेमकेयूरवलयं चंद्रमंडलकूबरम् ॥१६९॥ सपताकध्वजोपेतं सादित्यमिवमन्दरम् । गजेंद्राभोगवपुषं क्वचित्केसरवर्चसम्। ।९७०॥ युक्तमृक्षसहस्रेण सुधारांबुदनादितम्। दीप्तमाकाशगं दिव्यं रथं पररथारुजम् ॥१७१॥ अध्यतिष्ठद्रणाकांक्षी मेरु दीप्तमिवांशुमान् । तारस्तु क्रोशव्रिस्तारमायामे च तथाविघम् ॥१९७२॥ शैलकूबरसंकाशं नीलांजनचयोपमम् । काललोहस्य' रत्नानां समूहावद्धकूबरम् ॥१७३॥ तिमिरोद्रारकिरणं गर्जतमिव तोयदम्। लोहजालेन महता सगवाक्षेण दंशितम् ॥१७४॥ आयसैः परिधैः पूर्ण क्षेपणीयैश्च मुहरैः । प्रासैः पाशैश्च विततैरसंयुक्तैश्च कण्टकैः ॥१७५॥ शोभितं त्रासनीयैश्च तोमरैः स परश्वधैः । उद्यन्तंद्विषतां हेतोर्द्वितीयमिव मंदरम् ॥१७६॥ युक्तं खरसहस्रेण सोऽध्याराहद्रथोत्तमम् । विरोचनस्तु संक्रुद्धो गदापाणिरवस्थितः ॥१७७॥ प्रमुखे तस्य सैन्यस्य दीप्तश्गृंग इवाचलः । युक्तं हयसहस्रेण हयग्रीवस्तु दानवः ॥१७८॥ व्यूहितं दानवव्यूहं परिचक्रमवीर्यवान्। विप्रचित्तिसुतः श्वेतः श्वेतकुंडलभूषणः ॥१७९॥ स्यंदनं वाहयामास परानीकस्य मर्दनः । व्यायतं किष्कुसाहस्रं धनुर्विस्फारयन्महत् ॥१८०॥ स चाहवमुखे तस्थौ सप्ररोह इवाचलः । खरस्तु विष्किरिन् क्रोधान्नेत्राभ्यां रोपजं जलम् १८ १॥ स्फुरहंतौष्ठनयनः सङ्ग़ाम सोभ्यकांक्षत । त्वष्टा त्वष्टादशहयं यानमास्थाय दानवः॥१८२॥ दिव्यव्यूहप्रतीकाशोयुद्धायाभिमुखः स्थितः । अरिष्टो बलिपुत्रश्च वरिष्ठो दुर्घरायुधः ॥१८३॥ पक्षिण से वह सुशोभित था । वह दिव्य असों तथा शस्रों से मनोहर तथा मेघ के समान घर्घर ध्वनि करता था । उस श्रेष्ठ रथ का पृष्ठ भाग आकाश के समान विस्तृत था ।।१६५-१६८॥ गदाओं और परिघों से भरा हुआ वह मूर्तिमान समुद्र के समान था । सुवर्ण निर्मित केयूर तथा वलय वाले उस रथ के बीच का भाग चन्द्रमण्डल के समान था । आदित्य से सुशोभित मन्दणाचल के समान वह पताकाओं तथा ध्वजों से सुशोभित था । उसका कलेवर गजेन्द्र के समान विस्तृत तथा कहीं पर केसर के समान चमकदार था एवं हजारो तारों से युक्त, सुन्दर धाराओं के युक्त, मेघ के समान ध्वनि करता था । इस प्रकार का देदीप्यमान वह आकाशगामी रथ दूसरों के रथ को विनष्ट कर देने वाला था ॥१६९-१७२॥ तारकासुर तो ऐसे रथ पर बैठा था जिसमें हजारो गधे जुते हुए थे । उस रथ की लम्बाई तथा चौड़ाई एक कोश में थी । वह देखने में पर्वत के मध्य भाग के समान था, लगता था जैसे वह काले आंजन का समूह हो । उसके बीच का भाग काले लोहे के रत्नों से बंधा था ॥१७३॥ उसकी चमक से अन्धकार फैल जाता था। उसकी मेघ के समान ध्वनि होती थी उसकी खिड़कियाँ लौह समूह से बनी थीं ॥१७४॥ वह रथ लोहे से निर्मित परिघ तथा प्रक्षेपणीय मुद्ररों से भरा हुआ था, पृथक्-पृथक् कण्टकों से युक्त वह प्रासों तथा प्राशों से भरा था । वह मय पैदा करने वाले तोमर तथा कुठारों से सुशोभित था । ऐसा लगता था जैसे वह शत्रुओं के लिए दूसरा मंदाचल प्रकट हुआ हो ॥१७५-१७६॥ क्रुद्ध विरोचन अपने हाथ में गदा धारण करके खड़ा था । वह असुर सेना का प्रमुख सेनापति था । देखने में पर्वत शिखर के समान लगता है । हजारो अश्व रोहियों से युक्त हयग्रीव नामक पराक्रमी दानव। १७७- १७८॥ व्यूहबद्ध दानव सेना के चारो ओर धूम रहा था । श्वेत कुण्डल धारण किए, हुए विप्रचित्ति का पुत्र श्वेत शत्रु की सेना को मसलं डालने वाला था वह हजारो हाथ विस्तृत अपने रथ को विशाल धनुष का टंकोर करते हुए आगे बढा रहा था ॥१७९-१८०॥ वह युद्ध के अग्रभाग में बढ़ते हुए पर्वत के समान आगे आकर खड़ा हो गया । खर नामक राक्षस के आँखों से क्रोध के कारण जल निकल पड़ा ॥१८१॥। उसके दाँत, ओष्ठ एवं नेत्र फड़फड़ा रहे थे, वह युद्ध करना चाहता था । त्वष्टा नामक दानव अठारह घोड़ों वाले रथ पर चढकर ॥१८२॥ दिव्य व्यूह के समान युद्ध करने के लिए सामने खड़ा था । बलि का बड़ा तथा भयङ्कर आयुध धारण करने वाला पुत्र

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