Srishti Khanda Extracted Page 545
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-545
Sanskrit Original
तेकृतांजलयः सर्वे देवा इंद्रपुरोगमाः । जयशब्दं पुरस्कृत्य शरण्यं शरणंगताः ॥१५४॥ एतेषां च गिरः श्रुत्वा सविष्णुर्देवदैवतः। मनश्चक्रे विनाशाय दानवानां महामृधे ॥१५५॥ आकाशे तु स्थितो विष्णुरुत्तमं वपुराश्रितः । उवाच देवताः सर्वाः सप्रतिज्ञमिदं वचः ॥१५६॥ शांतिं ब्रजत भद्रं वो मा भैष्टमरुतां गणाः ! जितामे दानवाः सर्वे त्रैलोक्यं परिगृह्यताम् ॥१५७॥ ततोस्य सत्यसंधस्य विष्णोर्वाक्येन तोषिताः । देवाः प्रीतिं परां जग्मुः प्राश्यामृतमिवोत्तमम् ॥१५८॥ ततस्तमश्च संहृत्य विनेशुश्च बलाहकाः । प्रववुश्च शिवा वाताः प्रसन्नाश्च दिशो दश ॥१५९॥ शुद्धप्रायाणि ज्योतीषि सोमं चक्रुः प्रदक्षिणम् । न विग्रहंग्रहाश्चकुः प्रसन्नाश्चापिसिंधवः॥१६०॥ विरजा अभवन् मार्गा लोकाः स्वर्गादयसत्रयः । यथार्थमूहुस्सरितश्चुक्षुभे न तथार्णव: ॥१६ १॥ आसन्छुभानीन्द्रियाणि नराणामंतरात्मसु । महर्षयो वीतशोका देदानुच्चैरधीयत॥१६२॥ यज्ञेषु च हविः पाकं शिवमापाच पावकः । प्रवृत्तधर्मसंवृत्ता लोकामुदितमानसाः ॥९६३॥ विष्णोः सत्यप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधनागिरः । ततोभयं विष्णुमुखाच्छुत्वा दैतेयदानवाः ॥१६४॥ उद्योगं विपुलं चक्कुर्युद्धाय विजयाय च । मयस्तु कांचनमयं त्रिनल्वांतरमव्ययम् ॥१६५॥ चतुश्चक्रं सुविपुलं सुकल्पितमहायुधम् । किंकिणीजालनिर्घोषं द्वीपिचर्मपरिष्कृतम् ॥१६६॥ रुचिरं रश्मिजालैश्च हैमजालैश्च शोभितम् । ईहा मृगगणाकीर्ण पक्षिसंघविराजितम् ॥९६७॥ करने वाले, जिसको देवता और दैत्य कभी पराजित नहीं कर सकते हैं ॥१५२॥ ऐसे हर्यश्वरथ से युक्त मोतियों की शोभा से युक्त, दिव्य लोक रूपी महारथ में उपविष्ट भगवान् विष्णु ने देवताओं को दर्शन दिया ॥१५३॥ इन्द्र इत्यादि सभी देवता हाथ जोड़कर जय शब्द का उच्चारण करके उन शरण्य श्रीभगवान् की शरणागति किए। १५४॥ देवताओं की वाणी को सुनकर देवताओं के भी देवता भगवान् विष्णु ने महासमर में दानवों का विनाश करने के लिए मन बनाया ॥१५५॥ उत्तम शरीर वाले आकाश में स्थित भगवान् विष्णु प्रतिज्ञा करते हुए सभी देवताओं से कहे। १५६॥ हे देवताओं ! आपलोग भयभीत न होइये, शान्त हो जाइये, आपलोगों का कल्याण हो । मैं सभी दैत्यो को जित लूँगा और आपलोगों को त्रैलोक्य प्रदान करूंगा ॥१५७॥ उसके पश्चात् सत्यसङ्कल्प वाले भगवान् विष्णु के वाक्य से सन्तुष्ट होकर देवता उसीतरह की प्रसन्नता का अनुभव किये जिस तरह की प्रसन्नता उन्हें अमृत का पान करने से होती है ॥१५८॥ उसके पश्चात् अन्धकार को उपसंहृत करके मेघ विनष्ट हो गये । सुखद वायु चलने लगी दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं ॥१५९। सभी ज्योतियाँ शुद्ध होकर चन्द्रमा की प्रदक्षिणा करने लगीं । ग्रहों में अब कोई भी विग्रह नहीं हो रहा था, सभी नदियाँ स्वच्छ हो गयीं ॥१६०॥ सभी मार्ग धूलि रहित हो गये तथा स्वर्ग आदि लोक रजोगुण रहित हो गये । नदियाँ अपने मार्ग से प्रवाहित होने लगीं तथा महासागर में क्षोभ नहीं उत्पन्न हुआ ॥१६१॥ मनुष्यों की अन्तरात्माओं में इन्द्रियाँ मङ्गलमयी हो गयीं । शोक रहित महर्षिण उच्च स्वर से वेद घोष करने लगे॥१६२॥ यज्ञो में अग्नि देव ने कल्याणमय हविष्यपाक को ग्रहण किया । प्रवृति मार्ग में लगे हुए लोगों का मन प्रसन्न हो गाया ॥१६३॥ सत्य प्रतिज्ञ भगवान् विष्णु के मुख से शत्रुओं के विनाश विषयक वाणी को सुनकर ये सारी बातें हो गयीं । उसके पश्चात् विष्णु के मुख से भयप्रद वाणी को सुनकर सभी दैत्य तथा दानवों ने ॥१६४॥ युद्ध करने तथा विजय प्राप्त करने के लिए पूरी मात्रा में तैयारी की । मय नामक दानव युद्ध करने की इच्छा से ऐसे रथ पर बैठा जो उदित हुए सूर्य से सुशोभित सुमेरु पर्वत के समान था । वह सुवर्ण निर्मित रथ, तीन नल्वों (प्रकोष्ठों) वाला था । उसमें चार चक्र लगे थे । उसमें विपुल मात्रा में महान् आयुध भरे थे । वह ईहामृगों से परिपूर्ण था तथा
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