Srishti Khanda Extracted Page 542
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-542
Sanskrit Original
यं यं कामयते कामं तं तं लोकेश्वराल्लभेत् । सर्वाविहाय य इमं पठेद्वै पौष्करं हरेः ॥११९॥ प्रादुर्भावं नरश्रेष्ठ न तस्य ह्यशुभं भवेत् । एष पौष्करको नाम प्रादुर्भावो महात्मनः ॥१९२॥ कीर्तितस्तु महाराज व्यासः श्रुतिनिदर्शनात्। विष्णुत्वं श्रृणु मेविष्णो हरित्वं च कृते युगे॥९ ९३॥ वैकुंठत्वं च देवेषु कृष्णत्वं मानुषेषु च। ईश्वरस्य हि तस्यैषा कर्मणां गहना गतिः ॥११४॥ सांप्रतं भूतभव्यंच श्ृणुराजन्यथातथम् । अव्यक्तो व्यक्तलिंगस्थो य एष भगवान्प्रभुः ॥११५॥ नारायणो ह्यानंतात्मा प्रभवाप्यय एव च। एष नारायणो भूत्वा हरिरासीत्सनातनः॥ १ १६॥ ब्रह्मा वायुश्चसोमश्च धर्मः शक्रो बृहस्पतिः । अदितेरपि पुत्रत्वमेत्यजः कुरुनंदन ॥११७॥ एष विष्णुरिति ख्यात इंद्रस्यावरजो विभुः । प्रसादनं तस्य विभोरदित्याः पुत्रकारणम् ॥११८॥ वधार्थं सुरशत्रूणां दैत्यदानवरक्षसाम्। ससर्जाथ सुरान्कल्ये ब्रह्माणं च प्रजापतीन् ॥११९॥ असृजन्मानसास्तत्र ब्रह्मवंशाननुत्तमान् । तेभ्यो भवन्महात्मभ्यः परं ब्रह्मसनातनम् ॥१२०॥ एतदाश्चर्यभूतस्य विष्णोः कर्मानुकीर्तितम्। कीर्तनीयस्य लोकेषु कीर्त्यमानं निबोध मे ॥९२९॥ वृत्ते वृत्रवधे भीष्म वर्तमाने कृते युगे । आसीत््रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः ॥१ २ २॥ यत्र ते दानवा घोराः सर्वे संग्रामदुर्जयाः । घ्नंतिदेवासुरान् सर्वान्सयक्षोरगराक्षसान्॥१२३॥ ते वध्यमाना विमुखाश्चिछन्नप्रहरणा रणे। त्रातारं मनसा जग्मुर्देवं नारायणं प्रभुम् ॥९२४॥ एतस्मिन्नंतरे मेघा निर्वाणांगारवर्चसः। सार्कचंद्र्रहगणंच्छादयंतो नभस्तलम् ॥१२५॥ कर लेता है ॥१०९॥ जिसकी आयु क्षीण हो गयी रहती है वह आयु को प्राप्त कर लेता है तथा पुत्रहीन पुत्र को प्राप्त कर लेता है । यज्ञार्थी पुरुष अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेते हैं तथा अनेक प्रकार की तपस्याओं के फल को प्राप्त कर लेते हैं ॥॥११०॥ जो मनुष्य सब कुछ छोड़कर श्रीहरि के पौष्कर प्रसङ्ग को पढता है, वह जिन-जिन कामनाओं को करता है, उन समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है ॥१११॥ हे नसश्रेष्ठ ! उस पुरुष का अशुभ योनि में जन्म नहीं होता है । यह महात्मा ब्रह्माजी का पौष्कर नाम का प्रादुर्भाव है ॥११२॥ हे महाराज ! मैंने यह सब कुछ महर्षि व्यास के कथनानुसार कहा है । तुम भगवान् विष्णु के विष्णुत्व को मुझसे सुनो । सत्ययुग में वे ही श्रीहरि हुए ॥॥११३॥ देवों में उनके वैकुण्ठत्व तथा मनुष्यों में कृष्णत्व, ये सबके सब श्रीभगवान् के ही धर्म हैं कमो की गति अत्यन्त गहन है ॥११४॥ हे राजन् ! इस समय तुम भूत तथा भविष्य का श्रवण करो । ये श्रीभगवान् व्यक्तलिङ्गों में अव्यक्त रूप से रहते हें ॥११५॥ अनन्त स्वरूप भगवान् नारायण ही सबों को उत्पत्ति स्थान तथा लय स्थान हैं । सृष्टि के प्रारम्भ में ये भगवान् नारायण ही सनातन हरि रूप से विद्यमान थे । हे कुरुनन्दन ! ये ही ब्रह्मा, वायु, सोम, धर्म, इन्द्र, बृहस्पति तथा अदिति के पुत्र बन जाते है ॥११७॥ ये ही विष्णु रूप से प्रसिद्ध हैं तथा ये ही इन्द्र के छोटे भाई हो गये । अदिति ने अपने पुत्रों को राज्य दिलवाने के लिए इन्हें प्रसन्न किया ॥११८॥ वह चाहती थी कि देवताओं के शत्रु दानव और राक्षस मारे जायँ । कल्प के प्रारम्भ में इन्होंने ही सभी देवताओं तथा ब्रह्मा की सृष्टि की । ब्रह्माजी ने प्रजापति इत्यादि श्रेष्ठ वंशों की मन से सृष्टि की । उन सभी महात्माओं से श्रेष्ठ ये परब्रह्म हुए॥१२०॥ आश्चर्य रूप तथा लोकों में कीर्तनीय भगवान् विष्णु के कर्मों का मैंने वर्णन किया, उन कीर्तन किए जाने वाले भगवान् विष्णु को तुम मुझसे जानो ॥१२१॥ हे भीष्म ! वर्तमान सत्ययुग में जब वृत्रासुर का वध हो गया उस समय त्रैलोक्य विख्यात तारकामय संग्राम हुआ ॥१२२॥ उस संग्राम में सभी भयङ्कर तथा दुर्जय दानव, सभी देवताओं, यक्षों, सर्पों तथा राक्षसों को मारने लगे ॥१२३॥ दानवों से मारे जाते हुए वे युद्ध से विमुख हो गये । युद्ध f |]
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