Srishti Khanda Extracted Page 541
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-541
Sanskrit Original
श्रीपद्यमहापुराण विश्वान्देवान्देवमाता विश्वेषां जनयत्सुतान् । मरुत्वती मरुत्वतो देवानजनयत्सुतान्॥९५॥ अग्निश्वक्षूरविज्योति: सावित्री मित्रमेव च । अमरं शरवृष्टिं च सुकर्ष च महत्तरम् ॥९६॥ विराजं चैव राजं च विश्वायु सुमतिं तथा। अश्वगं चित्ररश्मि च तथाचानिषधं नृपम् ॥९७॥ भूय एवं चात्मविधिं चारित्रं पादमात्रगम्। बृहंतं वै बृहद्रूपं तथा चैवसनाभिगम्॥९८॥ मरुत्वती प्रज्ञां जज्ञे ज्येष्ठांतं मरुतां गणम्। अदितिः कश्यपाज्जज्ञे आदित्यान् द्वादशैव हि ॥९९॥ इंद्रो विष्णुर्भगस्त्वष्टा वरुणोंशोऽर्यमारविः । पूषामित्रश्च वरदो धाता पर्जन्य एव हि ॥१००॥ इत्येते द्वादशादित्या दरिष्टास्रिदिवौकसाम्। आदित्यस्य सरस्वत्यां जज्ञाते द्वौ सुतौ वरौ ॥१०९॥ तपः श्रेष्ठौ गुणश्रेष्ठौ त्रिदिवस्यातिसंमतौ । दनुस्तु दानवान् जज्ञे दितिर्दैत्यान्व्यजायत ॥१०२॥ काला तु कालकेयांस्तानसुरान् राक्षसांस्तथा । अनायुषायास्तनया व्याधयश्च महाबलाः ॥१०३॥ सिंहिका ग्रहमाता च गंधर्वजननी मुनिः। प्राचीत्वप्सरसां माता पुण्यानां भारतेतरा ॥१०४॥ क्रोधाद्या: सर्वभूतानि पिशाचा सा च पार्थिव। जज्ञे यक्षगणांश्चैव राक्षसांश्च विशांपते ॥१०५॥ चतुष्पदानि सत्वानि एतागाश्चैव सौरभी । पुराणपुरुषश्चैव मायां विष्णुर्हरिः प्रभुः ॥१०६॥ कथ्ितस्तेनुपूर्वेण संस्तुतश्च महर्षिभिः । यश्चेदमग्रयं शृणुयात्पुराणं, सदा नरः पर्वसु चेत्पठेत् ॥९०७॥ अवाप्य लोकं स हि वीतरागः, परत्र च स्वर्गफलानि भुंक्ते । चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम् ॥१०८॥ प्रसादयति यः कृष्णां तस्य कृष्णः प्रसीदति । राज्यं च लभते राजा निर्धनश्चोत्तमं धनम् ॥१०९॥ क्षीणायुर्लभते चायुः पुत्रकामोथ संततिम् । यज्ञार्थिनस्तथाकामांस्तपांसि विविधानि च ॥११०॥ ने उत्पन्न किया ॥९५॥ अग्नि, चक्षुः रवि, ज्योति, सावित्री मित्र, अमर, शरवृष्टि, सुकर्ष, महत्तर ॥९६॥ विराजराज, विश्वायु, सुमति, अश्वग, चित्ररश्मि, निषध, नृप ॥९७॥ आत्मविधि, चारित्र, पादमात्रग, बृहत्, बृहद्रूप, सनाभिग।९८॥ मरुत्वती ने इन ज्येष्ठान्त मरुद्गणों को मारुत्वान से उत्पन्न किया । अदिति ने महर्षि कश्यप के पुत्र द्वादश आदित्यों को उत्पन्न किया ॥९९॥ इन्द्र, विष्णु, भग, त्वष्टा, वरुण, अंश, अर्यमा, रवि, पूषा, मित्र, वरदाता, धाता तथा पर्जन्य ॥१००॥ ये सभी द्वादशादित्य है तथा देवताओं में श्रेष्ठ हैं । आदित्य के सरस्वती के गर्भ से दो श्रेष्ठ पुत्र हुए।।१०१॥ तप एवं श्रेष्ठ ये दोनों श्रेष्ठ गुणों से युक्त तथा स्वर्गलोक के अत्यन्त अनुकूल थे । दनु ने दानवों को उत्पन्न किया और दिति के पुत्र दैत्य हुए ॥१०२॥ काला ने कालकेय असुरों तथा राक्षसों को उत्पन्न किया । अनायुषा ने महाबलवान् व्याधियों को उत्पन्न किया ॥१०३॥ ग्रहों की माता सिंहिका हुयी और गन्धर्वो की माता मुनि हुयी । अप्सराओं की माता प्राची थीं और पुण्यों की माता भारतेतरा हुयी ॥१०४॥ हे राजन् ! क्रोधा आदि ने भूतों तथा पिशाचों को उत्पन्न किया । हे राजन् ! उन सबों ने ही यक्षों तथा राक्षसों को भी उत्पन्न किया ॥१०५॥ सुरभि ने गायों तथा चार पैर वाले जानवरों को जन्म दिया । पुराण पुरुष श्रीहरि भगवान् विष्णु ने माया को उत्पन्न किया॥१०६॥ महर्षियं के द्वारा संस्तुत प्रसङ्ग को मैंने आपको क्रमशः बतलाया । जो मनुष्य इस श्रेष्ठ पुराण को सदा सुनता है तथा पर्व (संक्रान्ति) के समय पढ़ता है ॥१०७॥ वह इस लोकराग से विरक्त हो जाता है तथा परलोक में स्वर्ग सुख को भोगता है । जो मनुष्य चक्षु, मन, वाणी तथा कर्म इन चारो प्रकारों से ॥१०८॥ श्रीभगवान् को प्रसन्न करता है उस पर श्रीभगवान् प्रसन्न हो जाते हैं । राजा राज्य प्राप्त कर लेता है और निर्धन मनुष्य उत्तम धन को प्राप्त
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