Srishti Khanda Extracted Page 540
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-540
Sanskrit Original
एताः पञ्चवरिष्ठा वै सुरश्रेष्ठाय पार्थिव । दत्ता धर्माय भद्र त ब्रह्मणा दृष्टकर्मणा ॥७८॥ या रूपार्धवी पत्नी ब्रह्मणः कामरूपिणी। सुरभिः सहसा भूत्वा ब्रह्माणं समुपस्थिता ॥७९॥ ततस्तामगमद्ृह्मा मैथुने लोकपूजितः । लोकसर्जनहेतुज्ञो गवामर्थाय सत्तम ॥८०॥ जज्ञे चैकादश सुतान्विपुलान्धर्मसंज्ञितान् । रक्त संध्याभ्रसंकाशान् महतस्तिग्मतेजसः ॥८ १॥ ते रुदंतो द्रबंतश्च गतवंतः पितामहम् । रोदनाद्द्रवणाच्चैव रुद्रा एवेति ते स्मृताः ॥८ २॥ निर्हतिश्चैव संध्यश्च तृतीयश्चाप्ययोनिजः । मृगव्याधः कपर्दी च महाविश्वेश्वरश्च यः ॥८३॥ अहिर्बुध््यश्च भगवान्कपाली चैव पिंगलः । सेनानीश्च महतेजा रद्राश्चैकादशस्मृताः ॥८ ४॥ तस्यामेवसुरभ्यां च गावो जाताः सुराश्च ये। अजश्चैव तु हंसश्च तथैव तृपसत्तम ॥८५॥ ओषध्यः प्रवरा याश्च सुरभ्या स्तास्समुत्थिताः। धर्माल्लक्ष्मीस्तथाकामं सा्यान्साध्याव्याजायत ॥८६॥ भवं च प्रभवं चैव कृशाश्वं सुवहं तथा । अरुणं वरुणं चैव विश्वामित्रचलध्रुवौ ॥८ ७॥ हविष्मंतं तनूजं च विधानाभिमतावपि । वत्सरं चैव भूतिं च सर्वासुरनिषूदनम् ॥८८॥ सुपर्वाणं बृहत्कांतिं साध्या लोकनमस्कृतम् । वासवानुगता देवी जनयामास वै सुरान् ॥८९॥ धरं वै प्रथमं देवं द्वितीयं ध्रुवमव्ययम् । विश्वावसुं तृतीयं च चतुर्थ सोममीश्वरम् ॥९०॥ ततोऽनुरूपमायं च यमं तस्मादनंतरम्। सप्तं च तथावायुमष्टमं निरृतिं तथा ॥९९॥ धर्मस्यापत्येमतद्टै सुरभ्यां तदजायत्। विश्वेदेवाश्च विश्वायां धर्माज्जाता इति स्मृताः ॥९२॥ दक्षश्चैव महाबाहुः पुष्करस्तम एव च। चाक्षुषश्च ततोत्रिश्च तथाभद्रमहोरगौ ॥९३॥ विश्वांतक वसुर्वालो निकुंभश्च महायशाः । रुरुद्श्चातिसिद्धौजा भास्करप्रमितद्युतिः ॥९४॥ पुत्रियों की सृष्टि की थी। उनके नाम है-- लक्ष्मी, सरस्वती, सन्ध्या, महायशस्विनी विश्वेशा तथा देवी ॥७७॥ हे राजन् ! कर्मो को जानने वाले ब्रह्माजी ने इन पाँचों का विवाह देवताओं में श्रेष्ठ धर्म से कर दिया ॥७८॥ ब्रह्माजी के आधे शरीर से उत्पन्न जो उनकी पत्नी थी वह अपना रूप इच्छा के अनुसार बना लेती थी । वह सुरभि (कामधेनु) का रूप धारण करके ब्रह्माजी के पास गयी ॥७९॥ उसके पश्चात् लोकसंग्रह को जानने वाले ब्रह्माजी ने गायों को प्राप्त करने के लिए उसके साथ सङ्गम किया ॥८०॥ और उससे ग्यारह सन्तानों को प्राप्त किया जो धर्म संज्ञक हुए ।वे सायं कालिक रक्तवर्ण के तथा अत्यन्त तीक्ष्ण तेजस्वी थे ॥८१॥ वे दौड़ते हुए तथा रोते हुए ब्रह्माजी के पास गये । रोने तथा दौड़ने के कारण वे रुद्र कहलाये ॥८२॥ उनके नाम है-- निऋति, सन्ध्य, अयोनिज, मृग, व्याध, कपर्दी, महाविश्वेश्वर, अहिर्बुध्न्य, कपाली, पिगंल तथा सेनानी, ये ग्यारह रुद्र हैं ॥८ ३-८४॥ इसी सुरभि के गर्भ से गायें तथा देवता उत्पन्न हुए । बकरा तथा हंस भी उससे ही उत्पन्न हुए ॥८५॥ उस सुरभि से अनेक प्रकार के श्रेष्ठ अन्न उत्पन्न हुए । लक्ष्मी से धर्म के पुत्र काम उत्पन्न हुए । साध्या से साध्यदेवगण उत्पन्न हुए ॥८६॥ साध्यों के नाम हैं भव, प्रभव, कृशाश्व, सुवह, अरुण, वरुण, विश्वामित्र, चल, ध्रुव, हविष्मान्, तनूज, विधान, अभिमत, वत्सर, भूति सभी असुरों को विनष्ट करने वाले सुपर्वा, तथा बृहत्कान्ति, ये सभी लोक नमस्कृत साध्य देवगण हैं । देवी (वसु) ने देवताओं का अनुगमन करने वाले वसु देवताओं को उत्पन्न किय ॥८७-८९॥ उन वसुओं के नाम है धर, ध्रुव, विश्वावसु, सोम, अनुरूपमाय, यम, वायु तथा निऋति ॥९०-९१॥ ये सभी धर्म की सन्तानें सुरभि से उत्पन्न हुयी । विश्वा के गर्भ से धर्म के पुत्र विश्वेदेव उत्पन्न हुए ॥९२॥ महाबाहु दक्ष, पुष्कर, तम, चाक्षुष, अत्रि, भद्र, महोरग ॥९३॥ विश्ववान्तक, वसु, बाल, महायशस्वी निकुम्भ, रुरुद, अतिसिद्धौजा, भास्कर तथा प्रमितद्युति ॥९४॥ इन समस्त विश्वेदेवों को देवमाता विश्वा
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