Srishti Khanda Extracted Page 539
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-539
Sanskrit Original
ततः सोप्यब्रवीद्वाक्यं किं करोमि पितामह । पितामह समाज्ञातो ब्रह्माणं समुपस्थितः ॥६ २॥ ब्राह्मणस्यामृतरसो नु भूतस्तेन वै ततः। प्राप्तः स परमं स्थानं स तयोः पार्श्वमागतः ॥६३॥ तस्मिन्नपि गते सोऽथ तृतीयमसृजत््रभुः। मोक्षप्रवृत्तिकुशलं सवर्नाम युतं प्रभुः ॥६४॥ सोऽपि तं धर्ममास्थाय तयोरेवागमद्रतिम् । एवं पुत्रा खयोप्येते गताः शंभोर्महात्मनः ॥६५॥ तान् गृहीत्वा सुतास्तस्य तौ गतवूर्जितां गतिम् । नारायणश्च भगवान्कपिलश्च यतीश्वरः ॥६६॥ यं कालं ते गता ब्रहम ब्रह्मा तं कालमेव च। तपोघोरतरं भूयः संश्रितः परमं पदम् ॥६७॥ न च शक्तस्ततो ब्रह्मा प्रभुरेकस्तपश्चरन्। शरीरार्धात्ततो भार्यामुत्पादयति तच्छुभाम् ॥६८॥ आत्मनः सद्शान्पुत्रानसृजद्वै पितामहः। विश्वे प्रजानां पतयो येभ्यो लोकाविनिःसृताः ॥६९॥ विश्वेशं प्रथमं तावन्महात्मा तपसात्मजम् । सर्वत्र संहृतं पुण्यं नाम्रा धर्म स सृष्टवान् ॥७०॥ दक्षं मरीचिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । वसिष्ठं गौतमं चैव भृगुमंगिरसं मुनिम् ॥७९॥ अत्यद्धुतास्स्वकृत्येन ज्ञेयास्ते तु महर्षयः । त्रयोदशगुणारंभा ये वंशास्तु महर्षिणाम् ॥७ २॥ अदिति दिति दनुः काला अनायुः सिंहिका खसा । प्राची क्रोधा च सुरसा विनता कद्टुरेव च ॥७३॥ दक्षस्यापत्यमेत द्वै कन्याद्वादशपार्थिव । नक्षत्राणि च चंद्रस्य विंशतिस्सप्तचोर्जिताः ॥७४॥ मरीचेः कश्यपः पुत्रस्तपसानिर्मितः किल। तस्मै द्वादशकन्याश्च दक्षस्ताश्चान्वमन्यत॥७५॥ नक्षत्राणि च सोमाय तथैवं दत्तवानृषिः । रोहिण्यादीनि सर्वाणि पुण्यानि कुरुनंदन ॥७६॥ लक्ष्मीस्सरस्वतीसंध्या विश्वेशा च महायशाः । देवी सरस्वती चैव ब्रह्मणानिर्मिताः पुरा ॥७७॥ मुवः की सृष्टि की । महामना ब्रह्माजी ने मन से ही सङ्कल्प करके सृष्टि की थी ॥६१॥ उसके बाद उसने भी कहा पितामह मैं आपकी कौन सी सेवा करूँ ? ब्रह्माजी के पास आये हुए ब्रह्माजी की आज्ञा प्राप्त करके उसने ब्राह्मण के अमृत रस का अनुभव किया । उसी के द्वारा वह परम स्थान को प्राप्त करके उन दोनों के पास चला गया ॥६२-६३॥ उसके भी चले जाने पर ब्रह्माजी ने तीसरे पुत्र स्व: की सृष्टि की । वह भी मोक्ष की प्रवृत्ति में कुशल था ॥६४॥ वह भी धर्म को अपनाकर उपर्युक्त भू: तथा भुव: की ही गति को प्राप्त कर लिया । इसीतरह शङ्करजी के भी तीन पुत्र इसी गति को प्राप्त कर लिये ॥६५॥ ब्रह्माजी के उन तीनों पुत्रों को लेकर भगवान् नारायण और यतीश्वर कपिल श्रेष्ठ गति को चले गये ॥६६॥ जिस समय वे सब ब्रह्म को प्राप्त कर लिए उसी समय से ब्रह्माजी ने परमपद में ही रहकर घोर तपस्या की ॥६७॥ जब अकेले ब्रह्माजी तपस्या नहीं कर सके तब उन्होंने अपने शरीर के आधे भाग से शुभ पत्नी को उत्पन्न किया ॥६८॥ उसके बाद उन्होंने अपने ही समान सम्पूर्ण प्रजापति पुत्रों को उत्पन्न किया । उन सबो से ही लोकों की सृष्टि हुयी ॥६९॥ सर्वप्रथम प्रजापति ने धर्म को तपस्या से उत्पन्न किया । वह सर्वत्र पुण्य के नाम से व्याप्त हो गया ॥७०॥ इसके बाद उन्होंने दक्ष, मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, गौतम, भृगु तथा अङ्गिरा मुनि को उत्पन्न किया ॥७१॥ ये सभी महर्षि अत्यन्त अद्भुत कर्म करने वाले हैं । महर्षियों के तेरह गुण से प्रारम्भ होने वाले वंश है वे इन्हीं से हैं ॥७२॥ अदिति, दिति, दनु, काला, अनायुः, सिंहिका, खसा, प्राची, क्रोधा, सुरसा, विनता तथा कद्रु ॥७३॥ हे राजन् ! ये बारह दक्ष की पुत्रियाँ हैं । तथा जो चन्द्रमा के सत्ताइस नक्षत्र हें वे भी दक्ष की ही पुत्रियाँ हैं ॥७४॥। मरीचि महर्षि ने तपस्या करके कश्यप नामक पुत्र को उत्पन्न किया । दक्ष प्रजापति ने अपनी बारह पुत्रियों का विवाह महर्षि कश्यप से कर दिया ॥७५॥ उन्होंने अपनी सत्ताइस पुत्रियों का विवाह चन्द्रमा से कर दिया । हे कुरुनंदन ! उनमें रोहिणी इत्यादि पुण्य नक्षत्र भी हैं ॥७६॥ ब्रह्माजी ने पहले ही पाँच
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