Srishti Khanda Extracted Page 538

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-538

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Sanskrit Original

वरं प्रदायाथ महासुराभ्यां सनातनो विश्वधरः सुरोत्तमः । रजस्तमोजौ तु तदां जनोपमौ ममर्दतावूरुतलेऽ मरप्रभुः ॥४७॥ स्थित्वा तस्मिंस्तु कमले ब्रह्मा ब्रह्मविदांवरः । ऊर्ध्वबाहुर्महातेजास्तपो घोरं समाश्रितः॥४८॥ प्रज्वलन्निव तेजोभि भाभिः स्वाभिस्तमोनुदः। बभासे स तु धर्मात्मा सहस्रांशुरिवांशुभिः ॥४९॥ अथान्यद्रूपमास्थाय प्रभुर्नारायणोव्ययः । आजगाम महातेजा योगाचार्यो महायशाः ॥५०॥ सांख्याचार्यश्च मतिमान् कपिलो ब्रह्मणां वरः । उभावपि महात्मानौ पूजितौ तत्र तत्परौ ॥५१॥ तौ प्राप्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणममितौजसम् । परावरविशेषज्ञौ पूजितौ च महर्षिभिः ॥५२॥ ब्रह्मसंपरिवेद्यं ते विशालजगदास्थितौ । ग्रामणीस्सर्वभूतानां ब्रह्मा त्रैलोक्यपूजितः ॥५३॥ तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा विवोध्य गतयोः परम् । त्रीनिमान्कृतवान् लोकान् यथेयं ब्रह्मणः श्रुतिः ॥५४॥ पुत्रं स्वसंभवं चैकं समुत्पादितवान्भुवम्। तदाग्रे चागतस्तस्य ब्रह्ममानससंभवः ॥५५॥ उत्पन्नमात्रो ब्रह्माणमुक्तवान्मानसः सुतः । कि कुर्मस्तवसाहाय्यं व्रवीतु भगवानिति ॥५६॥ ब्रह्मोवाच यदेष कपिलो नाम ब्रह्मनारायणस्तथा । वदतो भवतत्वं तु तत्कुरुष्व महामते ॥५७॥ ब्रह्मणा स तथोक्तस्तौ प्राह भूपसमुत्थितः । सुश्रुषुरस्मि युवयोः किंकरोमि कृतांजलिः ॥५८॥ श्रीभगवानुवाच यत्सत्यमक्षरंब्रह्म अष्टादशविधंच तत् । यत्सत्यमृतं तत्तु परं पद् मनुस्मर ॥५९॥ एतद्दचोनिशम्यैवं स ययौ दिशमुत्तराम् । गत्वा च तत्र स ब्रह्म अगमज्ज्ञानचक्षुषा ॥६०॥ ततोब्रह्मा भुवर्नाम द्वितीयमसृजत्प्रभुः । संकल्पयित्वा मनसा तमेव च महामनाः ॥६९॥ वाले श्रीभगवान् रजोगुण तथा तमोगुण से उत्पन्न उन दोनों को अपनी जंघा पर ही मसल डाले ॥४७॥ उसके बाद ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ महातेजस्वी ब्रह्माजी उस कमल पर ही स्थित रहकर अपने बाहुओं को उठाकर घोर तपस्या करने लगे । अपने तेज से प्रकाशित होने वाले तथा अपनी कान्ति से अन्धकार को दूर करने वाले, अपनी रश्मियों से सूर्य के समान प्रकाशित होने वाले, धर्मात्मा भगवान् नारायण, दूसरा रूप धारण करके, महातेजस्वी, महायशस्वी योगाचार्य के रूप में वहाँ आये ॥४९-५०॥ उसी समय ब्रहाज्ञानियों में श्रेष्ठ कपिल महर्षि वहाँ आये । वहाँ पर वे दोनों ब्रह्माजी द्वारा पूजित हुए ॥५१॥ वहाँ आये हुए वे दोनो परावरतत्त्व के विशेषज्ञ थे तथा महर्षिगण उनकी पूजा कर चुके थे । वे दोनों ब्रह्माजी से कहे, तुम्हे अच्छी तरह से जगत् की स्थिति में विशाल ब्रह्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । सभी भूतों में प्रधान तथा त्रैलोक्य पूजित ब्रह्माजी उन दोनों की वाणी सुनकर समाधि से जगकर वेद श्रुति के अनुसार तीनों लोकों की सृष्टि किए ॥५२-५४॥ उन्होंने अपने से एक पुत्र को उत्पन्न किया । वह ब्रह्मा का मानस पुत्र उनके सामने आया ॥५५॥ उत्पन्न होते ही ब्रह्माजी का वह मानस पुत्र कहा-- हे भगवन् ! आप बतलाइये कि में आपकीकौन सी सहायता कर सकता हूँ ॥५६॥ ब्रह्माजी ने कहा-- हे महामते ! ये महर्षि कपिल तथा ब्रह्म नारायण जो कह रहे हैं, उसे तुम करो ॥५७॥ ब्रह्माजी के कहने पर उसने उन दोनों से हाथ जोड़कर कहा-- मैं यह सुनना चाहता हूँ कि में क्या करूं 2॥५८॥ श्रीभगवान् ने कहा-- जो सत्य तथा अक्षर ब्रह्म है वह अठारह प्रकार का है तथा जो सत्य तथा अमृत स्वरूप है उस परमपद का स्मरण करो ॥५९॥ उस बाणी को सुनकर वह उत्तर दिशा में चला गया, और वहाँ जाकर वह अपने ज्ञाननेत्र के द्वारा ब्रह्म को प्राप्त किया ॥६०॥ उसके बाद ब्रह्माजी ने दूसरे ८. ५

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