Srishti Khanda Extracted Page 537
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-537
Sanskrit Original
ब्रह्मोवाच आवाभ्यां संहतौ दृष्ट्वा युवां पूर्व पराजितौ ॥३५॥ तं समाधय गुणिनं सत्वं चास्मि समाश्रितः । यःपरोयोगयुक्तात्मा योऽक्षरः स त्व मेव च॥३६॥ रजसस्तमसश्चैव यःस्रष्टा विश्वसंभवः । ततोभूतानि जायंते सात्विकानीतराणि च॥३७॥ स एव युवयोर्नाशं वासुदेवः करिष्यति । स्वपन्नेव ततो देवो बहुयोजनविस्तृतौ ॥३८॥ बाहू नारायणो ब्रह्म कृतवानात्ममायया । कृष्यमाणौ ततस्तस्य बाहुभ्यां बाहुशालिनौ॥३९॥ चेरतुस्तौ विगलितौ शकुनाविव पीवरौ । ततस्तावाहतु गत्वा वासुदेवं सनातनम्॥४०॥ पद्यनाभं हृषीकेशं प्रणिपत्यनतावुभौ । जानीवस्त्वां विश्वयोनि त्वामेकं पुरुषोत्तमम् ॥४१॥ आवयोश्चैव हेतुं त्वां जानन्तौ बुद्धिकारणम्। अमोघदर्शनं सत्यं यतस्त्वां विद्वश्शाश्वतम् ॥४२॥ ततस्त्वामभितो देवकांक्षावः प्रसमीक्षितुम् । अमोधदर्शनोसि त्वं नमस्ते समितिंजय ॥४३॥ श्रीभगवानुवाच किमर्थमामनुब्रूथ युवामसुरसत्तमौ । गतायुष्कौ युवांभूयस्त्वहोजीवितुमिच्छथः॥४४॥ मधुकैटभावूचतुः यस्मिन्नकश्चिन्मृतवान् देवतस्मिन्वधं प्रभो। इच्छावः पुत्रतां चैव भवतः सुमहातपः॥४५॥ श्रीभगवानुवाच युवयोर्बाढमेतत्स्याद्भविष्ये कलिसंभवे । भविष्यथो न संदेहः सत्यमेतद्ब्रवीमि वाम् ॥४६॥ विजय तथा कीर्ति की प्राप्ति होती है ॥३४॥ जिसको जिस वस्तु को प्राप्त करना है वह हमदोनों से ही प्राप्त करता है, यह जानो । ब्रह्माजी ने कहा-- हम दोनों को एक साथ देखकर तुमदोनो पराजित हो गये थे उन्हीं गुण सम्पन्न श्रीभगवान् का ध्यान करके में सत्त्वगुण सम्पन्न हो गया हूँ । वे ही सर्वश्रेष्ठ योग से युक्त हैं तथा वे ही अक्षर सत्त्व हें ॥३६॥ रजोगुण तथा तमोगुण की सृष्टि उन्होंने ही की, वे ही जगत् की सृष्टि करते हैं । उनसे ही सभी सात्त्विक तथा दूसरे प्रकार के जीव उत्पन्न होते हैं ॥३७॥ वे ही भगवान् वासुदेव तुम दोनों का नाश करेंगे । उसी समय सोते हुए ही श्रीभगवान् नारायण अपनी माया से अनेक योजन विस्तृत अपनी दोनों भुजाओं को कर दिए । उसके द्वारा वे दोनों बलवान उन दोनों को भुजाओं द्वारा खिंचने लगे ॥३९॥ उस समय वे दोनों विवश होकर मोटे ताजे पक्षी के समान छटपटाने लगे । उस समय वे दोनों सनातन भगवान् वासुदेव के पास जाकर ।॥॥४०॥। पद्मनाभ भगवान् हृषीकेश को प्रणाम करके तथा नम्र होकर कहे कि हम दोनों आपको सम्पूर्ण जगत् के कारण स्वरूप तथा अकेला पुरुषोत्तम रूप से जानते हैं ॥४१॥ हम जानते हैं कि आप ही हम दोनों को उत्पन्न करने वाले हैं । आप ही बुद्धि प्रदान करने वाले हैं । आपका दर्शन अमोघ (सफल) ही होता है । हम आपको सत्य तथा शाश्वत रूप से जानते हैं।॥४२॥ अतएव हे देव ! हम दोनों आपको चारो ओर देखना चाहते हैं । हे समितिञ्जय (संग्राम जितने वाले) आपका अमोघ दर्शन हैं, आपको नमस्कार है ॥४३॥ श्रीभगवान् ने कहा-- हे असुरश्रेष्ठ ! किसलिए मुझको पूछ रहे थे । तुमदोनों की आयु समाप्त हो चुकी है फिर भी तुम दोनों जीवित रहना चाहते हो ॥४४॥ मधु और कैटभ ने कहा-- हे देव ! जहाँ पर कोई नहीं मरा हो वहीं पर हम दोनों मरना चाहते हैं तथा हमदोनों आपके महातपस्वी पुत्र होना चाहते हें ॥४५॥ श्रीभगवान् ने कहा-- टीक है तुमलोग आगे कलियुग के आने पर मेरे पुत्र होओगे ? इसमें कोई सन्देह नहीं है, मैं सत्य कह रहा हूँ ॥४६।। इस तरह से उन दोनों असुरों को वरदान देकर सनातन विश्व को धारण करने
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know