Srishti Khanda Extracted Page 536

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-536

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Sanskrit Original

विपुला भोगकेयूर कराभ्यामतिभीषणौ । पादसंचारविन्यासै विक्षिपंताविवार्णवम् ॥२३॥ कंपयंतौ हरिमिव शयानं मधुसूदनम् । तौ तत्र विचरंतौ तु पुष्करे विश्वतोमुखौ ॥२४॥ योगिनां श्रेष्ठमत्यंतं दीप्तं ददृशतुस्तदा । नारायणसमाज्ञातं सृजंतमखिलाः प्रजाः /॥२५॥ दैवतानि च विश्वानि मानसांश्च सुतानृषीन् । ततस्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणमसुरोत्तमौ ॥२६॥ दुष्टौ युयुत्सूसंक्रुद्धौ कोधव्याकुलितेक्षणौ। कस्त्वं पुष्करमध्यस्थः सितोष्णीषश्चतुर्भुजः ॥२७॥ आवामगणयन्मोहादास्से त्वं विगतस्पृहः । एह्यागच्छावयोर्युद्धं देहि त्वं कमलोद्भव ॥२८॥ आवाभ्यां परमेशाभ्यामशक्तः स्थातुमर्णवे । तत्र कश्चभवेत्तुभ्यं येन चात्र नियोजितः॥२९॥ कः स्त्रष्टा कश्च ते गोप्ता केन नाम्नाभिधीयते। ब्रह्मोवाच ईश्वरः प्रोच्यते लोके विष्णुश्चानंतशक्ति धृत् ॥३०॥ तत्सकाशात्तु जातं मां स्रष्टारमवगच्छतम् । मधुकैटभावूचतुः नावयोः परमं लोके किंचिदस्ति महामुने ॥३९॥ आवाभ्यां च्छादते विश्वं तमसारजसा च वै । रजस्तमोमयावावामृषीणामतिलंधिनौ ॥३२॥ - धर्मशीलं च्छादयन्तौ नाशकौ सर्वदेहिनाम्। आवाभ्यां युज्यते लोको दुस्तराभ्यां युगे युगे॥३ ३॥ आवामर्थश्च कामश्च यज्ञस्सर्वपरिग्रहः । सुखं यत्र मदो यत्र यत्र श्रीः कीर्तिरिव च ॥३४॥ येषां यत्कांक्षितं किंचित्तत्तदावां विचिंतय । Soe 8 9 ™9V™8 वे नवीन मेध के समान काले-काले थे तथा उनका मुख सूर्य के समान चमक रहा था ॥२२॥ अधिक मोटे तथा केयूर युक्त उनके दोनों हाथ देखने में भयङ्कर थे । वे अपने पैरो के विन्यास के द्वारा एकाणर्व को क्षुब्ध कर रहे थे॥२३॥ मानो वे सोये हुए भगवान् को कंपा रहे हों । वे दोनों उस पुष्कर के ऊपर चारो ओर घूम रहे थे ॥२४॥ उन दोनो ने वहाँ पर विद्यमान योगियों में श्रेष्ठ तथा देदीप्यमान ब्रह्माजी को देखा । उस समय ब्रह्माजी भगवान् नारायण की आज्ञा से सम्पूर्ण जगत् की रचना कर रहे थे ॥२५॥ वे अपने मानस पुत्रों सम्पूर्ण देवताओं तथा ऋषियों की रचना कर रहे थे ॥२६॥ वे दोनों दुष्ट, युद्ध करने की इच्छा वाले, क्रुद्ध तथा क्रोध से लाल आँखों वाले थे उन दोनों ने ब्रह्माजी से पूछा उजली पगड़ी तथा चार भुजाओं वाले इस पुष्कर के बीच में विद्यमान तुम कौन हो ?॥२७॥ हमदोनों की परवाह किए बिना तुम निस्पृह बने हुए हो । ऐ कमलोद्धव ! तुम आओ और हमदोनों के साथ युद्ध करो ॥२८॥ हम दोनों ही परमेश हैं सामर्थ्य ही न तुम इस समुद्र में कैसे रहते हो ? तुमको जिसने इस काम में लगा रखा है, वह तुम्हारा कौन है 2॥२९॥ तुमको उत्पन्न करने वाला तथा तुम्हारी रक्षा करने वाला कौन हें ? उसका नाम क्या है ? ब्रह्माजी ने कहा-- अनंत शक्ति से सम्पन्न भगवान् विष्णु ही लोक में ईश्वर कहलातेहैं॥३०॥ मैं जगत् की सृष्टि करने वाला तथा उन्हीं से उत्पन्न हुँ । मधु और कैटभ ने कहा-- हे महामुने ! हमदोनों से बड़ा इस लोक में कोई दूसरा नहीं है ॥३१॥ हम दोनों तमोगुण तथा रजोगुण के द्वारा जगत् कोआच्छादित कर देते हैं, हम दोनों रजोगुण तथा तमोगुणमय हैं और ऋषियों से भी बढकर हैं ॥३३॥ हम धर्म करने वाले को ढँक देते है समस्त शरीरधारियों को मार डालते हैं । हम दोनों दुस्तर हैं । प्रत्येक युग में हमसे ही जगत् उत्पन्न होता है ॥३४॥ हमदोनों ही अर्थ, काम तथा सब कुछ स्वीकार करने वाले यज्ञ हैं । हमलोगो से ही सुख, मद,

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