Srishti Khanda Extracted Page 535
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-535
Sanskrit Original
एतेषामंतरे द्वीपो जंबूद्दीप इति स्मृतः । जंबुद्दीपस्थ संस्थानं याज्ञीया यत्र च क्रिया: ॥८॥ तेभ्यो यद् द्रवते तोयं दिव्यामृरसोपमम् । दिव्यतीर्थशताधाराः सरस्यः सर्वतः स्मृताः ॥९॥ यान्येतानीह पझस्य केसराणि समंततः । असंख्येयाः पृथिव्यां ते विविधाश्चैव पर्वताः ॥१०॥ यानि पर्णानि पद्मस्य भूरिपूर्वाणि पार्थिव । ते दुर्गमाः शैलचिताम्लेच्छदेशाः प्रकीर्तिताः ॥९९॥ यान्यधोभागपत्राणि तानि वासास्तु भागशः । दैत्यानामसुराणां च पन्नगानां च पार्थिव ॥१२॥ तेषांमध्येंतरं यत्तु तद्रसातलसंज्ञितम् । महापातककर्माणो मज्जंते यत्र मानवाः ॥१३॥ चतुर्दिशासु संख्याताश्चत्वारः सलिलाकराः। एवं नारायणस्यार्थे महीपुष्करसंभवा॥ १ ४॥ प्रादुर्भावोप्ययं तस्मान्नाम्ना पुष्कर संज्ञितः । एतस्मात्कारणाद्यज्ञे पुराणैः परमर्षिभिः ॥९१५॥ यज्ञियै े ददृष्टांतै र्यज्ञे यूपचिति: कृता । एवं भगवता तेन विश्चव्याप्यधराचिता॥९६॥ पर्वतानां नदीनां च रचना चैव निर्मिता । विश्वस्य यश्चाप्रतिमप्रभावः प्रभाकरा भो वरुणोमितद्युतिः ॥१७॥ शनैः स्वयं भूर्व्यसृजत्सुषुप्तं जगन्मयः पञ्मनिधिं महार्णवे । विघ्नस्तपसि संभूतो मधुर्नाममहासुरः ॥१८॥ तेनैव च सहोद्धूतो ह्यासुरो नाम कैटभः । तौरजस्तमसोर्भूतौ सम्भूतौ तामसौ गणौ ॥१९॥ एकार्णवं जगत्सर्वं क्षोभयेतां महाबलौ । दिव्यरक्तांबरधरौ श्वेतदीप्तोग्रदंष्ट्रिणौ ॥२०॥ किरीटमकुटोदग्रौ केयूरवलयोज्ज्वलौ । महाविवृतताप्राक्षौ पीनोरस्कौ महाभुजौ॥२९॥ महागिरेः संहनजौ जंगमाविवपर्वतौ। नवमेघप्रतीकाशावादित्यप्रतिमाननौ ॥२२॥ नामक द्वीप है । जम्बुद्वीप के ही स्थानों में याज्ञिकी क्रियायें होती हें ॥८॥। उन पर्वतों से जो जल द्रवित होता है वह दिव्य तथा अमृतरस के समान बतलाया गया है । दिव्यतीर्थो वाली सैकड़ों धारायें ही सर्वत्र सरसी कही गयी हैं ॥९॥ ये जो पद्म के केसर चारो ओर से हैं, वे ही पृथिवी पर असंख्य पर्वत है ॥१०॥ उस पृथिवी रूपी पद्म के जो मुख्य दल हैं; वे ही दुर्गम शैलों (पर्वतों) से भरे हुए म्लेच्छों के देश कहे गये हें ॥११॥ जो नीचे के पत्र है वे विभाग पूर्वक क्रमश: दैत्यों, असुरों, तथा सर्पो के निवास स्थान हैं ॥१२॥ जो उन सबों के बीच में पत्र हैं वही रसातल कहलाता है । उसमें महापातकी मनुष्य डुबो दिए जाते हैं ॥१३॥ उसके चारो दिशाओं में चार समुद्र बतलाये गये हैं। इस तरह से भगवान् नारायण के लिए पुष्कर से उत्पन्न होने वाली प्रथिवी है ॥१४।॥ इसीलिए इस उत्पत्ति को पुष्कर कहते हैं । इसीलिए प्राचीन परमर्षियों ने यज्ञ में वेदों के यज्ञीय दृष्टान्तों के द्वारा यज्ञीय युपों (स्तम्भो) का चयन किया। इस तरह श्रीभगवान् ने विश्व में व्याप्त होकर पृथिवी का निर्माण किया ॥१६॥ उन्होंने पर्वतों तथा नदियों की रचना की । विश्व में जिनके प्रभाव की कोई तुलना नहीं है, जिनकी सूर्य के समान प्रभा तथा वरुण के समान अपार कान्ति है तथा यह सम्पूर्ण है, वे महात्मा ब्रह्माजी एकार्णव के जल में धीरे-धीरे पद्म निधि की रचना किये । उनकी तपस्या में मधु नामक महा असुर विघ्न बन गया ॥१७-१८॥ उसी के साथ कैटभ नामक भी असुर उत्पन्न हुआ । वे दोनों रजोगुण तथा तमोगुण से उत्पन्न थे; किन्तु वे दोनो तामस हो गये । वे महाबलवान् थे तथा एकार्णव में वे सम्पूर्ण जगत् में बाधा उत्पन्न करने लगे । वे लाल दिव्यवस्र धारण किए थे । उनके दाँत श्वेत दीप्यमान तथा भयङ्कर थे।१९-२०॥ वे किरीट, मुकुट तथा केयूर एवं कंकण धारण किए हुए थे । उनकी आँखें बड़ी-बड़ी और खुली हुयी थी, विशाल हृदय तथा लम्बी-लम्बी भुजायें थीं ॥२१॥ लगता था वे किसी बहुत बड़े पर्वत से उत्पन्न जंगम पर्वत हों
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